Rasiya [part 129]

 एक दिन वो महिला ,फिर से जब उस घर को देखने गयी थी। वहां पहले से ही एक महिला और बच्चे मौजूद थे। बच्चे खेलने में व्यस्त थे। ये लोग कौन हैं ? यह जानने के लिए वो छुप गयी। कुछ देर के पश्चात चतुर भी भीतर से बाहर आया। अब तक कमरे बन चुके थे। छत डल गयी थी। तब उसने वहां चतुर को भी देखा ,मन में शंका का बीज़ तो पहले से ही था, किन्तु अब वो अंकुरित होने लगा। तभी सोचा, कोई मजदूर होगी किन्तु उसने तभी देखा ,चतुर प्रसन्न था और उससे गले मिल रहा था। 


 वो उस जगह से बाहर आई मन में बड़ी उथल -पुथल चल रही थी। एक जगह चय की दुकान देखकर उसने चाय ली और कुछ दूरी पर बैठकर चाय पीने लगी, क्योंकि उनके विषय में सोच -सोचकर उसके सर में दर्द होने लगा था। उसके मन में प्रश्नों का तूफान उमड़ रहा था। आज तो चाय पीकर भी आराम नहीं था। कुछ देर अपने मन को शांत करने का प्रयास किया। गहरी स्वांसें लेते हुए वापस उस जगह आई।

 बच्चे अभी भी वहां खेल रहे थे ,तब उसने एक बच्चे को इशारे से बुलाया ,जब वो नहीं आया ,तब उसे ,गेंद दिखाते हुए  उसे, अपने समीप बुलाया ,जो वो अपने साथ लेकर आई थी। जब वो बच्चा उसके करीब आया। तब उस महिला ने पूछा -तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? ये किसका घर है ? 

ये हमारा घर है ,पापा ने, हमारे लिए ये घर बनवाया है ,आज मम्मी भी साथ आई हैं। 

तुम्हारे मम्मी -पापा कहाँ हैं ?

पापा तो कुछ सामान लेने गए हैं , मम्मी अंदर हैं , बुलाऊँ ! 

उसकी बात सुनते ही उस महिला को लगा ,जैसे वो चक्कर खाकर यहीं गिर पड़ेगी ,अपने आपको संभालते हुए उस बच्चे से पूछा -तुम्हारे  पापा का क्या नाम है ? 

पापा का नाम 'चतुर भार्गव 'है ,अभी  तो बताया -पापा कुछ सामान लेने बाहर गए हैं। आप बैठो ! वे आते ही होंगे। 

उसने बच्चे की तरफ ध्यान से देखा ,और बोली -कोई बात नहीं ,जब आएंगे तो मैं उनसे मिल लूंगी ,अब तुम जाओ !इस गेंद से खेलो !

उस बच्चे के मुख से ये शब्द सुनकर ,उसे लगा जैसे किसी ने उसका' चीरहरण' कर दिया हो। इतने दिनों से हमें,वो ' पागल' बना रहा था। वो गुस्से से तिलमिलाई हुई थी। उसके भीतर का तूफान उमड़कर बाहर आना चाहता था। उसने तुरंत रिक्शा किया और जमीन देखने पहुंच गयी। वहां जाकर पता चला ,काफी सारी ज़मीन बिक़ चुकी है। गुस्से से तिलमिलाई वापस रिक्शे में बैठी और वापस घर आई। 

उसकी हालत देखकर उसके पति ने पूछा -क्या हुआ ?

आज उसे अपना पति सच्चा, ईमानदार और मासूम नजर आ रहा था ,क्रोध के अतिरेक से उसकी आँखों से आंसू बह चले ,उसे लग रहा था ,मैंने सब कुछ बर्बाद कर दिया। अपने पति की जीवनभर की पूंजी स्वाहा कर दी। तुरंत ही ग्लानि से भर उठी और बोली - आपको क्या बताऊँ ?हम धोखा खा गए। 

उसका पति भी घबरा गया ,पूछा -कुछ बताओगी भी.... 

वो चतुर !!

क्या हुआ ? उसे.... उन्हें लगा कहीं, कोई दुर्घटना हो गयी है। 

उसे कुछ नहीं हुआ ,उसने हमें बर्बाद कर डाला ,कहते हुए रोने लगी। आज वे अपनी पत्नी को पहली बार इतना कमज़ोर देख रहे थे। 

उन्होंने पहले अपनी पत्नी को पानी का गिलास दिया और बोले -पहले पानी पी लो !और शांत हो जाओ ! तब मुझे आराम से सम्पूर्ण जानकारी दो ! आखिर हुआ क्या है ?

पानी पीकर ,वो बोली - चतुर तो बहुत चालाक निकला। वे मन ही मन सोच रहे थे ,तुम्हें अब एहसास हुआ ,इतने दिनों से वो हमारी ज़िंदगी में घुन्न की तरह लगा हुआ था , तुम्हें ,वो महसूस नहीं हुआ। आपको पता है ,उसने हमारा सारा पैसा हरिद्वार की ज़मीन में लगवा दिया। मुझसे कह रहा था -अभी जमीन बिक नहीं रही है ,जबकि वो उसमें से पांच प्लाट कटवा चुका है। 

तुम्हें ये सब कैसे पता चला ?

