मैं दर्द लिखती हूं, अपनी कहानी, किस्से या फिर कविताओं में, वह अनकहा दर्द जो कहा नहीं जा सकता, महसूस होता है, कहा नहीं जा सकता। अंदर ही अंदर घुटन होती है ,बिन आवाज़ ,दिल के टुकड़े होते हैं। यह दर्द आँखों में दिखता है , झूठी मुस्कान में दिखता है ,ख़ामोशी में दिखता है ,किससे कहें ? अपनों का ही दिया होता है ,सहा भी तो नहीं जा सकता। ऐसा दर्द जिसकी अनुभूति तो है , लेकिन दिखती नहीं। उस दर्द की कोई सीमा नहीं, वह दर्द कभी भी कोई भी अपना दे सकता है।
टुकड़ों- टुकड़ों में यह दर्द मिलता है, हर उस रिश्ते से, जिससे हम जुड़े हैं या जो हमसे जुड़ा है। वह दर्द जो अनेक प्रश्नों के जबाब जानना चाहता है किंतु उनके जवाब ढूंढने पर भी नहीं मिलते। एक 'खामोश दर्द' जो महसूस करता है, झेलता है, प्रश्न करना चाहता है, मन में अनेक तूफान समेटे हुए है किंतु न जाने तब शब्द कहां चले जाते हैं ? उस दर्द को वही महसूस कर सकता है, जिसने दर्द को जिया हो।
शब्द आ भी जाएं तो वह दर्द किसी को महसूस भी नहीं होता ,जिसने दिया है ,उसे तो पछतावा भी नहीं होता। तब वह दर्द कभी आंखों से छलक कर आंसुओं में बदल जाता है तो कभी झूठी मुस्कान में आ जाता है। एक ऐसी खामोशी जो कभी भावनाओं की एक लंबी कहानी बन जाता है तो कभी, कविताओं के मोतियों में पिरोकर उसे माला बना दिया जाता है। मैं दर्द लिखती हूं , कभी-कभी जो धड़कनों से होते हुए रूह तक पहुंच जाता है।
वह दर्द ,आपका, हमारा किसी का भी हो सकता है। हर इंसान एक दर्द को जी रहा है। उसे कभी, पत्नी का दिया दर्द महसूस होता है तो कभी पति का दिया दर्द लगता है। कभी बहन का भाई को दिया दर्द महसूस होता है तो कभी बहन का दिया दर्द , इस दर्द के विभिन्न रूप हैं। न जाने कब किस रूप में ? किसके सामने आ जाए और किसको उसका असली चेहरा देखने को मिल जाए। यह दर्द भावनाओं में घूमते हुए, शब्दों के रूप में परिवर्तित होता है। खामोश रहकर भी बहुत कुछ कहना चाहता है और कह भी देता है किन्तु जो शब्दों की भाषा न समझ सके ,वो भावनाओं को कैसे समझेंगे ? कलम की स्याही में डूब कर अनमोल मोती बना देता है। वह दर्द जो हम आप सब जीते हैं, महसूस करते हैं। वही दर्द मैं लिखती हूं ,प्यारा -प्यारा ,मीठा -मीठा !
