ख़ालिद भी जब ज़ीनत से रिश्ते के लिए मान जाता है। तब ज़ोया ने सोचा - कोई बात नहीं,मेरे कहें में इस वक़्त कोई नहीं किन्तु अब तो सलमा, मुझसे दबकर ही रहेगी ,बड़ी उछलकर बातें करती थी। वैसे देखा जाये तो औरत की बुद्धि ज्यादा दूर तक नहीं जाती ,कोई पढ़ी -लिखी ,कामकाज़ी महिला हो तो, बाहर की सोच भी सकती है। परन्तु जिन महिलाओं की ज़िंदगी सास -ननद ,देवरानी -जेठानी में लड़ते, एक दूसरे को नीचा दिखाते ही बीती है। वो इससे ज्यादा कहाँ सोच सकती है ?
सलमा और ज़ोया देवरानी -जेठानी होने के साथ -साथ अब समधिन बन जाएँगी किन्तु उनका जो भी लड़ने का कारण रहा ,उससे पता चलता है ,वो खुन्नस अभी भी बाकि है। जो अब तक पूरी नहीं हो पाई अब उसका मुआवज़ा सलमा की बेटी ज़ीनत को भुगतना पड़ सकता है। मन ही मन इसी बात को सोचकर ज़ोया खुश हो रही थी। उसने तो जैसे पहले ही तय कर लिया, उसे अब सलमा की बेटी के साथ केेसा व्यवहार करना है ? जिस बेइज्जती का बदला वो सलमा से न ले सकी, अब उसकी बेटी चुकायेगी।
उसकी बेटी, मेरे खानदान की बहू जो बन रही है। अब जो चाहे' मैं' उसे कह सकती हूं। ज़ोया के दिल में ये सुकून न हुआ ,उसके आवारा बेटे को इतनी खूबसूरत बीवी मिलेगी ,घर प्यार ,मोहब्बत से जन्नत बनाना है बल्कि वो तो यही सोच रही थी कि अब तक सलमा के कारण जो उसकी बेइज्जती हुई है ,उसका बदला लेने का समय आ गया है। अब तक तो सलमा बहुत उड़ रही थी ,अब उसके और उसकी बेटी के' पर' ही बांध दूंगी। ज्यादा कुछ हरकतें की तो उसके 'पर' ही कतर डालूंगी। सलमा को नीचा दिखाने के लिए ,ज़ोया अपने बेटे की साज़िश में साथ देने के लिए रज़ामंद हो गयी।
वाहिद साहब सोच रहे थे - चलो, अच्छा हुआ। ख़ालिद का घर भी बस जाएगा, हो सकता है, धीरे-धीरे ये अपनी बुरी आदतें भी छोड़ दे !
ये ख़बर जब रुकैया के कानों में पड़ी , तो रुकैया ने खालिद से पूछा -इस घूमने वाली लड़की में तूने ऐसा क्या देख लिया ? जो तू इससे निक़ाह के लिए तैयार हो गया। तू तो कह रहा था -'इसका चाल -चलन ठीक नहीं है ,फिर तू इससे शादी क्यों कर रहा है ?
घर की इज्जत का सवाल है, फुफिजान ! अहमद मियां ने तो उसे, अपने साथ रखा नहीं, बल्कि उससे मिलते रहे और जब उससे मन भर गया तो उससे निक़ाह के लिए मना कर दिया ,किन्तु हमें तो अपने चचाजान की इज्जत का ख्याल है, इस घर की बेटी होकर आप तो, इस रिश्ते को निभा न सकीं ,अब 'बलि का बकरा' तो मुझे ही बनना पड़ गया। उस पर एहसान जताते हुए वो बोला - अब्बू ने, बहुत ख़ुशामद की ,तब मैंने अपनी रजामंदी दी ,इसलिए उस रिश्ते के लिए' मैं' मान गया।
ख़ालिद ! जबान संभलकर बात कर, ये तूने अभी जो कहा, सही नहीं कहा है, अहमद ने तो आज तक ज़ीनत को देखा भी नहीं है, और न ही ज़ीनत ने उसे देखा है। मैंने तो तेरे कहने पर ही यह रिश्ता तोड़ा था तुम तो कह रहे थे - कि वह लड़की सही नहीं है ,सारा दिन घूमती है ,उसका चाल- चलन ठीक नहीं है।
फुफिजान !जहाँ आप रिश्ता कर रही हैं, कम से कम उन लोगों पर यकीन करना तो सीखिए ! आपने रिश्ता तो किया किंतु अपने भाईजान और भाभी पर ही, आपको विश्वास नहीं था। ये आपका भी तो ख़ानदान है अपने ख़ानदान की आबरू बचाने के लिए अहमद का निक़ाह उससे कर सकती थीं किंतु आपको तो अपने अहमद की फिक्र थी।
रुकैया को अब लगा, कि यह खालिद दोनों तरफ से, चाल खेल गया है। उसे लग रहा था ,मैंने इसका कहना मानकर बहुत बड़ी गलती कर दी है। जब उसे पता चला , ख़ालिद ने दहेज़ में महंगी गाड़ी भी मांगी है तो उसकी ''छाती पर सांप लोटने लगे। ''अब कुछ हो भी नहीं सकता था।
दोनों ही तरफ घरों में... शादी की तैयारियाँ होने लगीं थीं। जब दोनों तरफ बात तय हो गयी ,तब ख़ालिद ने ज़ीनत से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। निक़ाह से पहले एक दूसरे का मिलना ठीक नहीं है किंतु खालिद कहता है -अब तो हमारा निक़ाह होने ही वाला है ,अब एक -दूसरे से मिलने में क्या बुराई है ?