आज मैं वहीं गयी थी ,हमने जो गार्ड रक्खा हुआ था ,उसने ही बताया। 

कुछ देर वो शांत होकर सोचते रहे ,तब बोले -उसे याद नहीं रहा होगा ,हिसाब दे देगा ,कहीं भागा थोड़े ही जा रहा है। 

अब तो भाग ही जायेगा ,मन का दर्द अपने शब्दों की झल्लाहट में, लगभग चिल्लाते हुए वो बोली -आपने तो, कभी उससे पूछा ही नहीं ,वो क्या कर रहा है ?अगर आप ठीक होते तो मैं, उस धोखेबाज़ का  सहारा ही क्यों लेती ? किन्तु तुम्हें तो अपने काम से मतलब था। शरीर से भी इतने कमज़ोर कोई एक मुक्का भी मार दे तो... क्षणभर को उसने, अपने पति की तरफ घृणा से देखा। 

तभी तो तुम्हें उसके क़रीब देखकर नजरअंदाज कर जाता था। मुझे तो उसमें भी तुम्हारी ख़ुशी ही नजर आई इसीलिए चुप रहा ,तुम क्या समझती हो ?मैं कुछ जानता नहीं ,जो भी कर रहा था ,तुम्हारे और बच्चों के लिए ही तो कर रहा था। तुमने, मुझे पति ही कब समझा ? मुझे तो पैसा कमाने की मशीन बना दिया।ख़ैर ये सब छोडो ! तुम ये बताओ ! अब उसने क्या किया ,जो तुम इतनी परेशान हो। 

वो अपना घर बनवा रहा है ,छोटा -बड़ा नहीं ,पूरी हवेली तैयार करवा रहा है। 

यह बात तुम्हें कब पता चली ?

ये बात तो मुझे बहुत पहले ही पता चल गयी थी किन्तु मैंने सोचा ,वो हमें ही अपनी सारी दुनिया कहता है ,शायद हमारे लिए बनवा रहा होगा। हमें ,इसीलिए नहीं बताया ताकि हमें 'सरप्राइज 'देना चाहता हो। 

अब क्या परेशानी है ? 

परेशानी बहुत बड़ी है ,क्या आपसे उसने कभी बताया ? वो विवाहित है। 

नहीं ,

मैं चुपचाप उस हवेली को देख आती थी ,आज भी गयी थी ,वो वहीं था उसके साथ एक औरत और उसके बच्चे भी थे। 

क्या ?ये सुनकर वो भी अचम्भित  हुए ,बोले -उसने आज तक हमें कुछ नहीं बताया। 

इसी बात का तो दुःख है ,और हमसे पैसा लेकर वो काम किया और अब उसका लाभ भी स्वयं ही खा रहा है। हमें तो भनक भी नहीं लगने दी। उसने तो कहा था ,आप ही मेरे अपने हो ,मैं तो अनाथ हूँ ,मेरा कोई नहीं ,उसके ये बच्चे कहाँ से आ गए ?न जाने कब से और कहाँ रह रहे थे ?उस धोखे को वो महिला बिल्कुल भी सहन नहीं कर पा रही थी। वो तो समझती थी ,उसकी बाग़डोर मेरे हाथों में है ,इतना बड़ा चक़मा देगा ,उसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था। 

तुम शांत हो जाओ !जब वो वहां था ,तुम्हें वहां जाना चाहिए था ,वहीं पता चल जाता क्या झूठ है या सच !हो सकता है ,वो बच्चे उसके ही न हों। उसके किसी रिश्तेदार या दोस्त के हों। तुम्हें गलतफ़हमी हुई होगी। 

कोई गलतफ़हमी नहीं हुई ,मैंने उनमे से एक बड़े बच्चे को बुलाया था। जब चतुर कुछ सामान लेने बाहर गया था। उसने ही तो मुझे बताया -ये घर हमारा है ,मेरे पापा 'चतुर भार्गव 'हैं। उस बच्चे की उम्र लगभग दस या बारह बरस रही होगी।इतना बड़ा बच्चा क्या जनता नहीं होगा ?उसका पिता कौन है ?

 इसका मतलब है ,जब वो यहां अनाथ बनकर आया था ,वो शादीशुदा और एक या दो बच्चों  का बाप भी था। 

उन्होंने एक गहरी स्वांस ली ,गुस्सा तो उन्हें भी बहुत आया किन्तु वो शारीरिक रूप से उसका सामना नहीं कर सकते थे किन्तु दिमाग़ से तेज़ थे। इतने सालों गाढ़े परिश्रम से कमाया धन था। इसके कारण इज्ज़त तक दांव पर लग गयी। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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