Zeenat [part 42]

सैयद और नाज़िम , ख़ालिद को बहकाकर उससे कुबूल करवाना चाहते थे कि उसने ही ज़ीनत के साथ ऐसी ग़लत हरक़त की ,तब ख़ालिद ने ये बात मंजूर कर ली कि हाँ, उसने किसी लड़की के साथ ऐसा किया है किन्तु उसने, उस लड़की का नाम नहीं बताया। जब वे लोग 'फॉर्म हॉउस 'में पहुंचे तो ख़ालिद के तेवर बदल गए और उसने ,उन दोनों लड़कों को बांध दिया और ख़ुद उस कमरे में पहुंचा,जहाँ उस अनजान लड़की को बंद करके रखा गया था। वहां बुरखे में एक महिला ने उस पर आघात किया। ख़तरा भांपकर तब वो बाहर की तरफ भागा। 


ख़ालिद ने बाहर आकर देखा ,नाज़िम और सैयद वहां पहले से ही घात लगाए खड़े थे। तब दूसरी तरफ उसने , तैमूर और ज़ीनत को भी देखा। ज़ीनत चिल्ला रही थी -याकूब ! ये वही है , याकूब ! ये वही है । उन चारों ने ख़ालिद को घेर लिया। उसका हाथ पहले ही कट चुका था ,उससे खून बह रहा था। ख़ालिद इधर -उधर भागने लगा ,जिससे वो ज़्यादा देर तक भागने न पाए ,इसीलिए उन्होंने एक हथियार से तेज़ वार उसकी टांगों में किया। अब वो टाँग टूट जाने के कारण, अपाहिज़ हो गया और 'ज़मीन पर धूल चाटने लगा।

 '' तब वे चारों उसके क़रीब आये और उससे पूछा -अब बता ! ज़ीनत को तू ही उठाकर ले गया था ,न.... नहीं बताएगा ,तो तू तब भी मरेगा ,बता देगा, तो बच जायेगा ,तैमूर ने पूछा। 

हाँ ,इसे मैंने ही उठाया था ,इसे यहीं लाया था। तुम लोगों ने मेरा रिश्ता नहीं लिया ,तब मैंने सोच लिया ,ये 'मेरी न हुई तो और किसी की भी नहीं होने दूंगा।' 

यह सब सुनकर ज़ीनत ज़मीन पर बैठ गयी ,उसके मुँह से कुछ नहीं निकला। 

भाईजान ! अब इसका क्या करना है ? इस जगह से आगे एक जंगल है,इसे वहां छोड़ देते हैं ,इसे जंगली जानवर खा जायेंगे या ज़्यादा खून बहने से ये अपने आप ही मर जायेगा ,कहकर तैमूर आगे बढ़  गया। 

मुझे इस तरह छोड़कर मत जाओ ! मैं यहाँ मर जाऊंगा ,मेरी जानबख्श दो ! मैं तुम्हारी बहन का होने वाला शौहर हूँ। उसके इतना कहते ही, तेेमूर उसके क़रीब गया और बोला -यही तो गलती हो गयी। कहते हुए फचाक !से एक ही वार में उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी।

 जिसे देखकर ज़ीनत बेहोश हो गयी। तब याकूब बोला -भाईजान ! ये आपने क्या किया ?

यदि हम इसे जिन्दा छोड़ते तो ये शोर मचाता हो सकता है ,जिन्दा बच जाये ,जिन्दा बच गया तो हम नहीं बचेंगे ,इसका मरना जरूरी है। 

भाईजान ! अब आपा ! को घर ले जाओ ! इसे हम ठिकाने लगाकर आते हैं। 

घर पहुंचकर जब सलमा ने ज़ीनत की हालत देखी तो तैमूर से पूछा -इसे क्या हुआ ?तुम लोग कहाँ गए थे ?

खालिद को देखकर, आपा की ऐसी हालत हो गयी। 

ये तू क्या कह रहा है ? ख़ालिद को क्या हुआ ?उससे ये कहाँ मिली ?

आपा का गुनहगार और कोई नहीं ,वो इंसान' ख़ालिद 'ही था। 

क्या?? ये बात तुझे कैसे पता चली ? क्या उसने अपना गुनाह कुबूल कर लिया ?

