शहरों की उन मासूम, ग़रीब गलियों में ,
जहाँ लोग जाते नहीं ,'बद्नुमा दाग़' कहते हैं।
कुछ सपने, आशाओं संग, उम्मींदें पलती हैं।
उन गलियों में रहने वालों के भी स्वप्न होते हैं।
खींच लाती है ,ललक ! उन्हें इन गलियों में ,
बढ़ती जाती हैं, गलियां उम्मीदों की चाहत में।
देखते हैं ,जब शहरों की जगमगाती रंगीनियां !
लोभ ,कब इन्हें छोड़ता है ? देखते हैं,बिजलियाँ !
आगे बढ़ने की चाहत में ,बन जाती हैं ,ये गलियां !
सपनों की चाहत में ,कुछ लाचार ,बेबस होते हैं।
उम्मीदों की उड़ानें बढ़ती जाती हैं।
जीने की चाहत ,इन्हें खूब रुलाती है।
बाँट लेते हैं, सब दर्द अपने,जब ग़म एक जैसे हों।
ढूंढते हैं, कोई अवसर, पहचान उसके हुनर की हो।
वो गलियां जहाँ सपने पलते हैं ,उम्मीदों के दिए जलते हैं।
जी उठे ,ज़िंदगी !कभी तो वो उन शहरों की शान हो।
