Zeenat [part 43]

खालिद की मौत हो चुकी है ,यह बात जब सलमा को पता चली, तो उसकी रूह कांप गई और वह घबरा गई कि अब उसके घर पर मुसीबतें आने वाली हैं। कभी तो पुलिस को पता चल ही जाएगा, कि उसकी हत्या मेरे बच्चों के हाथों हुई है। अभी तो ये नादान हैं ,कम उम्र हैं किंतु पुलिस यह सब कहां देखती है ? वही तो हमें धोखा दे रहा था। मैं भी जानना चाहती थी कि  आखिर हमारी ज़ीनत  के साथ यह हरकत किसने की थी ? किंतु मुझे क्या मालूम था ? इतना सब कुछ हो जाएगा। 


युसूफ साहब, सलमा के चेहरे के भाव पढ़ रहे थे , और उन्हें अंदाजा हो गया था। जरूर कोई बात है , जो यह मुझसे छुपाने की कोशिश कर रही है और बताना भी चाहती है। तब उन्होंने बड़े प्यार भरे  लहज़े से उसको कमरे में अंदर बुलाया और उससे जानकारी लेनी चाही। तब सलमा से रुका नहीं गया और रोते हुए बोली - ज़ीनत के अब्बू ! बड़ी अनहोनी हो गयी। मुझे क्या मालूम था कि इतना सब हो जाएगा। 

हुआ क्या है ?कुछ बताओगी भी.... परेशान होते हुए उन्होंने पूछा। 

ख़ालिद अब इस दुनिया में नहीं रहा ,कहते हुए रोने लगी। 

 यह तुम क्या कह रही हो ? उन्हें तो जैसे सलमा की बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ। 

मैं सही कह रही हूं ,फिर से रोने लगी। 

ये तुमसे किसने कहा ? वो तो भला - चंगा था ,किसी ने तुम्हारे साथ मज़ाक किया होगा। 

नहीं ,वो अपनी मौत नहीं मरा है ,उसकी हत्या हो गई है  और उसकी हत्या हमारे बच्चों ने की है।

क्या ? यह तुम क्या कह रही हो ? बोलने से पहले सोच -समझ लिया करो !अभी तो वह इस दुख से ही नहीं उबरे थे कि जीनत का कहीं रिश्ता नहीं हो रहा है, और अब जिससे रिश्ता हुआ है। वो उसके ही भाईयों  के हाथों मारा जा चुका है, उन्होंने सलमा को एक जोरदार थप्पड़ लगाया , और बोले तुम कुछ भी बोल देती हो सोच समझ कर कह रही हो। जो कुछ भी अब तक तुमने, मुझसे कहा है, क्या वह सही था ? थप्पड़ मारकर शायद वे अपने आपको यक़ीन दिलाना चाहते थे ,कि ये जो कुछ भी कह रही है ,वह सब झूठ है।  

ज़ीनत के अब्बू  मैं झूठ नहीं बोल रही हूं, मैंने जो कुछ भी कहा ,सच है ,मुझे मारने से सच्चाई नहीं बदल जाएगी ,अभी-अभी मुझे, तैमूर ने बताया और याकूब उसकी लाश को ठिकाने लगाने गया है ? यह सुनकर युसूफ साहब ! धम्म से पलंग पर बैठ गए। उनके चारों तरफ की दुनिया उन्हें घूमती नज़र आने लगी। ऐसा लग रहा था, जैसे उनके शरीर में जान ही नहीं रही है। उन्हें कुछ भी सूझ  ही नहीं रहा था।

 हमारी जिंदगी में यह क्या चल रहा है ? तब वो बोले - यह बात किस-किस को मालूम है ? तैमूर ने ही मुझे बताया और वही जानता होगा कि ये बात  किस किसको मालूम है। वैसे ज़ीनत भी बेहोश ही थी अभी वह अपने कमरे में गुमसुम बैठी है। तब उन्होंने तैमूर को आवाज़ लगाई -तैमूर ! तैमूर ! यहां आओ !

 कुछ देर पश्चात, तैमूर वहां पर आया और उसने बड़े अदब और आराम से पूछा - क्या हुआ ?अब्बू ! 

नामाकूल ! बेग़ैरत ! यह पूछता है ,क्या हुआ ?अब्बू ! यह तुम लोगों ने क्या कर दिया ? तुम्हारी अम्मी क्या कह रही हैं, क्या वह सही है ?

