Ameer shahar ki garib galiyan

 शहरों की उन मासूम, ग़रीब गलियों में ,

जहाँ लोग जाते नहीं ,'बद्नुमा दाग़' कहते हैं। 

 कुछ सपने, आशाओं संग, उम्मींदें पलती हैं।

उन गलियों में रहने वालों के भी स्वप्न होते हैं।  


 खींच लाती है ,ललक ! उन्हें इन गलियों में ,

बढ़ती जाती हैं, गलियां उम्मीदों की चाहत में। 

देखते हैं ,जब  शहरों की जगमगाती रंगीनियां !

लोभ ,कब इन्हें छोड़ता है ? देखते हैं,बिजलियाँ !

आगे बढ़ने की चाहत में ,बन जाती हैं ,ये गलियां ! 

सपनों की चाहत में ,कुछ लाचार ,बेबस होते हैं। 

उम्मीदों की उड़ानें  बढ़ती जाती हैं। 

जीने की चाहत ,इन्हें  खूब रुलाती है। 

बाँट लेते हैं, सब दर्द अपने,जब ग़म एक जैसे हों। 

ढूंढते हैं, कोई अवसर, पहचान उसके हुनर की हो।

वो गलियां जहाँ सपने पलते हैं ,उम्मीदों के दिए जलते हैं।

जी उठे ,ज़िंदगी !कभी तो वो उन शहरों की शान हो।    

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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