कभी देखा है तुमने, लेख़क का कमरा !
जहां सपने पलते हैं ,वो उड़ान भरता है।
अपनी कल्पनाओं को, जीता है।
मन में उठते शोर को थाम , शब्द देता है।वेदना की गहराइयों में उतर दर्द जीता है।
'प्रेम' पल्ल्वित होता है ,जब....
तो ह्रदय कमल खिल उठता है।
छलकते आंसुओं की स्याही बना ,
' लेखन' क्षुधा मिटाता है।
तमतमा उठता है ,चेहरा उसका
जब अनर्थ देखता है, तिलमिलाता है।
उकेरता है ,चिंतन ,मनन !
जूझता है ,शब्द जाल से ,
कोरे पन्नों को भिगोता,
भावांजलि ,ओ अधिकार से !
कभी मौसम संग बहने लगता है।
कभी सिहर उठता ,कोहरे की धुंध से...
कभी मौसमी बरसात में गुनगुनाता है।
जीने लगता है , ग़ैरों का दर्द भी ,
तो कभी प्रेरणा बन सुकूँ बन जाता है।
शब्द' मंथन' कर 'पियूष' लाता है।
तो कभी भरी गर्मी में पंखे तले ,
स्वेद की टपकती बूँदों में झिलमिलाता है।
पसीने से भीगे बदन में ,
राहत भरी कविता लिख जाता है।
कभी देखा है ,एक कवि का कमरा !
इस जीवन में ही ,न जाने कितने चरित्र निभाता है ?
प्रातः की उजली किरण से जी उठता है।
ओस की बूंदों में सपने संजोता है।
बूंदों को समेट नई कविता लिखता है।
प्रकृति से एकाकार कर ,धैर्य ,सीखता है।
जी उठता है ,विभिन्न रंगों में ,
कमरे में बैठे -बैठे ही इंद्रधनुष खींचता है।
लेखक का कमरा उसका अपना नहीं ,
लेखक उसमें सुख दुःख का संसार लिखता है।
कोयल की कूक पर ही नहीं ,
वो तो पतझड़ में भी ,जीवन खोजता है।
आज ही की नहीं,वो तो दूर की भी सोचता है।
रवि की तेज किरणों में ,मासूमियत ढूंढता है।
कभी देखा है तुमने, इक लेख़क का कमरा !