 अब्बू यह बात तो सही है ,अब खालिद इस दुनिया में नहीं रहा, उसे इस दुनिया में रहना भी नहीं चाहिए,अचानक तैमूर को क्रोध आ गया। क्या आप जानते हैं ? उसने हमारी आपा  के साथ क्या किया है ?उसने जो कुछ भी किया वह माफी के लायक नहीं था। उसने जानबूझकर हमारी आपा  के साथ यह सब हरकतें की थी ताकि अहमद से उनका रिश्ता टूट जाए, और हुआ भी यही...

अब उसी से तो, निक़ाह हो रहा था ,बात यहीं सम्भल जाती,यूसुफ साहब बोले।  

 अभी भी उसके मंसूबे साफ नहीं थे , न  जाने, वह क्या करने वाला था ?

बहुत देर तक युसूफ मियां बैठे सोचते रहे, खालिद तो चला ही गया ,अब अपने बच्चों को कैसे बचाएं ? भाईजान !को  पता चला तो उन पर क्या बीतेगी ? तब घबरा कर बोले - यह बात किस-किस को मालूम है ?

 याकूब और याकूब के दो दोस्तों को, जिन्होंने उसका इस हत्या में साथ दिया, वह लोग पैसे के लिए काम करते हैं ,उन्हें पैसा मिल गया तो अपना मुंह नहीं खोलेंगे, वरना वे भी जेल में जाएंगे। बड़े भरोसे  के साथ यह सब उसने कहा। उन्होंने देखा , उसकी आंखों में एक यक़ीन था, साथ ही खालिद के प्रति नफ़रत  भी थी। 

इतनी कम उम्र में तुमने, यह सब कैसे किया ?

 हिम्मत करने के लिए, उम्र नहीं देखी जाती , अब्बू ! और गलत के ख़िलाफ़ उठने  के लिए, उम्र नहीं हिम्मत की ज़रूरत  है। 

उसका निक़ाह अपनी ज़ीनत से ही तो हो रहा था फिर उसे मारने की क्या जरूरत थी ? हिम्मत करके क्या हासिल होगा ,तुम समझते नहीं हो, तुमने क्या किया है ?तुमने भाईजान की  इकलौती औलाद को मार डाला ,जब उन्हें पता चलेगा तो क्या होगा ? 

उसको मारना जरूरी था , वह रुकने वाला नहीं था, मुझे आपा के प्रति उसके मन में कोई इज्ज़त नहीं दिख रही थी  , न हीं कोई प्यार था। उसने तो जैसे अपना बदला लिया था ,कह रहा था -''मैंने  सोच लिया था जो मेरी ना हो सकी, मैं उसे किसी और की भी होने नहीं दूंगा।' और उससे हम आपा की शादी  करते या नहीं करते ,उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे तो लगता है ,वह दहेज के लालच में आपा  को अपना रहा था। तमन्ना पूरी हो जाती और कुछ दिन बाद फिर वह उसको तलाक दे देता, तब हम क्या करते ?

 इतना सब सोचने की जरूरत नहीं थी ,तबकी तब देखी जाती, कुछ देर पश्चात, उन्हें बाहर अंधेरे में एक आहट सी हुई , सलमा  सोचने लगी , न जाने कौन आया है ?

उससे पहले ही तैमूर ने बाहर झांक कर देखा और बोला -याकूब ! तू आ गया। 

तब याकूब उस अंधेरे से बाहर निकलकर आया, उसके कपड़े खून से सने हुए थे। याकूब की हालत देखकर दोनों पति-पत्नी कांप गए , युसूफ मियां सोच रहे थे ,ये इन दोनों ने क्या किया ? ये दोनों भी जेल जायेंगे ,सोचकर ही उन्हें घबराहट होने लगी। 

 वाहिद भाईजान की इकलौती औलाद थी ,कैसा भी था ? उनका अपना बेटा था , अगर उन्हें पता चल गया तो वह कभी भी हमें  माफ़ नहीं करेंगे। तभी सलमा ने फुर्ती दिखाई और बोली -जल्दी से इन कपड़ों  को उतरो  और नहाकर, अपने बदन को साफ कर लो ! तब तक मैं इन कपड़ो को जला देती हूं। 

तैमूर, याकूब से पूछता है -तुमने उसका क्या किया ?


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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