ज़ीनत की हालत वैसे ही थी ,उसकी हालत में और कोई सुधार न देख ,सलमा ने उसे डॉक्टर को दिखाया ,डॉक्टर ने उसकी जाँच की ,तब उसने पूछा - क्या इसने कोई दवाई खाई हैं ?
जी ,हकीम साहब की दवाई खा रही थी।
मुझे लगता है ,वो दवाई बहुत गर्म थीं ,जिससे इसकी हालत ऐसी हुई है।
क्या करते? डॉक्टर साहब ! ये तो गूंगी ही हो गयी थी ,इसीलिए इसका इलाज़ करवाया ,उनकी पुड़िया से कम से कम ये थोड़ा -थोड़ा बोलने तो लगी।
क्या इसका विवाह हो गया ?
नहीं तो, क्यों ?
अब आप इसका विवाह करा दीजिये, धीरे -धीरे सब ठीक हो जायेगा ,कहते हुए उन्होंने दवाई लिख दीं।
ज़ीनत ,घर में भी इधर -उधर घूमती रहती, उसके मन में अज़ीब सी बेचैनी रहती।कभी -कभी अपने आप से ही बात करने लगती।
उसकी हालत देखकर सलमा सोचती क्या करें ? उसकी अम्मी ने ज़ीनत की हालत देखकर, उससे काम भी नहीं करवाया।
तब एक आदमी की नजर ज़ीनत पर पड़ी, जो वहीं पास में एक घर में अकेला रहता था और अपने काम के सिलसिले में उस कस्बे में आया था। देखने में तो ज़ीनत बहुत खूबसूरत थी, किंतु अब हालात कुछ ऐसे हो गए थे ,वो अपने में ही रहती थी ,किसी से कुछ कहती -सुनती भी नहीं थी। चीजों को भूल जाती थी ,उसकी याददाश्त भी कमजोर हो गई थी। जबान से हकलाने लगी थी, फिर भी उस आदमी का, उस पर दिल आ गया और उसने जीनत का रिश्ता, सलमा से मांगा।
'अंधे को क्या चाहिए ?दो आँखें !'सलमा तो चाहती थी, किसी तरह से यह जिम्मेदारी पूरी हो और उसने उस आदमी के सामने अपनी परेशानियों का रोना रोया।
आप परेशान मत होइए ! बस कम ख़र्चे में ही निक़ाह का बंदोबस्त कर दीजिये ,निक़ाह होते ही आपकी ज़िम्मेदारी ख़त्म !
हम तो तुम्हें ठीक से जानते भी नहीं ,क्या करते हो ,किस गांव से हो ?
आदिल ने बताया -'कि वह यहां पर कभी-कभी काम के सिलसिले में आता है और दूर शहर में रहता है।वहां मेरा अच्छा घरबार है ,अम्मी -अब्बू हैं ,परन्तु अभी मैं वहां नहीं जाता हूँ। अभी तो काम के सिलसिले में यहीं पर हूँ ,जब अपने घर जाऊंगा ,इसे भी अपने साथ ले जाऊंगा।
सलमा को बड़ी खुशी हुई ,चलो ! एक अच्छा , लड़का उसकी ज़ीनत के लिए मिल ही गया। वो भी अब ज़ीनत की जिम्मेदारी से निज़ाद पाना चाहती थी। उसकी हालत भी अब ऐसी थी ,डॉक्टर ने उसकी शादी के लिए कह दिया था।
छोटा सा कार्यक्रम करके उन्होंने मिलजुलकर ज़ीनत की शादी उससे करवा दी और वह ज़ीनत को लेकर अपने घर आ गया। पड़ोस में ही तो रहते थे ,किन्तु अब ज़ीनत, आदिल के संग रहने लगी थी । यह सब बातें बताते हुए ,ज़ीनत के चेहरे पर मुस्कान थी।
भूमि ने महसूस किया ,आज भी ज़ीनत अपने शौहर को बहुत याद करती है ,उसकी याद उसे बेचैन कर देती है। कभी -कभी वो अपने बुढ़ापे को सोचकर भी चिंतित होती है और कहती है - बाज़ी !एक बात पूछूं !क्या मेरी ज़िंदगी यूँ ही कट जाएगी।
अभी, तूने पूरी बात कहाँ बताई ? क्या तेरा शौहर तुझे प्यार नहीं करता था ?उसने तुझे कैसे रखा ? अब वो कहाँ है ?
