Zeenat [part 51]

 आज तक ज़ीनत से किसी ने इस तरह से बात नहीं की थी ,उसके साथ ये लोग,जो भी व्यवहार कर रहे थे ,उसे महसूस कर ज़ीनत को ,उन पर गुस्सा आ रहा था। घर में माता -पिता ने बड़े लाड़ -प्यार से पाला ,कभी -कभार उसे सलमा ही उसे डांट देती थी। वो भी तब ,जब उसके साथ वो हादसा हुआ। अब जब घर से बाहर निकली है तो लोगों के व्यवहार ,उनकी चुभने वाली नजरें ,उसके अंदर एक अज़ीब से हालात पैदा कर रहीं हैं और अब पुलिसवाले की फटकार सुनकर उसे गुस्सा आया। 

 ज़ीनत ने, उस पुलिसवाले को घूरा और अपना सामान उठाया और बच्चों को साथ लेकर ऐसी जगह की तलाश में चली गई ,जहां उसे कोई, रोक न सके।


अपना थैला और बच्चों को लेकर, ज़ीनत  सुनसान जगह की तरफ चल दी।  तब एक पेड़ के नीचे  बैठ गई और अपने बच्चों को खाना खिलाने लगी।

 जब सलमा, उसके साथ थी, तब उसने कभी अपने बच्चों के लिए खाने की फ़िक्र नहीं की। न ही कभी सोचा किंतु अब उसे अपने बच्चों की परवाह थी। खाना खाकर और पानी पीकर बच्चे वहीं  लेट गए। ज़ीनत  को भी भूख लग रही थी और वह उस दुकानदार का इंतजार करते-करते सो गई। दुकानदार ने अपने ग्राहकों को निपटाया और दुकान में काम कर रहे, लड़के को दुकान सौंपकर ज़ीनत की तलाश में, उसे ढूंढते हुए, उसी  पेड़ के नीचे पहुंच गया। 

उसे वहां सोते हुआ देखकर, उसने पूछा - क्या तू यहां ठहरी है ? उसने, उसके बच्चों की तरफ देखा। बच्चे  अभी छोटे  हैं। वो सोच रहा था ,यदि बच्चे बड़े होंगे ,अपनी दुकान पर बैठा देगा।  

  ज़ीनत उसकी आवाज सुनकर उठ बैठी और उससे पूछा - कहां जाऊ ? मेरा यहाँ घर नहीं है। 

तू कहाँ से आई है ? 

बलेली ! 

दुकानदार को कुछ भी समझ नहीं आया ,ख़ैर छोडो ! वह दुकानदार अधेड़ उम्र का था ,उसकी पत्नी  मर चुकी थी। बच्चे काम के लिए बाहर चले गए थे, अकेला रहता था। उसने सोचा, इसको सहारा हो जाएगा और मुझे भी....  मेरे लिए रोटी बना दिया करेगी और इसे छत मिल जाएगी। यह सोचकर उसने ज़ीनत  से कहा -आ ,चल !मेरे साथ, तुझे घर दिखलाता हूं।

 ज़ीनत अपना सामान  उठाकर, उसके पीछे-पीछे चल दी। तुम, मुझे कहाँ ले जा रहे हो ? 

तुझे रहने के लिए कोई जगह चाहिए या नहीं ,क्या बच्चों के साथ यहाँ पेड़ के नीचे रहेगी ? पीछे इतना घना जंगल है, कोई ख़तरनाक जानवर इधर आ गया तो क्या करेगी ? बच्चों को उठाकर ले गया या फिर उन्हें नुकसान  हुआ। तो क्या करेगी ? 

मेरे पास पैसे नहीं है ,ज़ीनत ने जैसे पहले ही सारी बात बता देना, सही समझा। 

तुझसे पैसे कौन मांग रहा है ? तू मेरे घर में काम कर देना ,बदले में तुझे रोटी और रहने को छत मिल जाएगी। देख ! वो सामने मेरा घर है। कैसा लगा ?

