Kiski dulhan [part 1]

सूरज पश्चिम की ओर जाते हुए, अंधियारे, गलियारों में कहीं खो चुका है , किन्तु रायगढ़ की हवेली ''भानुशिला ''सैकड़ों रंग -बिरंगी झालरों से सजी दूर तक किसी महल की तरह चमक रही थी। मुख्य द्वार पर फूलों की मेहराबें थीं, आँगन में विभिन्न रंगों की 'रंगोली 'बनाई गयी थी, और हर तरफ़ शहनाई की मधुर धुन गूँज रही थी। बच्चे रंग -बिरंगे नए -नए वस्त्र पहनकर इधर -उधर मस्ती में झूम रहे हैं। आज का दिन जैसे बच्चों की मस्ती का दिन हो। 


दामिनी ! उधर जाकर देखो ! हवेली के पिछले द्वार पर कुछ भी सजावट नहीं हुई है। मैंने पहले ही कहा था -हवेली का एक भी हिस्सा छूटना नहीं चाहिए और कुछ सजावटी झालरें हवेली के दाएं तरफ भी लगवाओ ! रत्नावली ने हवेली की मुख्य दासी दामिनी को काम समझाया। दामिनी तो उनका आदेश सुनकर चली गयी किन्तु वे बुदबुदा रही थीं -पता नहीं, ये क्या हो रहा है ? आज शादी है और अभी भी तैयारियां चल रहीं हैं ,यदि मैं ध्यान न दूँ ,तो ये लोग तो लापरवाही करतीं रहेंगी। 

आज इस हवेली में सिर्फ़ एक शादी नहीं है ,बल्कि आज दो प्रतिष्ठित परिवारों का मिलन होने वाला है ।लेकिन किसी को नहीं पता है  कि कुछ घंटों के पश्चात ही यही हवेली एक ऐसे रहस्य की गवाह बनेगी, जो तीन ज़िंदगियाँ हमेशा के लिए बदल देगी ।

दुल्हन के कमरे में ,लाल जोड़े में सजी मोहिनी आईने के सामने बैठी थी। माथे पर सिंदूरी चुनरी। सोने के गहनों से लदी वो लक्ष्मी स्वरूपा लग रही थी। हाथों में गहरी मेहंदी, जिसमें एक नाम छिपा था—रूद्र ! उसने अपने हाथों की मेहंदी को बड़े प्यार से निहारा और नाम पर बड़े हौले से उँगली फिराई और हल्की मुस्कान उसके होंठों पर आ गई ,उसने उस नाम को चूमा और शरमा गयी। 

उसकी ये हरक़त उसकी सहेली से छुप न सकी और उसे चिढ़ाते हुए कहा -हममहंमम !मेरी जान !अभी तो हमारे होने वाले जीजाजी का नाम देखकर ही इतना मुस्कुरा रही हो... जब वो सामने होंगे ,तो क्या होगा ?लगता है ,शादी के बाद ,उनकी मोहब्बत में हमें तो भूल ही जाओगी।"

मोहिनी हँसी और बोली -"कुछ रिश्ते भूलने के लिए नहीं होते।"

लेकिन उसके मन में बार-बार वही दृश्य घूम रहा था, जब छह महीने पहले, पहली बार उसकी मुलाकात रूद्र  से हुई थी। शाम का समय था ,हल्की बूंदा -बांदी हो रही थी, वो शहर में सड़क किनारे खड़ी अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा में थी। न जाने, आज इस ड्राइवर को क्या हो गया ?अभी तक नहीं आया ,मोहिनी परेशानी में वहीं आस -पास टहल रही थी। 

तभी सामने ही सड़क पर,सबके देख्ग्ते ही देखते एक बच्चा गाड़ी के आगे आ गया। लोग वहां खड़े होकर कुछ तो स्थिति को समझने का प्रयास करने लगे। कुछ तमाशा देख रहे थे , उस बच्चे के आस -पास भीड़ एकत्र हो गयी। तभी भीड़ को चीरते हुए एक युवा आगे आया और वो बिना किसी से कुछ पूछे  ,देर किये बैगर घायल बच्चे को उठाकर अस्पताल की तरफ भागा।

 ये व्यक्ति और कोई नहीं ,रायगढ़ की हवेली 'भानुशिला ' के' विक्रम सिंह  जी 'का बड़ा पुत्र रूद्र प्रताप था। जो स्वभाव से शांत, मितभाषी ,एक जिम्मेदार व्यक्ति था। 

उस दिन मोहिनी  ने पहली बार महसूस किया - कि किसी इंसान की पहचान उसकी दौलत से नहीं, उसके कर्म भी होते हैं।''तब तक मोहिनी का ड्राइवर भी आ चुका था। मोहिनी ने जानना चाहा -आख़िर ये आकर्षक व्यक्तित्व का धनी कौन है ? जिसके मन में इंसानियत भी बसती है। 