हाँ ,कहते हुए उसने ज़ीनत को, उसके कमरे में पहुंचाया। 

तेरा भाई याकूब कहाँ है ? सलमा ने परेशान होते हुए पूछा। 

मैं जब पूछ रहा था ,कि यहाँ क्या चल रहा है ? आपने बताया था, उलाहना देते हुए तैमूर अपनी अम्मी से बोला। वो तो अच्छा हुआ ,मैंने उन लोगों की सारी बातें सुन लीं और मैं याकूब का पीछा करते हुए ,वहां तक पहुंच गया। ख़ालिद को क्या वे अकेले संभाल पाते ? जब मैं वहां पहुंचा तो याकूब के वो बेवकूफ़ दोस्त बंधे हुए थे। याकूब का पता नहीं ,कहाँ था ? तब मैंने उन्हीं लड़कों  से पूछा - यहाँ ये सब क्या चल रहा है ?वैसे उन्होंने भी मुझे कुछ भी ठीक से नहीं बताया किन्तु जब तक ख़ालिद बाहर आया ,मैंने उन्हें खोल दिया था। 

इतना लम्बा किस्सा सुनाने की जरूरत नहीं है ,मुझे ये बता ! याकूब कहाँ है ?

ख़ालिद की लाश को ठिकाने लगाने गया है। 

क्या ? ये सुनकर सलमा को भी जैसे चक्कर आ गया और वो वहीं पड़ी कुर्सी पर गिर पड़ी। ये तुम लोगों ने क्या कर दिया ? दोनों भाइयों ने मिलकर एक हत्या कर दी ,अब  पुलिस भी आ जाएगी। जिससे ज़ीनत का निक़ाह होता, उसे ही मार दिया। ये सब सोचकर उसे चक्कर आ रहे थे। 

तभी यूसुफ़ साहब  घर के अंदर आये ,क्या हो रहा है ? बेग़म !आज इस तरह से क्यों बैठी हो ? क्या कुछ हुआ है ?

न नहीं तो..... आपके लिए खाना लगवाती हूँ ,कहकर वो  अंदर गयी किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था। न जाने मेरे घर को, किसकी नज़र लग गयी ? न ही ज़ीनत की शादी हो रही है और अब बच्चों का भविष्य  गर्त में चला जायेगा। पुलिस को पता चला गया तो, क्या होगा ?सोचकर उसकी हालत खराब हो रही थी।

 ज़ोया और भाईजान का इकलौता लड़का गया ,दुश्मनी हो गयी सो अलग ! अब क्या होगा ?बड़ी मुश्किल से अपने को संभाले हुए थी। ताकि यूसुफ़ साहब सुबह से काम पर गए हुए थे अब आए हैं तो सुकून से दो निवाले खा लें।

 यूसुफ साहब ने सलमा का चेहरा पढ़ लिया ,घर में जरूर कुछ तो हुआ है। तब वो बोले -क्या हुआ  है ?बच्चे कहाँ हैं ?कोई दिख नहीं रहा। 

ज़ीनत अपने कमरे में है ,तैमूर भी अभी बाहर से ही आया है ,याकूब दोस्तों के साथ गया था अभी तक नहीं लौटा। 

तुम हमसे कुछ छुपा तो नहीं रही हो। 

नहीं ,बस मुझे याकूब की फ़िक्र है। 

आ जायेगा ,अब बड़ा हो रहा है जवान खून है ,घूमने दो !

बात घूमने की नहीं है ,कहते हुए सलमा रोने लगी। 

यूसुफ़ साहब भी घबरा गए ,चलो !अंदर कमरे में बात करते हैं। जब वे लोग कमरे में चले गए ,तब उन्होंने पूछा -क्या किसी ने कुछ कहा है ?तुम क्यों रो रही हो ?तुम इतनी कमज़ोर तो नहीं हो जो छोटी सी बात पर रो दे ! जरूर कुछ तो हुआ है ,मुझे बताओ !

हमारे बीच अब' ख़ालिद' नहीं रहा ,कहते हुए जोर -जोर से रोने लगी। 

यूसुफ साहब की धडक़नें भी अब अपनी सामान्य गति से तेज़ हो गयी थीं  ,तुम किसकी बात कर रही हो ?मैं कुछ समझा नहीं। आपके वाहिद भाईजान !का बेटा ख़ालिद अब इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। 

बेग़म ! तुम होश में तो हो ,उन्हें भी जैसे सदमा सा लगा ,ये ख़बर तुम्हें किसने दी ?वो तो सही -सलामत था ,अचानक उसे क्या हुआ ?सोचते हुए उन्हें अपनी ज़ीनत का उदास चेहरा नज़र आ गया। उससे निक़ाह जो होने वाला था। ये सब तुम्हें किसने बताया ?

कौन बताता ? तैमूर ने बताया। 

घबराकर यूसुफ़ साहब ने तैमूर को आवाज़ लगाई ,तैमूर !तैमूर ! यहाँ आओ !



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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