Rasiya [part 134]

 चतुर अपने घर में आये मेहमानों को ,तन्मय का परिचय कराते हुए कहता है -परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, ये पुलिसवाला ! मेरे बचपन का मित्र है।

 मन ही मन तन्मय सोच रहा था - माना कि मैं तेरा मित्र रहा हूँ, तभी तो तुझे हवन पूर्ण करने  का अवसर दिया। धीरे -धीरे भीड़ छटने लगी। तब तन्मय,चतुर से बोला -तूने, हमें कोई निमंत्रण नहीं दिया था ,न ही मुझे मालूम था ,कि मैं जिसे गिरफ़्तार करने जा रहा हूँ ,वो तू होगा।  मैं यहां दोस्ती के नाते नहीं, तुझे गिरफ्तार करने के लिए ही आया हूं। 

यह तू क्या कह रहा है ? मैंने क्या किया है ? आश्चर्य से


चतुर ने पूछा। 

तेरे विरुद्ध किसी ने जालसाज़ी और धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज़ की है तूने जमीन की खरीद फरोख्त में, धोखाधड़ी की है, इसलिए मुझे ,ऐसे ख़ुशी के माहौल में भी ,तुझे ले जाना पड़ रहा है।

बात की गंभीरता को देखते हुए ,अब चतुर भी गम्भीर हो गया। उसने पूछा - मेरे खिलाफ किसने रिपोर्ट की है  ? ऐसा कौन हो सकता है ? अब वो, अपने दिमाग़ के घोड़े दौड़ाने लगा। वह व्यक्ति  कौन  है ?

 वह तो वहां चलकर ही पता चल जाएगा अब तुझे हमारे साथ चलना ही होगा। चतुर नहीं चाहता था, कि यहाँ किसी भी प्रकार का शोर -शराबा हो ,मौहल्ले में उसकी क्या इज्जत रह जाएगी ? बिना किसी शोर- शराबे  के वह चुपचाप, वहां से चला जाए ,यही बेहतर रहेगा, इसीलिए वह चुपचाप गाड़ी में बैठा और पुलिसवालों के साथ चला गया। 

किंतु सुमित अग्रवाल से कह कर गया था -भैया ! आप जरा ध्यान रखना ! मैं अभी आता हूं ,उसे अपने पर पूर्ण विश्वास था, कि मैं आसानी से छूट जाऊंगा।

 उसको पुलिस की गाड़ी में जाता देखकर उसके बच्चे और उसकी पत्नी रोने लगे, अभी कुछ देर पहले घर में ,जो खुशी का वातावरण था, घर के हर कोने से प्रसन्नता झलक रही थी किंतु चतुर के गिरफ़्तार हो जाने के कारण , अब वहां उदासी ने स्थान ले लिया था।

दोनों पति -पत्नी अभी  भी वहीं थे ,अंजलि उनसे कह  रही थी -चलिए जी ! अब हमें भी अपने घर चलना चाहिए।यहां रहकर क्या करना है ? अब तक क्या इसके बच्चों को हम ही देख रहे थे ? पालकर इतने बड़े कर दिए ,हमसे झूठ बोलकर इन्हें  हमारी ही' नाक के नीचे 'ही तो पाल रहा था। उसके  बच्चों को रोते  हुए देखकर ,उसे और अधिक क्रोध आ रहा था।

वे देख रहे थे ,ये वही अंजलि है ,जो चतुर से कितना प्यार करती थी ?उसके लिए इसने, मुझे भी भुला दिया था। अब जब से इसे ये पता चला है कि चतुर ने हमसे धोखा किया है ,तब से इसकी दुश्मन बन गयी है। ये इस बात से नाराज़ है कि उसने, हमसे पैसे के सिलसिले में छल किया है या फिर उसने, इनकी भावनाओं से खेला है ,उसका दर्द है ,वो समझने का प्रयास कर रहे थे। क्रोध आना तो स्वाभाविक है ,उसने एक नहीं ,न जाने हमसे कितने झूठ बोले हैं ? 

तब सुमित जी ने कस्तूरी से पूछा -क्या बात हुई ?इस तरह पुलिस उसे उठाकर क्यों ले गयी ?

मुझे नहीं मालूम ?