कुछ दिनों के पश्चात , मोहिनी का ड्राइवर, रूद्र प्रताप की सम्पूर्ण जानकारी लेकर मोहिनी के सामने उपस्थित हुआ। अब मोहिनी को पता चला रूद्र भी, इस शहर में पढ़ने के लिए ही आया है। अब तो मोहिनी, रूद्र से मिलने के बहाने खोज रही थी। संयोग से एक दिन वो दोनों आमने -सामने टकरा ही गए ,जब कॉलिज के कुछ विद्यार्थी 'पिकनिक' मनाने के लिए जा रहे थे। 

मोहिनी, रूद्र के विषय में जानती थी किन्तु' रूद्र 'मोहिनी को नहीं जानता था। 

क्या मैं, इस जगह पर बैठ सकती हूँ ,एक मधुर स्वर रूद्र के कानों में गूंजा ,रूद्र ने सिर उठाकर देखा तो  देखता ही रह गया। रेशमी काले घने घुंघराले बाल ,जिनको बड़े क़रीने से सजाया गया था। बड़ी -बड़ी कजरारी आँखें जो उससे कुछ कहना चाहती हैं। उसकी एक मुस्कान पर जाने कितनी जागीरें क़ुरबान कर दें। अपलक उसे अपनी ओर देखते देखकर मोहिनी मुस्कुराई और बोली - ए ! क्या देख रहे हो ?क्या साथ में कोई है ?मोहिनी ने, ऐसा जानबूझकर कहा। 

न..नहीं, कोई नहीं है ,आप बैठ सकती हैं ,हकलाते हुए रूद्र ने कहते हुए ,उसे जगह दे दी। 

धन्यवाद !कहते हुए उसने रूद्र की तरफ अपना हाथ बढ़ाया -मोहिनी !

जी !

मेरा नाम 'मोहिनी' है ,मुस्कुराकर बोली। 

रूद्र ने भी आगे हाथ बढ़ाया और बोला -रूद्र ! रूद्र प्रताप सिंह !इससे पहले कि वो हाथ मिलाता ,मोहिनी ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसके इस व्यवहार से रूद्र थोड़ा सकपका गया ,उसकी शक़्ल देखकर मोहिनी को हंसी आ गयी। मोहिनी हंसी, उसकी हंसी रूद्र को नन्हें घुंघरुओं की खनक सी लग रही थी। हम एक ही कॉलिज में हैं किन्तु आज तक आपसे कभी मुलाकात नहीं हुई। 

यही तो मैं भी सोच रहा हूँ ,कहते हुए अपनी पानी की बोतल निकालकर पानी पीने लगा और अपनी पानी की बोतल मोहिनी की तरफ बढ़ा दी। आप लेंगी ,मोहिनी ने बिना कुछ कहे ,उसके हाथ से बोतल ले ली। पानी पीकर बोतल वापस करते हुए बोली -धन्यवाद !

आप बात -बात पर धन्यवाद करती हैं। 

नहीं ,ऐसा नहीं है ,जहाँ जरूरत न हो,वहां कैसे करूंगी ? वो हंसी और बोली -आपने मुझे बैठने के लिए जगह दी ,पीने के लिए पानी दिया ,धन्यवाद !तो बनता है। उसके चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान बनी हुई थी ,जो उसके ह्रदय की प्रसन्नता को व्यक्त कर रही थी। आप कहाँ रहते हैं ? 

रायगढ़ ! 

अच्छा ! कहीं आप रायगढ़ की हवेली के साहबज़ादे तो नहीं ,मोहिनी व्यंग्य से बोली। 

आपने सही कहा ,रायगढ़ की हवेली 'भानुशिला ''हमारी ही है। 

क्या बात कर रहे हैं ?आश्चर्य से उसने पूछा। रस्ते भर दोनों एक -दूसरे से बातें करते रहे ,या यूँ कहें ,एक -दूसरे को ज़्यादा से ज़्यादा समझना चाहते थे। एक दूसरे के साथ वक़्त बिताना चाहते थे। 

उसी दिन से दोनों में दोस्ती हो गयी ,अब धीरे-धीरे उनकी  मुलाकातें बढ़ने लगीं। मिलते -मिलाते न जाने कब दोनों को एक -दूजे से प्रेम हो गया ?उन्हें पता ही नहीं चला। 

और आज...वो उसी अज़नबी इंसान की दुल्हन बनने जा रही थी ,सोच -सोचकर मन ही मन वो मुस्कुरा रही थी। 

उधर हवेली के दूसरे हिस्से में शेरवानी पहने रूद्र अकेला खड़ा हुआ था।आज उसका अपनी मनपसंद लड़की के साथ विवाह है किन्तु उसके चेहरे पर वैसी खुशी नहीं थी, जैसी एक दूल्हे के चेहरे पर होनी चाहिए ।

तब उसका सबसे करीबी मित्र कबीर उसके पास आया और उसने पूछा -"क्या बात है? क्या कुछ हुआ है ,तू  कुछ लग रहा है। 

रूद्र  ने धीमी आवाज़ में कहा -"आज मुझे खुश होना चाहिए किन्तु न जाने क्यों ?अजीब सी बेचैनी हो रही है।"

"क्या शादी का डर सता रहा है ? उसने मज़ाक किया। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post