Rasiya [part 131]

 सुमित अग्रवाल ,चतुर का सच जानकर अंदर ही अंदर लावा बन गए थे । क्रोध के कारण ,उनका 'लहु' लावे की तरह खौल रहा था।  वे अपने को संयत करने का प्रयास कर रहे थे, इसीलिए आँखें मूंदकर कुछ देर के लिए सोफे से सिर टिकाकार बैठ गए।  इतने वर्षों से आज तक ये हमसे झूठ बोलता रहा ,इसके कारण मैंने अपनी अंजलि को भी खो दिया। जब इसने, मेरे घर में क़दम रक्खा ,अंजलि इसके शरीर सौष्ठव ,क़द -काठी को देखती रह गयी। जैसे उसने किसी पुरुष को पहली बार देखा हो, हालाँकि अपने पति को समीप देखकर और मन में ये विचार आते ही,-' कि मैं तो एक  विवाहित महिला हूँ। ग़ैर पुरुष को इस तरह देखना गलत है। यह सोचकर वो अंदर चली गयी।


 उस समय चतुर को पैसे की बहुत जरूरत थी और काम की भी... तब मैंने इसे घर के कामों के लिए रख लिया था। ये थोड़े ही मालूम था कि ये मेरे घर में ही सेंध लगाएगा।

हर बार मैं अपने मन को समझाता रहा ,मुझसे ,अंजली की उम्र कम है। ये तो इसे देखना है ,शादीशुदा होकर किस तरह अपने चरित्र  को संभाले रखना है ? ये सारा दिन काम करता और अंजलि को भी संभालता ,मैं इनके बीच से हट गया था किन्तु अभी भी दोनों मेरे पैसे के कारण मुझसे जुड़े थे।

 ये मेरा सम्मान करता और अंजलि को भी समझता था। परिवार की बदनामी के ड़र से भी मैंने, इन्हें मनमानी करने दी। अंजलि को भी कुछ नहीं कह सकता था। 'जब एक औरत अपनी ज़िद पर आ जाती है। तब बर्बादी ही होती है।' अंजलि से मैं अभी भी प्यार करता हूँ। अंजली ने अपने स्त्रीत्व की मर्यादा को तोडा इसमें भी मुझे, अपनी गलती लगी। मैं अपने घर को तोडना नहीं चाहता था इसलिए सब देखकर भी अनदेखा किया। 

मैं कर भी क्या सकता था ?बच्चे बाहर चले गए ,मैं अकेला क्या -क्या संभालता ? इसे काम से निकालकर किसी दूसरे को रखता ,तो क्या लाभ ? एक बार किसी का चरित्र गिर जाये तो उसे और बिगड़ने में देर नहीं लगती।  हाँ ,सम्भलने में समय अवश्य लगता है। वो समय, इस बीच बहुत कुछ अपने पीछे छोड़ जाता है। टूटे हुए दिल ! ज़ख्म ,कड़वाहट ,बहुत सारी वेदना और भी बहुत कुछ ,उनकी आँखों के कोरों से अश्रुओं की धार बह निकली।

क्या हुआ ?भइया !आप इस तरह क्यों रो रहे हैं ? मैं जानता हूँ ,मैं आपका अपराधी हूँ ,मुझे क्षमा कर दीजिये ! मैं यहाँ से चला जाऊंगा ,आपका जो भी पैसा होगा ,मैं चुका दूंगा। 

एकदम से उन्होंने आँखें खोलीं और पूछा -कहाँ से..... कहाँ से चुकाओगे ?इतना खर्चा करने से पहले सोच तो लिया होता, कल को आवश्यकता पड़ी तो क्या होगा ? तुम मुझे अपना भाई कहते थे न... बड़ा भाई !उसका ये सम्मान ! धोख़ा दिया तुमने, हमें ! कहाँ और कब तुमने, मुझे धोखा नहीं दिया ?

भइया ! मैं मानता हूँ ,मुझसे गलती हुई है, किन्तु घरवाले बच्चों को साथ रहने के लिए दबाव बना रहे थे। मैं क्या करता ?

झूठ मत बोलो ! लगभग चिल्लाते हुए वे बोले -आज तक तुम, हमसे झूठ ही बोलते हुए आये हो ,क्या तुमसे तुम्हारे घरवालों ने कहा था ?कि उन लोगों से कहना ,'तुम कुंवारे और अनाथ हो। ''जब तुम्हारे घरवालों को पता चलेगा ,तुमने अपना भरा -पूरा परिवार होते हुए अपने को उन रिश्तों से वंचित रक्खा। जब उन्हें पता चलेगा ,तुमने हमसे झूठ बोला है ,और उन्हें जीते जी मार डाला ,तब उन पर क्या बीतेगी ?

