Lekhak ka kamra

' विचार' भावनाएं 'किसी जगह या समय के मोहताज नहीं हैं।  वो  कभी भी, कहीं भी आ जा सकते हैं।  उनके लिए कोई विशेष कमरे की आवश्यकता नहीं है। हां, बहुत पहले रहे होंगे ,अलग लेखन के कमरे किंतु भाग -दौड़ भरी जिंदगी में विचारों का ताना-बाना तो बुनता ही रहता है किंतु उसके लिए समय भी होना चाहिए। एक लेख़क बैठकर सोच -विचार कर सके किंतु सोचने का समय किसके पास है ? जीवन में इतनी भाग- दौड़ लगी हुई है। तन कहीं होता है, हाथ -पैर काम कर रहे होते हैं और मस्तिष्क यानि की दिमाग में विचारधारा अलग ही घूम रही होती हैं। 


कई बार एक लेखक एक स्थान पर बैठे -बैठे न जाने कहाँ तक  सैर कर आता है ? वो उसके शब्दों में, उसकी रचनाओं में देखने को मिलता है। जब भी विचारों का बहाव आता है ,तब एक लेख़क  अपने को रोक नहीं पाता है । उस समय पर वह कोई स्थान भी नहीं देखता, जब भी उसे लिखना होता है और लिखने की इच्छा प्रबल होती है, तो वह लिख देता है। 

एक लेख़क अपना ही नहीं ,न जाने कितने और चरित्र जी जाता है ?यदि वो किसी के विषय में सोचकर लिख रहा है ,तो समझिये ! उस चरित्र को ,उस जीवन को जी रहा है। सकारात्मकता उसकी प्रेरणा बनती है।  

कई बार तो ऐसा हुआ है कि विशेष रूप से लिखने के लिए समय निकालकर बैठे हैं ,और विचार न जाने कहां  तिरोहित हो जाते हैं ? वे भी तो खेलते हैं ,शब्द न जाने कहां खो गए ? उन विचारों को उसी समय पकड़ लेना आवश्यक है क्योंकि विचारों का बहाव  इतनी शीघ्रता से आता है और चला जाता है। अगले ही पल, न जाने कौन से  विचार अधिकार जमाये बैठा है , पहले वाले को धक्का देकर आगे निकलने का प्रयास करता है। 

'लेखक' एक' लेखक' ही होता है ,छोटा या बड़ा, यह उसकी प्रसिद्धि पर निर्भर करता है। इनके लिए कोई जगह भी निश्चित नहीं की जा सकती क्योंकि विचार तो नहाते हुए भी आ जाते हैं, शौचालय में भी आ जाते हैं तो कभी भी कोई कार्य करते हुए भी विचार कुलबुलाने लगते हैं। विचारों की तीव्रता इतनी होती है कि यदि तुम कागज, कलम उठाने के लिए दौड़ोगे, तुरंत ही लिख सकते हो तो ठीक है ,यदि उन विचारों को आगे के लिए रख छोड़ा है तो तुम भूल जाओगे क्योंकि उस समय तुम्हारी मनोदशा या फिर परिस्थिति क्या रही ?उस पर निर्भर करता है। हो सकता है ,कुछ घंटों के पश्चात तुम्हारी विचारधारा किस ओर अपना रुख़ करे ?वह सोच ही बदल जाएगी।

 उस समय तुमने क्या सोच कर लिखा ?अब तुम किस परिस्थिति में हो, तो उसके लिए एक नया विचार उत्पन्न हो जाता है।'' लेखन विचारों के माध्यम से ही होता है जिन पर भावनाएं प्रबल होती हैं। ''इसलिए एक लेखक को कमरे की नहीं, सबसे ज्यादा विचारों की आवश्यकता है, एक नई सोच ! जो खुले गगन में अनवरत चलती रहती है। कभी पंछियों की चहचाहट में गुम हो जाती है ,तो कभी नीले गगन से मिल आती है। कभी प्रकृति को चूमती है ,तो कभी किसी की व्यथा को सुनती है। 

अपने जीवन से ही नहीं ,वो अपने आस -पास के मोती भी चुन लाती है। कभी बारिश की बूंदों में भीग जाती है ,तो कभी ममता की लहर हिचकोले खाती नजर आती है। बाहर से सब शांत नजर आता है किन्तु अंदर एक तूफां ,एक सागर उमड़ता है ,वो सागर भला एक कमरे में कैसे ठहर सकता है ? पन्नों की स्याही में बिन स्वर का शोर नजर आता है। तो कहीं इश्क़ का ख़ुमार उमड़ आता है। कई बार वह विचारों में इतना उलझता चला जाता है कि उसे समझ ही नहीं आता ,कहां से शुरू करें ? विचारों का सैलाब बढ़ता जाता है।

लेख़क को लिखने से मतलब उसे कहाँ लिखना है ?यह बात मायने नहीं रखती ,लिखने वाले कहाँ मानते हैं ?वो तो कभी बस में,तो कभी दफ्तर में ,रसोई में आटे की लोइयों को गिनते हुए ,घर को सहेजते हुए ,भक्ति रस में डूबते हुए , लिख ही लेते हैं।

वो कोई और ही जमाने थे ,जब लेखक सिगरेट के छल्लों में ,मयख़ानों में ,लम्बे बालों ,उनीदीं सी रातों में ,कहानियां खोजता था या फिर ग़रीबी के गलियारों में ,जिंदगी लिखता था। सब कुछ बिखरा सा अस्त व्यस्त कमरा ! 


 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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