Kalam ki schchai

कबीर दौड़ते हुए झाड़ियां में छुप गया, उसकी सांस फूल रही थी। वह पसीने से वह लथपथ था। कोई चार- पांच आदमी  उसे ढूंढ रहे थे। वो नहीं जानता ,ये  लोग कौन हैं ? किंतु इतना अवश्य जानता है, वे  उसी के पीछे हैं। उसकी क़लम के शत्रु हैं।  वे  उसे मार देना चाहते हैं ताकि उनकी सच्चाई समाज लोगों के सामने न आये। कबीर ने अंदाज़ा लगाया - ये अवश्य ही, उस गैंग के आदमी होंगे, जिस गैंग का पर्दाफाश करने के लिए कबीर इतने दिनों से , प्रमाण ढूंढ रहा था। 

 बात उन दिनों की है ,जब एक दिन किसी ने आकर उसे बताया ,''अबोध बालिका संस्था ''में बालिकाओं को संरक्षण देने के बहाने उन पर अत्याचार और उनका शोषण किया जाता है। कबीर उसी संस्था की बच्चियों पर हुए अत्याचार का पर्दाफ़ाश करने के लिए ,महीनों से इस पर काम कर रहा था। न जाने कैसे इन लोगों को भनक मिल गयी ?


 उसे तो लगता है ,उसकी अख़बार के मालिक भी शायद उनसे डर गए। एक बार उसने उन्हें ही बताया था ,वह किस विषय पर अपनी रिपोर्ट तैयार कररहा है ? तब से वे लोग उसके पीछे पड़े हैं और उसे धमकियां भी दे रहे हैं। 

एक दिन वो लैपटॉप पर काम कर  रहा था ,उसने देखा था ,किस तरह उस संस्था की लड़कियों को दिखाया जाता है कि ये उन गरीब ,बेचारी ,बेसहारा लड़कियों को किस तरह आश्रय देते हैं।  दुनिय के सामने उन्हें पढ़ाया जाता है। उन्हें काम भी सिखाया जाता है, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। जब कोई उस संस्था में भृमण  करने आता है। तब लड़कियां अपनी सुंदर -सुंदर कलाकृतियां उन्हें दिखलाती और भेंट करती हैं किन्तु वास्तविकता ये नहीं है, इसका पता कबीर ने ही लगाया।

 तबसे  उसके पास फोन आने लगे , तुम जो भी काम कर रहे हो ?उसे वहीँ रोक दो ! वरना अपनी जान से हाथ धो बैठोगे !

कौन बोल रहा है ,हैलो !हैलो !किन्तु उस आदमी ने फोन काट दिया।

उस धमकी का असर कबीर ने आज देखा ,उसने संस्था में जो भी देखा ,उसको उसकी कलम ने बेख़ौफ़ लिखा। उसके पापा ने जब उसे कलम दी थी, तो कहा था -बेटा ! इस कलम में बहुत ताकत है। कबीर ने कलम की ताक़त को महसूस किया और उस कलम से उसने समाज की कई सच्चाइयों का सामना, लोगों को करवाया। किन्तु अब इस केस में उसकी जान पर बन आई थी। 

 वो चाहता था,उन बच्चियों की सच्चाई समाज के सामने आनी  चाहिए ,जब वो अपने दफ्तर जा रहा था तभी उसे लगा था, शायद कोई उसका पीछा कर रहा है। कबीर झाड़ियों में छुपा सोच रहा था ,भले ही मेरी जान चली जाये किन्तु सच्चाई तो सबके सामने आनी ही चाहिए। वो जानता था,इससे बड़े -बड़े लोग जुड़े हैं। वे नहीं चाहते ,संस्था की सच्चाई का भांडाफोड़ हो। 

कबीर ऐसे में किसी ईमानदार आदमी के विषय में सोच रहा था ,जो साहस से उसका साथ दे  सके !इतने लोगों में एक ईमानदार इंसान ढूँढना भी ''भूसे के ढ़ेर में सूई ढूंढने के बराबर है। ''सभी बिक़े हुए हैं।

तब कबीर को इंस्पेक्टर जोगिंदर की याद आई , अभी तक वो ही इंसान उसे , ऐसे नजर आए , जो सच्चाई का साथ दे सकते हैं किंतु इस समय तो अपनी जान बचाकर वहां तक पहुंचना भी बहुत मुश्किल लग रहा था। जब वे लोग थोड़ा आगे निकल गए, तब कबीर ने अपना रास्ता बदला और दूसरे रास्ते से चुपके से छुपते हुए ,इंस्पेक्टर जोगिंदर के घर की खिड़की के समीप पहुंच गया। उसने अपनी'' पेेन ड्राइव'' तुरंत जोगिंदर के खिड़की में डाल दी। उन लोगों ने उसे देख लिया।

 तभी कबीर दौड़कर उसके घर के सामने गया और इंस्पेक्टर का दरवाजा खटखटाने लगा। इससे पहले की इंस्पेक्टर दरवाजा खोलता , कबीर को गोली लगी और वह वहीं पर गिर पड़ा।

 इंस्पेक्टर ने दरवाजा खोला और कबीर को लहूलुहान देखकर , उससे पूछा -यह सब किसने किया  ?

इंस्पेक्टर साहब कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं , मुझे आपसे बहुत उम्मीदें हैं, आप सच्चाई को सामने लाने में मेरा साथ देंगे , मैंने एक'' पेेन ड्राइव'' आपके कमरे की खिड़की से  डाल दी है। यदि मैं जिंदा न रहा, तो आप सच्चाई को सामने लाएंगे, वायदा कीजिए ,यह सब उसने टुकड़ों -टुकड़ों में इंस्पेक्टर को समझाया।  

मैं तुम्हारे साथ हूं, तुम्हारा साथ दूंगा किंतु उससे पहले तुम्हें डॉक्टर के पास जाना होगा, कहते हुए इंस्पेक्टर ने अपनी मोटरसाइकिल निकाली और कबीर को अस्पताल में भर्ती करवाया। सच्चाई सामने लाने के लिए कबीर अपनी जान पर खेल गया, किंतु वह भी तब सम्भव हो सका ,जब एक ईमानदार इंस्पेक्टर ने उसकी सहायता की। 

 जिसके कारण कबीर के' कलम की स्याही ने ', सच्चाई को समाज के सामने लाकर खड़ा कर दिया। यदि इंस्पेक्टर भी उसे धोखा दे जाता या बिक जाता , तो वह कलम की स्याही, जो समाज को आइना दिखाने का साहस रखती है। कलम की ताकत का विश्वास जो कबीर के मन में बना हुआ था ,वह टूट जाता। वह जानता था, कि  कलम की स्याही में बहुत बड़ी ताकत है , किंतु अब उस ताकत को जूझता भी पड़ता है। सच्चाई को आसानी से कोई बाहर नहीं आने देना चाहता , क्योंकि वह समाज को आईना दिखला देती है। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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