मैं मानता  हूँ ,मुझसे गलती हुई है किन्तु अब आगे से कोई गलती नहीं होगी। 

अंजली अपने कमरे में चली गयी थी किन्तु लेटकर भी आराम नहीं था। मन ही मन सोच रही थी ,'इससे किस तरह से पैसा निकलेगा ? उसकी चालाकी के कारण ,चतुर के साथ जो संबंध बनाये थे ,उन पर आज उसे ग्लानि हो रही थी। मन ही मन सोच रही थी -ये भी कुछ नहीं कर पाएंगे। मन में बेचैनी हुई और उठकर बाहर आ गयी।

 उसने देखा ,चतुर सिर  झुकाये बैठा है ,वो उससे क्या कह रहे हैं ? यही जानने के लिए वो आगे आकर  दरवाजे के पीछे छुपकर उनकी बातें सुनने का प्रयास करती है। 

तुम उनके ही दोषी नहीं हो, हमारे भी हो ,तुमने हमें धोखा दिया ,हमने सहन किया किन्तु तुमने, हमें अपने छोटे -छोटे ,प्यारे -प्यारे बच्चों के साथ खेलने का एक भी मौका नहीं दिया। कम से कम हमें उन बच्चों से तो मिलवाते ,उन्हें यहाँ ले आते ,हमें कितना अच्छा लगता ?अचानक ही उनके बदले हुए लहज़े को देखकर चतुर ने उनकी तरफ देखा। 

वो मुस्कुरा रहे थे ,उन्हें ऐसे देखकर चतुर ने सुकून की साँस ली और बोला -भइया !आप नाराज़ नहीं हो। 

नाराज़ तो हूँ ,अरे ! पैसा तो आनी -जानी माया है किन्तु बच्चों की मुस्कान हमें  कहाँ देखने को मिलेगी ?अब हमारे बच्चे बड़े हो गए ,पढ़ाई में व्यस्त रहते हैं, कम से कम तुम्हारे बच्चों के साथ खेलकर ,हमारा भी समय कट जाता। 

चतुर जानता है ,भइया ! हमेशा ही सहज रहते हैं ,इन्हें  क्रोध कम ही आता है। दीवार के पीछे खड़ी अंजलि को और क्रोध आया और सोचने लगी -ये इंसान किस मिटटी का बना है ? इसे कभी भी गुस्सा नहीं आता।चतुर ने, हमारी सम्पूर्ण सम्पत्ति लूट ली किन्तु ये इसके बच्चों की बात कर रहा है। ये जीवन में कुछ नहीं कर पायेगा। ये बूढ़ा हो गया है ,इसके बस का कुछ नहीं है,बुदबुदाई।  

वो अंदर जाना चाहती है किन्तु तभी उसे सुनाई दिया , भइया !आप मेरे साथ चलिए ! मैं आपको उनसे मिलवाता हूँ ,आपसे मिलकर सभी बहुत खुश होंगे। उत्साहित होते हुए ,चतुर ने कहा।

इन लोगों के साथ, गलत तो उसने किया था। अभी उसे और पैसों की आवश्यकता थी इसीलिए सोच रहा था ,कहीं ये क़ानूनी दांवपेंच न खेलें। अभी इनकी ख़ुशामद करना ही ठीक रहेगा। हो सकता है ,बच्चों का मुँह देखकर इनकी नाराज़गी दूर हो जाये। 

आज तो हमारी श्रीमती जी, नाराज हैं, कल देख लेते हैं , उन्होंने कहा। 

अभी भाभी को,बताना उचित नहीं रहेगा ,वो बहुत नाराज़ हो जाएँगी ,अभी तो भाभी तो सो रही होगीं , उनके शीघ्र ही, सिर में दर्द हो जाता है , उन्हें सोने दीजिये ! ऐसा कहकर चतुर अपना बचाव कर रहा था। वो जानता था ,यदि भाभी को सच्चाई पता चली तो वो मुझे कभी माफ़ नहीं करेंगी। 

आप और मैं चलते हैं, आप घर भी देख लीजिएगा। छोटी सी कुटिया बनाई है और बच्चों से भी मिल लीजिएगा ,आपसे  मिलकर सभी प्रसन्न होंगे।

 अच्छा चलो, हम चलते हैं , जब तक ये  उठेएंगीं,  हम आ जाएंगे। कहकर सुमित जी चतुर के साथ हो लिए। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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