Zeenat [part 45]

एक दिन  ज़ीनत से उसकी अम्मी पूछ रही थीं  - क्या तुम भी अपने भाइयों के साथ वहां गयीं थीं ?

ज़ीनत ने हाँ में गर्दन हिलाई। 

वहां तुमने क्या देखा ? ख़ालिद ,क्या कह रहा था ?

ज़ीनत ने, सोच कर बताने की कोशिश की, किंतु उसके मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे उसकी आवाज गले में ही दब कर रह गई है अथवा उसकी आवाज़ का किसी ने दम घोंट दिया हो। 


उसने बहुत कोशिश की किन्तु कुछ न हुआ ,जब सलमा ने उसे अपने गले से जद्दोज़हद करते देखा तो उससे पूछा -तू बोल क्यों नहीं रही है ? उसने हाथ के इशारे से कहा आवाज नहीं निकल रही ,बताते हुए उसकी आँखों में आँसू आ गये।

 हाय मेरी बच्ची को, क्या हो गया ? दिन पर दिन परेशानियां बढ़ती जा रही थीं। हाय अल्लाह ! ये अब क्या नई मुसीबत आ गयी ,लड़की की आवाज़ ही नहीं निकल रही है। मुसीबत पर मुसीबत आ रहीं हैं। इतने दिनों से इसकी आवाज़ ही नहीं सुनी।

  हकीम साहब को फिर से बुलाया गया , उन्होंने ज़ीनत के गले का मुआयना किया और बोले -लगता है , किसी सदमे के कारण या किसी चीज को देखकर, इसकी आवाज चली गई है। इसकी ऐसी हालत कब से है ?

हक़ीम साहब !ये तो हमें भी नहीं मालूम ,जबसे इसके अब्बू गए हैं ,हमें तो होश ही नहीं रहा,इस पर ध्यान दें  ये भी सारा दिन अपने कमरे में पड़ी रहती थी। हमारा ध्यान ही नहीं गया कि इसके साथ ऐसा भी कुछ हो सकता है। 

 हक़ीम साहब उसके गले का मुआयना करते रहे,तब बोले -मुझे लगता है ,इसे अपने अब्बू के जाने का सदमा लगा है ,उसी सदमे से इसकी आवाज भी चली गयी है। अब शायद यह कभी नहीं बोल पाएगी। मैं कुछ पुड़िया दे रहा हूँ। अल्लाह ताला की मेहर हुई तो इसकी आवाज़ आ जायेगी । 

उनकी बात सुनकर सलमा ने सिर पीट लिया और बोली - या खुदा ! ये सब  हमारे साथ ही क्यों  हो रहा है ? किन बुरे कर्मों की सजा हमें मिल रही है ? एक से एक नई मुसीबतें हमारे सिर पर आ पड़ी हैं। सोच कर ही उसकी रूह हिल गई। पहले इसका रिश्ता टूटा , इसकी इज्जत गई , इसके अब्बू नहीं रहे और जिससे इसका निकाह होना था, वह भी नहीं रहा। उसके दोनों भाई हत्यारे हो गए। कभी न कभी तो पुलिस इन्हें  भी ढूंढ ही लेगी।वो अकेली औरत कैसे इतनी पहाड़ सी मुसीबतों का सामना करेगी ?

अकेले में सलमा से पूछा -तेरी ये हालत कबसे है ?किन्तु उसके पास कोई जबाब नहीं था।

 जब दोनों भाइयों को पता चला ,तब याकूब बोला -अम्मी !जब हम ख़ालिद को पीट रहे थे ,तब तो ये बहुत  चिल्ला रही थी। 

मुझे लगता है ,जब तुमने ख़ालिद को मारा ,इसने देखा होगा ,दहशत से इसकी आवाज चली गयी।  उसके तेज दिमाग ने काम किया और वह अपने बच्चों से बोली -  अब हमें यहां और नहीं रहना है। 

अम्मी ! यह क्या कह रही हैं ? वैसे ही कारोबार में घाटा चल रहा है। यहां नहीं रहेंगे तो कहां जाएंगे ?याकूब  ने पूछा।

 हम इस घर को बेचकर , किसी और शहर में चले जाएंगे, किंतु यहां नहीं रहेंगे। सबको यही लगेगा ,अपने पिता के चले जाने पर बच्चों से कारोबार नहीं सम्भला और सब कुछ बेचकर चले गए। अब यह जगह मुझे भी मनहूस लगने लगी है।

 जल्दी से जल्दी इस घर के दाम लगवा कर ,हमें यहां से निकल जाना चाहिए इससे पहले की पुलिस  हम तक पहुंचे।

अम्मी! आप नाहक़ ही ड़र रहीं हैं ,अभी तक तो किसी को कुछ पता भी नहीं चला है  याकूब ने कहा। 

