कहां से लाऊं ? उस सखी को, जो बरसों पहले चली गई।
बचपन की यादों में छुपी ,खेलती -मचलती क्यों चली गयी?
हँस लूँ ,गा लूँ ,या फिर याद कर उसको बार -बार मुस्काऊँ।
इतनी अच्छी , इतनी सच्ची, उस जैसी सखी कहाँ से लाऊँ ?
इक बार बतला देती ,बहुत हुई दोस्ती, अब जाना है।
मिलना और बिछुड़ना , जीवन का यही तराना है।
यादों के गलियारों में कभी -कभी आज भी आ जाती है।
बचपन की, स्वर्णिम यादों की, फिर से याद दिलाती है।
समझ लेती थी ,पहले मुझसे, मेरे ही अरमानों को.....
समझा देती थी ,दिखलती थी ,न देखी उन राहों को ,
वो संग रह हंसना -बतलाना, वो वक़्त कहाँ से लाऊँ ?
रोता छोड़ गयी सबको ,उस जैसा दिल कहाँ से लाऊँ ?
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