Zeenat [part 50]

 ज़ीनत बिना टिकट लिए ही, बस में चढ़ गयी थी ,जैसे सब लोग चढ़ रहे थे। उसके पास टिकट न देखकर कंडक्टर ने ,उसे बीच रास्ते में ही उतार दिया ,जबकि वो ये भी नहीं जानती थी कि उसे जाना कहाँ है ?

 ज़ीनत को कुछ समझ ही नहीं आया , वह नहीं जानती थी, उसे कहां जाना है ? ज़ीनत के हाव -भाव देखकर रिक्शे वाला भी आगे बढ़ गया ,''वो समझ गया ,'कोई वक़्त की मारी है।''

ज़ीनत वहीं एक जगह देखकर सड़क के किनारे बैठ गई। लगभग  एक घंटा, दो घंटा ,बैठी रही।  आते -जाते लोग उसे देखकर, आगे बढ़ जाते , उसके बच्चे फिर से भूख के कारण बिलख रहे थे। 


तब वो अपने बच्चों को वहीं छोड़कर , उनके खाने के लिए कुछ लेने चली गई। वह शायद भूल गयी थी ,सब चीजें तो पैसे में ही मिलती हैं ,पैसा उसके पास नहीं था।

इस पापी पेट को भरने के लिए ही तो लोग कमाने निकलते हैं और इस कमाई के लिए न जाने, कितने झूठ सच बोलते हैं ? तब जाकर दो रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं। ये पैसा भी न....  जिस पर होता है ,बेइन्तिहाँ होता है और कोई -कोई रोटी का जुगाड़ ही कर पाए ,वही बहुत है। किन्तु ज़ीनत को तो कमाने का कुछ पता ही नहीं था ,इस पेट की आग को बुझाने के लिए कमाना भी पड़ता है। अब तक उसे इसकी ज़रूरत ही  महसूस नहीं हुई । आज उसे पैसे की जरूरत है, तो नहीं जानती पैसा कहाँ से लाये ? पैसे से उसकी पहचान होती तो शायद घर से कुछ इंतजाम करके निकलती। 

ज़ीनत को तो ,जरूरतें पूरी होने से मतलब है ,वो उसकी अम्मी कर ही देती थी ,तभी तो, वो अम्मी से मदद मांगने गई थी, किंतु अब गुस्से के कारण, वहां से निकल तो आई लेकिन खाना तो बिन पैसे आता ही नहीं है। उसने कभी पैसे की जरूरत महसूस ही नहीं की ,जब आदिल भी साथ में था ,तब भी उसने  कभी, आदिल से पैसे नहीं मांगे ,वो भी अम्मी को ही खर्चे के पैसे दे देता था। बिना पैसे तो पेट भी नहीं भरता, क्या करें ?

सलमा का, अपनी बेटी के प्रति में जाने कैसा प्यार था ? यह कैसी मोहब्बत थी ? जिसने बेटी को लाचार बना दिया। उसने अपनी बेटी को, न ही पढ़ाया, न ही घर के कुछ काम -काज सिखाये , वह तो सोचती थी -शादी करके किसी अमीर घराने की'' ज़ीनत'' बन जाएगी, उसे क्या मालूम था ? कि उसकी ज़ीनत की नसीब में गलियों की ख़ाक बनना लिखा है।

ज़ीनत का निकाह करके भी, वह उसके घर को संभाल रही थी। तब भी सलमा ने, उसे यह नहीं सिखाया कि अब उसे एक जिम्मेदार मां और पत्नी बनना है। कभी-कभी डांट देती थी, किंतु फिर से उसके पास आ जाती थी। अनपढ़ होने के बावजूद कम से कम हिसाब लगाना तो सीख ही जाती। मोल -भाव करना तो सीख जाती। यह तो व्यवहारिक ज्ञान है , ज़ीनत को इतना भी नहीं आता था, उसकी मां के लाड -प्यार ने, ज़ीनत  को लाचार बना दिया था। 

 अब जिम्मेदारियाँ बढ़ जाने पर उसके भाई भी माँ को ही दोष दे रहे थे। जब घर में किसी को इतना प्यार और अपनापन मिले और उसके बाद लोगों की बेरुखी सहन करनी पड़े , तो व्यवहार में परिवर्तन होना लाज़मी है। 

ज़ीनत बच्चों को ऐसे ही बेसहारा छोड़कर उनके लिए कुछ खाने  इंतजाम करने जाती है। एक दुकान पर जाकर खड़ी हो जाती है। दुकानदार ने देखा ,वो सीधी सी दिखने वाली ,मजबूर औरत' जवान' है ,तब उसने पूछा - क्या चाहिए ?

उसने खाने के कुछ सामानों की तरफ़ इशारा किया। 

दुकानदार ने सामान थैले में भरते हुए पूछा - तुम कौन हो ? कहाँ रहती हो ?पूछते हुए उसने ज़ीनत की तरफ देखा और पूछा -कुछ और चाहिए ?