बुरा वक़्त  कहकर नहीं आता,हालाँकि मैं जानती हूँ ,तुम पर किसी का शक़ नहीं जायेगा ,जब तक तुम्हारे वे लड़के मुँह न खोलें किन्तु अब मुझे यहाँ नहीं रहना है। हमारे साथ जो भी हो रहा है ,गलत ही हो रहा है।

याक़ूब और तैमूर को भी यह बात सही लगी और सोचने लगे - जो पैसा मिलेगा उससे एक छोटा सा घर ले लेंगे और नया कारोबार शुरू कर देंगे। यहां पर कोई तरक्की भी नहीं हो रही है ,कर्ज़ा भी बढ़ रहा है ,उसे चुकाकर कहीं और निकल जायेंगे।   

हकीम साहब ने,ज़ीनत को कुछ पुड़िया दी थी, और उससे कहा था-'' इसको बुलवाने की कोशिश कीजिए  यह अपने जीभ को उठाएं और उससे बोलने की कोशिश करें ,दवाइयों ने थोड़ा असर दिखाया। किंतु अब उसके शब्द स्पष्ट नहीं थे, पहले जैसा नहीं बोल पा रही थी, अटक रही थी ,कुछ शब्दों को तुतलाकर बोलती थी। सलमा को थोड़ा सा सुकून हुआ कि कम से कम, कुछ तो बोल सकती है। 

कुछ ही महीनों में, उन्होंने वह घर बेच दिया और रातों-रात कहां चले गए ? किसी को पता नहीं चला।

 उधर वाहिद के अब्बू खालिद को ढूंढने में लगे हुए थे, खालिद हो गए हुए ,कई  महीने हो गये  थे  न जाने, वह कहां गया है ? किसी से कुछ कहकर भी नहीं गया।  उन्होंने अब ज़ीनत से उसके निकाह की बात भी नहीं की, क्योंकि उन्हें भी पता चल गया था कि ज़ीनत गूंगी हो गई है, बोल नहीं पाती है और अब तो यूसुफ़ भी इस दुनिया में नहीं रहा ।  

एक नए छोटे शहर में वह लोग पहुंच गए, वहां सभी अनजान थे।  कोई, किसी को नहीं जानता था ,ना ही किसी का डर था। किंतु इस तरह से तो रहा नहीं जा सकता था किसी को तो जानना ही पड़ेगा ताकि वह एक घर ले सकें , कारोबार शुरू कर सके, किसी से तो बातचीत करनी पड़ेगी। 

कुछ दिनों के लिए  किराए पर रहने लगे, दोनों भाई बाहर जाकर कोई छोटा-मोटा काम धंधा करते। वे  पैसे को बर्बाद नहीं करना चाहते थे। ज़ीनत अपने में खोई रहती ,हर रोज, उसकी हालत खराब सी होती जा रही थी।  उसे कुछ चीजें  याद भी नहीं रहती थी, भूल जाती थी। न जाने, इसे किस बात का सदमा लगा है ?

 सलमा अक्सर सोचती,इसका निकाह होने से रह गया ,जिसको चाहा वह नहीं मिला, जिससे निकाह होता वह मर गया और इसी की नजरों के सामने मारा और इसके अब्बू भी चल बसे।मैं भी समझ सकती हूँ ,मेरी बच्ची किन हालातों से जूझ रही है।  

बड़े घर को छोड़कर, अब यहाँ छोटी सी गलियों वाले एक किराए के घर में  रह रहे थे। दोनों भाई जी तोड़ मेहनत कर रहे थे और कोई सस्ता सा मकान भी ढूंढ रहे थे। सलमा ही अब घर के सारे काम करती ,तब उसने सोचा ,थोड़ा काम ज़ीनत को भी सिखा दिया जाये ,उसे सिखाने की कोशिश में कभी वो अपना हाथ काट लेती ,कभी कुछ गड़बड़ करती। तब सलमा बोली -चल तू घर की सफाई ही कर दिया कर....

ज़ीनत अपने में ही खोई रहती ,ज्यादा नहीं बोलती ,न ही बाल बनाती ,हालात तो ऐसे हो गए थे ,सलमा भी सारा दिन काम में लगी रहती उसे एक पल की फुरसत नहीं। उस घर को बेचकर जो पैसा मिला था ,वो अभी जोड़कर रखा हुआ था। 

 दो-तीन कमरों का सस्ता और अच्छा एक मकान मिल भी गया ,भले ही छोटा था किन्तु अपना था। तब तैमूर और याकूब ने अपना काम धंधा शुरू किया, एक दुकान खोली और दोनों मिलकर उसमें मेहनत करने लगे।

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post