अच्छा है ,मैं अब इस घर में रहूंगी। 

और क्या ? अब इसे तू अपना ही घर समझ ,कहते हुए उसने ताला खोला और ज़ीनत को अपना घर दिखलाया और उससे कहा - यह मेरा घर है , तू यहां एक कमरे में रह जाना। तेरे खाने -पीने का इंतजाम मैं  कर दूंगा। तू मेरे घर को ठीक-ठाक करना, मेरा घर संभालना। 

ज़ीनत ने हाँ में गर्दन हिलाई , तब वो बोला -अभी मैं वापस अपनी दुकान पर जा रहा हूं , शाम को आऊंगा , कह कर चला गया किन्तु बाहर से ताला लगाकर गया। अभी भी उसे ज़ीनत पर भरोसा नहीं था।  

शाम को जब वह दुकानदार अपने घर आया , तो उसने देखा -ज़ीनत तो ऐसे ही बैठी हुई है। हां, घर की उसने अच्छे से साफ- सफाई की है। वह खुश हो गया उसने सोचा -खाना भी बना दिया करेगी। आज तो वह शाम के लिए, अपनी दारू और खाने का इंतजाम करके आया था। जिस तरह से ज़ीनत उसका कहना मान रही थी ,उस हिसाब से उसे लग रहा था ,ये उसके मंसूबों को क़ामयाब होने में कोई अड़चन नहीं डालेगी। 

शाम को उसने जीनत को अपने पास बैठाकर खाना खिलाया उसके बच्चों को भी खाना खिलाकर सुला दिया। जब ज़ीनत सो रही थी ,तब वह उसके समीप आकर लेट गया। मन ही मन डर रहा था , कहीं यह शोर न मचा दे या विरोध न करें! किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ , वह तो जैसे, उसके इंतजार में ही थी। उसने ज़ीनत को धीरे -धीरे छेड़ना शुरू किया ,कोई विरोध न देखकर उसका साहस बढ़ गया। बहुत दिनों बाद, उसने स्त्री सुख महसूस किया था। उसे इस बात में कोई बुराई नजर भी नहीं आई , कि यह मेरे यहां रहेगी , और मेरा काम कर दिया करेगी और शाम को हम दोनों साथ रहेंगे। तभी उसे घबराहट हुई कहीं इसका पति इसे ढूंढते हुए न जाए। 

तब उसने पूछा -तेरा पति कहां गया है ?

मेरा पति तो मुझे छोड़ कर चला गया। 

क्यों चला गया ?

पता नहीं, कह कर वो उससे लिपट गई ,शायद इसे भी पति सुख नहीं मिल रहा था ,तभी तो ये आसानी से तैयार हो गयी।  

ज़ीनत को इस बात से कोई मतलब ही नहीं था, कि यह पुरुष कौन है ? अपना है या पराया है , उसके  पेट की और शारीरिक दोनों इच्छाओं की पूर्ति उस दुकानदार ने की है। वह उसका एहसान भी नहीं समझ रही थी , न ही उसे यह कुछ गलत लग रहा था किंतु इतने अपमान के बाद यह सब उसे अच्छा लग रहा था। वो उसके साथ पत्नी की तरह रहने लगी। इससे ज्यादा की ज़ीनत में न ही समझ थी ,न ही सोच !

दो -तीन दिनों तक तो वह बाहर से खाने का सामान लाकर उसे खुश करता रहा ,और स्वयं भी स्त्री सुख भोगता रहा तब उसने ज़ीनत से कहा - तू खाना क्यों नहीं बनाती ? बाहर से खाना कब तक मंगवाएंगे ?

मुझे खाना बनाना क्या मुझे तो चाय बनानी भी नहीं आती। 

क्या तुझे खाना बनाना नहीं आता है ?आश्चर्य से उसने ज़ीनत की तरफ देखा। 

नहीं ,मैंने कभी खाना नहीं बनाया। 

तेरा और तेरे बच्चों का पेट कौन भरेगा ? तुझे ,मैंने रहने को छत दी ,अब क्या तेरी ज़िंदगी भर की ज़िम्मेदारी मैं उठाऊंगा ,तेरा तो चलो !मान भी लो ! तेरे बच्चों को भी पालना पड़ेगा। ऐसे नहीं चलेगा ,मैं तो सोच रहा था मेरी दो रोटियों का सहारा हो जायेगा ,इसका भी वक़्त कट जायेगा।

ज़ीनत को भी गुस्सा आया और बोली -क्या, तू मुझे छेड़ता नहीं है ,मेरे साथ सोता नहीं है। अपने घर में रख रहा है ,तो बदले में, मैं भी तेरा घर साफ करती हूँ ,तेरे साथ सोती हूँ। 

अब तक ज़ीनत उससे कभी ऐसे नहीं बोली थी ,वो सब जानती थी किन्तु उसकी मज़बूरी उससे ये सब करवा रही थी। ज़ीनत के इस तरह बोलने पर उस दुकानदार को उस पर गुस्सा आया ,उसे लगा ,इसे घर में क्या जगह दे दी ? ये तो सिर पर चढ़कर ही बोलने लगी।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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