नहीं ,बस ये ही दे दो ! मैं आज ही यहां आई हूँ ,मेरे बच्चे भूखे हैं ,उनके  खाने के लिए कुछ लेने आई हूँ !

हाँ ,हाँ अभी देता हूँ ,कहते हुए उसने, ज़ीनत के सामने वह थैला रख दिया और उससे बोला - पचास रूपये लाओ !

मेरे पास तो पैसे नहीं है। 

इतना सुनते ही दुकानदार के तेवर बदल गए ,यहाँ तक की बातचीत का लहज़ा भी बदल गया। फिर यहाँ क्या लेने आई है ? भाग ! यहाँ से.... 

ज़ीनत ने कहा -मेरे बच्चे भूखे हैं ,रो रहे हैं। 

भीख मांग ले ,यहाँ क्यों आई है ? यहाँ भीख़ नहीं मिलती ,ज़ीनत वहीं खड़ी रही, वो ललचाई नजरों से उस खाने के सामान को देख रही थी, जैसे अब यहीं से उसे ,उसकी परेशानी का हल मिल सकता है। 

दुकानदार को लगा, कहीं ये चोरी करके भाग न जाये ,इसीलिए सतर्क रहा। वो बहुत देर तक वहीँ खड़ी रही ,दुकानदार उसे अपना ध्यान हटा लेना चाहता था किन्तु बरबस ही उसकी नजरें उस ओर चली जातीं। वो देख रहा था , इसने कपड़े तो ठीक -ठाक पहने हैं। भिखारी तो नहीं है,चोर भी नहीं लगती है।  तब उस दुकानदार ने, ज़ीनत को हाथ के इशारे से, अपने नजदीक बुलाया और बड़े प्यार से पूछा - तुमने कुछ खाया ?

नहीं ,

कुछ खाओगी। 

हाँ , पहले मेरे बच्चे !! 

तेरे बच्चे कहाँ हैं ?

वो उधर कहते हुए ,ज़ीनत ने हाथ उठाकर उसे बताया। 

उन्हें भी ले जाना,भूखे होंगे। पहले तू तो कुछ खा ले ! तब उसने ज़ीनत को हमदर्दी जतलाते हुए ,जलेबी ,समोसे दिलवाये  ,ज़ीनत को पहले से ही बहुत तेज भूख लगी थी ,वो दो मिनट में ही सब खा गयी। 

उसकी भूख देखकर उस आदमी ने पूछा -और खाएगी। 

हम्म्म्म !

अभी तेरे बच्चे भूखे होंगे ,उन्हें खाना दे आ ! मैं, तेरे खाने के लिए कुछ लेकर आऊंगा ,क्योंकि उसकी हमदर्दी लोगों के सामने उजागर हो सकती थी। आस -पास के लोगों की नजर में न आये इसीलिए वो बोला - मुझे, तू अपना घर बता दे ! कहाँ ठहरी है  ,तेरा घर कहाँ है ?

मेरा घर नहीं है, ज़ीनत ने ललचाई नजरों से उस खाने को देखा, क्योकि अभी तक तो वो पानी पीकर अपनी भूख मिटा रही थी किन्तु अब थोड़ा खाना खाते ही,उसकी भूख और बढ़ गयी। 

तेरा पति कहाँ है ?

पता नहीं ! मुझे छोड़कर चला गया। 

दुकानदार समझ गया ,इसके साथ कोई नहीं है। शायद इसके  सीधेपन या फिर बातचीत से ये पगली सी लग रही है इसीलिए इसका पति इसे छोड़कर चला गया है। तू चल, मैं अभी आता हूँ। तेरे लिए और खाना लेकर आऊंगा । तेरे बच्चे कहाँ है ? ज़ीनत ने हाथ से इशारा कर ,उसे बताया। अब तू जा ! मैं अभी तेरे लिए खाना लेकर आता हूँ। 

वहां बैठे-बैठे बच्चों को जब  बहुत देर हो गई,तब वे रोने लगे। तब एक पुलिस वाले ने उन्हें देखा, वो बच्चों से पूछ रहा था -तुम्हारी माँ कहाँ है ? किन्तु बच्चे रोये जा रहे थे ,वो क्या जबाब देते ? 

तभी उसे ज़ीनत आती दिखलाई दी ,जब ज़ीनत वहां पहुंची तो तब उस पुलिसवाले ने उसे डांटा और पूछा -क्या ये तेरे बच्चे हैं ?

हाँ ,

यहां सड़क किनारे क्या कर रही हो ? छोटे -छोटे बच्चों को छोड़कर कहाँ चली गयी थी ? इन्हें उठाओ !अपने घर जाओ ! यहां सड़क पर गाड़ियाँ चलती रहती हैं , कोई बच्चा गाड़ी के नीचे आ गया तो क्या होगा ?  चलो ! यहां से भागो ! 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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