मुझे लगता है ,उसने जो ज़मीन बेचीं है ,उसी में कुछ घपला हुआ है ,सोचते हुए बोले। 

 हालाँकि चतुर ने अपनी बीवी और बच्चों को समझाया हुआ था। कोई भी बाहर का आदमी अंदर न आने पाए ,किसी भी प्रश्न का जबाब मांगे तो कह देना 'हमें नहीं मालूम ! मेरे पति को ही मालूम है। ''किन्तु सुमित तो कई बार घर में आ चुके थे। बच्चों से भी घुलमिल गए थे। चतुर भी उन्हें भइया कहता था, इसीलिए उन्हें बताने में कोई आपत्ति नहीं थी। 

न जाने, उसे कब तक थाने में रखें ? उसके साथ मारपीट भी कर सकते हैं। बच्चे भी छोटे -छोटे हैं ,उसकी ज़मानत तो करवानी ही होगी ,चिंतित स्वर में वो बोले -अच्छा बताओ ! घर में कितना पैसा है ?

कस्तूरी थोड़ी सतर्क हुई और बोली -मुझे नहीं मालूम !मुझे वो बताते ही नहीं थे ,पैसा कहाँ रखते हैं ?जबकि वो जानती थी ,घर में कितना पैसा पड़ा है ?

वो भी समझ गए ,पैसे का मामला है ,ये इतनी आसानी से तो नहीं बताइयेगी।

 तभी अंजलि कुढ़ते हुए बोली -सारा पैसा क्या घर में ही लगा दिया ?बुरे समय के लिए उसे कुछ तो बचाकर रखना चाहिए था। अब उसकी ज़मानत कैसे होगी ?

अच्छा ,मैं ही कुछ इंतज़ाम करता हूँ ,कहते हुए उठे और बोले -मुझे उन कागज़ों की जरूरत तो होगी ही ,जिनके विरुद्ध ये केस बना है। मुझे ये बताओ ! वो अपने जरूरी कागज़ात कहाँ रखता है ? ताकि मैं उन्हें दिखाकर उसकी ज़मानत करवा सकूँ। 

कस्तूरी को यह बात सही लगी,ये पैसा अपने पास से लगा देंगे ,कागज़ात तो चाहिए ही.... तब उसने उनको वो अलमारी दिखाई जिसमें उस घर के और अन्य ज़मीन के क़ानूनी दस्तावेज़ रखे थे। उन्हें लेकर वो वहां से चले गए। 

थाने पहुंचकर ,चतुर भार्गव को पता चला, उसकी रिपोर्ट और किसी ने नहीं ,'अंजलि अग्रवाल' ने की थी। उस पर धोखे का आरोप लगाया था। ये सुनकर चतुर शांत होकर बैठ गया। वो जानता था ,जब अंजलि को सच्चाई का पता चलेगा ,वो तो नाराज़ होगी ही.... किन्तु ये नहीं मालूम था वो उसके विरुद्ध पुलिस में भी चली  जाएगी। वो तो है ,ही ऐसी... जिसके पीछे पड़ जाती है ,तो उसे छोड़ती नहीं। 

वो तुम्हारे विरुद्ध क्यों खड़ी हुई ?तुमने ऐसा क्या किया ?

अरे !कुछ नहीं, हमने मिलकर ज़मीन खरीदी थी ,उसी से ये मनमुटाव बढ़ा ,अभी तक तो हम साथ में ही काम कर रहे थे। दरअसल  मेरा घर देखकर लोगों में आग लगी पड़ी है। लोगों को जलन तो होती ही है। चतुर ने तन्मय को समझाने का प्रयास करते हुए कहा। 

देख !जितना पैसा तूने उस हवेली में लगाया है ,उसे देखकर तो ,मुझे भी तो शंका हुई थी ,आखिर तूने इतना पैसा कहाँ से कमाया ?दूसरा तुझसे कोई क्यों जलेगा ? तूने क्या उसके पैसे से ये घर बनाया है ,वो तेरे विरुद्ध क़ानूनी कार्यवाही क्यों करेंगे ? कभी ऐसा सुना है ,जलन के कारण कोई पुलिस में ही रिपोर्ट कर दे ! कानून को क्या खेल समझ रक्खा है ? ये बात तन्मय ने जानबूझकर कही। 

  उस महिला के पति चतुर के घर से, जमीन के कुछ जरूरी कागज़ात  निकालकर ले आए। उसके परिवार के लोगों ने उन पर विश्वास करके उन्हें आने दिया। एक वही, उन्हें इस अनजान शहर में अपने नजर आये थे ।  चतुर ने अपने परिवार में भी, उनके विषय में बहुत कुछ बता रखा था इसीलिए चतुर के घरवाले भी सुमित का सम्मान करते थे, इसीलिए उन्होंने उन्हें अपने घर आने दिया। 

क्या सुमित सच में ही उनका साथ दे रहे थे ,या फिर उनकी कोई योजना है ?चतुर को क्या जेल हो जाएगी ?या फिर उसे छुड़ा लिया जायेगा। आगे क्या होगा ?जानने के लिए पढ़िए -'रसिया '



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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