आदिल ने,तो मुझे बड़े प्यार से अपने घर में रखा था ,उसके प्यार और अच्छे व्यवहार के कारण बहुत दिनों के बाद सलमा ने ज़ीनत के चेहरे पर मुस्कान देखी थी ।
आदिल मियां अच्छे हैं ,तुझसे प्यार करते हैं ,सलमा ने जानना चाहा।
मुस्कुराकर ज़ीनत ने कहा - हाँ अम्मी ! वो तो मुझे बहुत चाहते हैं।
बस मेरी बच्ची ,अपना और उसका अच्छे से ख़्याल रखना अपनी दवाई टाइम से लेती रहना। वो तुझे बहुत प्यार करेगा। हालाँकि आदिल, ज़ीनत से नौ -दस साल बड़ा था किन्तु सलमा को इस बात की ख़ुशी थी ,इसका घर बस गया। अब उसे, ज़ीनत के लिए इससे अच्छे रिश्ते की उम्मीद भी नहीं थी।
आदिल के ज़ीनत के साथ कुछ दिन सुख - चैन से बीते, अभी तक वह यही सोच रहा था -यह शरमा रही है , धीरे-धीरे खुलने लगेगी तो, घर भी संभाल लेंगी। आदिल ने,ज़ीनत के साथ खूब मौज -मस्ती की लेकिन जब ज़ीनत हकलाकर बोली - तब उसे, उसकी हालत का पता चला।
सलमा ने पहले समझाकर भेजा था ,दुल्हेमियां के सामने कम ही बोलना ,हाँ ,हूँ में गर्दन हिलाना और अब आदिल को यह भी पता चला कि इसे तो घर का कोई काम आता ही नहीं है।
आदिल ने एक दिन ज़ीनत की शिकायत सलमा से की और कहा -आपने इसे कुछ भी नहीं सिखाया ,इसे तो कुछ भी नहीं आता।
मैं आपकी परेशानी समझ सकती हूँ ,हम भी अच्छे ख़ानदान से हैं ,हमारे घर में बावर्ची था ,और घर के कामों के लिए नौकर थे इसीलिए हमने इसे कभी काम सिखाया ही नहीं ,जरूरत ही नहीं पड़ी ,सोचा था -ऐसे ही किसी अच्छे ख़ानदान में इसका रिश्ता हो जायेगा किन्तु नसीब को तो कोई बदल नहीं सकता ,जो नसीब में लिखा है ,वो होकर रहता है।
मैं अच्छा कमाता हूँ किन्तु इतना भी नहीं ,जो बावर्ची और नौकरों का ख़र्चा उठा सकूँ ,आप इसे काम सिखाइये !
ठीक है ,मैं कोशिश करती हूँ ,सलमा ने आदिल से वायदा किया।
दोपहर में, उसने ज़ीनत को बुलाया और कहने लगी - कोई भी शौहर अपनी नाकारा बीवी को नहीं रखेगा ,अगर तूने काम नहीं सीखा ,तो वो तुझे छोड़कर चला जायेगा। उसके कपड़े धोना ,उसके लिए रोटी बनाना तो सीख ले। सलमा ने सोचा ,जब तक ये थोड़ा बहुत काम सीखती है ,तब तक खाना बनाकर मैं भेज दिया करूंगी। ज़ीनत के घर में जाकर ,उसे सामान संभालना सब सिखाती।
तभी एक दिन उन्हें पता चला ,ज़ीनत पेट से है ,यह बात सुनते ही आदिल का गुस्सा ,मन की परेशानी उड़नछू हो गए। अब वो खुश रहने लगा ,और ज़ीनत को किसी भी बात की परेशानी न हो ,ज्यादा से ज़्यादा पैसे कमाने की सोचने लगा। अब तक सलमा ही सब संभाल रही थी ,अब सलमा की जिम्मेदारी और बढ़ गयी थी।
तब सलमा ने ,एक अच्छी सी लड़की देखकर,तैमूर की शादी भी करवा दी ,उसकी पत्नी अपना घर संभालती और सलमा बेटी का घर देखती ,रात में अपने घर आ जाती।
नौ महीनों के बाद ,ज़ीनत एक बच्चे की माँ बन गयी। सलमा ने ही ,उसे और उसके बच्चे को संभाला। आदिल ने महसूस किया। ज़ीनत को उसका इंतज़ार रहता है ,उसकी भूख और प्यार के लिए नहीं ,वरन वो उससे आते ही लिपट जाती। दिनभर का थका -हारा कभी -कभी झुंझला जाता। कभी -कभी उसे, ज़ीनत पर बहुत प्यार आता। ज़ीनत में यौनइच्छा बहुत अधिक थी। जिसका परिणाम यह हुआ ,उसका बेटा अभी छह महीने नहीं हुआ था। वो दुबारा माँ बनने जा रही थी।
सलमा को अच्छा तो नहीं लगा किन्तु सोचा-' बेटी का परिवार बढ़ रहा है ,अच्छा ही है। अब आदिल घर के खर्चे के पैसे सलमा को दे देता। दो बच्चों की ज़िम्मेदारी उस पर आ गयी थी। सलमा की भी उम्र हो चली थी। वो भी थकने लगी थी किन्तु बेटी की ख़ुशी के लिए ,उसका घर बसा रहे ,वो सब बर्दाश्त कर रही थी। ज़ीनत को न बच्चों की परवाह थी न ही घर की ,उसे तो बस आदिल और आदिल की मुहब्बत चाहिए।