सलमा ,अपने शौहर से बोली - यदि हमने इनको मिलने से इनकार किया, और खालिद निकाह से इनकार कर देगा , तो सारी तैयारियां धरी की धरी रह जाएंगीं, तब तो हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे।
परिवार में ,कोई भी नहीं चाहता था कि ख़ालिद निक़ाह से पहले ज़ीनत से मिले ,किन्तु सलमा और यूसुफ़ मियां ने अपने को ही समझाया ,''अब ज़माना बदल रहा है ,बदलते वक़्त के साथ ज्यादा नहीं थोड़ा तो चलना ही पड़ेगा।'' अपने आपको समझाते हुए ,उन्होंने ख़ालिद की ख़्वाहिश को पूरा करने की रज़ामंदी दे दी।
जिसके हाथ ख़ालिद ने ये पैग़ाम भिजवाया था ,उससे कहा -दोनों मिल सकते हैं, किन्तु हमारे घर के बग़ीचे में ही मिल लेंगे।कम से कम बच्चे हमारी नज़रों के सामने तो रहेंगे। पैग़ाम लाने वाली कोई और नहीं ,ख़ालिद के मोहल्ले की लड़की रेशमा थी ,जो ज़ीनत को भी अच्छे से जानती थी। एहतियात के तौर पर, रेशमा को ही, उनके साथ रहने के लिए कह दिया गया।
तय वक़्त पर जब ख़ालिद, ज़ीनत से मिलने के लिए आया ,ज़ीनत ने पर्दा किया हुआ था और वो एक पेड़ की आड़ में बैठ गयी। उस वक़्त ख़ालिद की धड़कनें तेज़ हो गयीं थीं। ज़ीनत भी घबराई हुई थी ,न जाने ये क्या पूछ बैठे ? तब ख़ालिद की आवाज़ आई ,मोहतरमा ! कैसी हैं ?
कुछ देर की चुप्पी के बाद ज़ीनत ने कहा - आदाब ! मैं ठीक हूँ ,कहिये ! किसलिए मिलना चाहते थे ?
कुछ ख़ास नहीं ,अपनी होने वाली बेग़म को एक नज़र देखना चाहता था ,क्या हम बाहर नहीं मिल सकते थे ?यहाँ इस बग़ीचे में क्यों ?
हमें, बाहर जाने की इजाज़त नहीं है।
मैं समझ सकता हूँ ,तुम्हें एक झलक देखने की इच्छा हो रही थी ,कहते हुए बातों ही बातों में पेड़ के पीछे से निकलकर उसके सामने आ खड़ा हुआ। ज़ीनत को देखा ,तो वो देखता ही रह गया ,काले दुपट्टे में, जैसे चाँद चमक रहा था। उसकी तरफ अपलक देखता रहा ,तुरंत ही ज़ीनत ने अपना दुपट्टा संभाला ,और अपने चेहरे को छुपा लिया किन्तु ज़ीनत उसका चेहरा देख, अपने आपको कोस रही थी। क़िस्मत मुझे न जाने कहाँ लेजाकर पटकेगी ?
अपने अल्फाजों में मिश्री सी घोलते हुए ,खालिद बोला -माशाल्लाह ! तुम तो पहले से और ज़्यादा निखर गयी हो, कहते हुए वापस पेड़ के पीछे गया। पिछली मुलाक़ात की मामूली सी झलक उसके ज़हन में थी ,आज ख़ालिद को तो जैसे अपने आप पर नाज़ हो गया। उसने इस निक़ाह से इंकार न करके कोई गलती नहीं की।
कहिये ! कुछ और पूछना चाहते हैं ? ज़ीनत की सुरीली आवाज़ गूंजी।
हाँ ,मैं यही पूछना चाहता था , यह निक़ाह क्या तुम्हारी मर्जी से हो रहा है ? कोई जबरदस्ती तो नहीं ,तुम्हें मैं पसंद हूँ या नहीं .....
किन्तु उधर से कोई आवाज़ नहीं आई ,ख़ालिद ने दुबारा वो ही सवाल किया किन्तु अभी भी कोई जबाब नहीं मिला ,वो अभी पेड़ के इस तरफ आने ही वाला था ,तभी रेशमा की चीख़ सुनाई दी। अरे !इसे क्या हुआ ?
