रुकैया ने ,अब अपने भाई की बेटी 'ज़ीनत' से अपने बेटे अहमद से रिश्ते को साफ -साफ मना तो नहीं किया किन्तु' हाँ 'भी नहीं बोली। अब' ज़ीनत' के अब्बू 'यूसुफ' को उसकी फ़िक्र सताने लगी थी और उन्होंने रुकैया से कहा - हम तुम्हारे घर आ रहे हैं। हम अहमद और उसके अब्बू से मिलना चाहते हैं।
रुकैया के मन में अब वहम आ चुका था, कि ज़ीनत के साथ जरूर कुछ तो हुआ है।'' बिना आग के धुंआ नहीं उठता''किन्तु अभी तक ये बात उसने अपने शौहर को भी नहीं बताई थी क्योंकि वो अभी भी इसे अपने घर का मामला समझती है।
अब जब उसके भाईजान अपनी बेग़म के साथ तशरीफ़ ला रहे हैं ,तब अपने शौहर' शौकत अली' को समझाते हुए बोली -हमें, यह रिश्ता नहीं करना है। हम ,हमारे डॉक्टर बेटे से क्या उनकी 'अनपढ़ बेटी' ब्याह देंगे ?
शौकत अली को तो रुकैया के घर,उसके ख़ानदान में क्या हो रहा है ? कुछ मालूम ही नहीं था ,तब बोले - तो क्या हुआ ?हमें, क्या उससे नौकरी करवानी है ?'ज़ीनत 'अपने अहमद को खुश रखे ,बस हमारे लिए यही बहुत है।
आप समझ नहीं रहे हैं ,आप उनसे कहियेगा - आप लोगों से कितनी बार कहा है ,' इसे पढ़ाइये ! ! मेरा अहमद इस रिश्ते से इंकार कर रहा है। वह कह रहा है - कि'' जब मैं खुद इतना पढ़ा- लिखा हूं , तो मैं एक अनपढ़ लड़की से कैसे विवाह कर सकता हूं ?''उस दिन अहमद को उसके दोस्तों के साथ घूमने भेज देंगे।
दोनों पति -पत्नी शौकत अली के घर पहुंचे, आवभगत हुई, किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा , रुकैया ने अपने भाईजान के लिए लज़ीज खाना बनाया। उसके बाद यूसुफ़ मियां ने ,रुकैया के शौहर से ज़ीनत और अहमद के रिश्ते की और बात को, आगे बढ़ाने के लिए कहा।
उनकी तो हाँ ही थी ,उन्होंने ज़ीनत को देखा है किन्तु रुकैया ने पर्दे की आड़ से उनसे रिश्ते को मना करने के लिए गर्दन हिलाई।
तब वे बोले - देखिये !भाईजान ! हमें तो इस रिश्ते से कोई तकलीफ़ नहीं है ,किन्तु अब बच्चे बड़े हो रहे हैं,पढ़ -लिख रहे हैं , उनकी भी अपनी सोच बनती जा रही है। अहमद के ख़्यालात देखते हुए तो लग रहा है ,वो किसी अनपढ़ लड़की से तो शादी नहीं करेगा।
शौकत अली के मुँह से यह बात सुनकर सलमा और यूसुफ मियां का तो जैसे' खून ही सूख गया।'
सलमा, रुकैया से बोली - आपको तो पहले से ही पता है , इसके अब्बू ने कभी इसके पढ़ने को तरज़ीह नहीं दी। अब यह बात कहां से आ गई ?
सलमा ! क्या बात करती हो ? जब हमारी बात हुई थी ,तब बच्चे छोटे थे, हम आपस में बात कर सकते थे, किंतु अब अहमद पढ़ -लिख गया है। पढ़ने के बाद इंसान की सोच बदल जाती है। जवान होता बच्चा है, मैं उससे जबरदस्ती तो नहीं कर सकती। उसे तो अब पढ़ी-लिखी लड़की ही चाहिए।
भाई जान ! तुम ही बताओ ! जीनत मेरी भी भतीजी है ,मैं ,उसका बुरा थोड़े ही चाहूंगी। मान लो !मैंने जबरन ही उसकी शादी अहमद से करवा भी दी , अब उसका शौहर ही इसकी इज्जत न करें तो क्या फायदा ? फिर तुम लोग ही, मुझसे अहमद की शिकायत करोगे ! दूल्हे मियां ! हमारी लड़की को खुश नहीं रख रहे हैं, दोनों पति-पत्नी समझ गए थे, अब यह बहाना कर रही है।
सलमा और यूसुफ़ दोनों ही,''अपना सा मुँह लेकर ''वापस अपने घर वापस लौट आये किन्तु दोनों के चेहरों से ख़ुशी नदारद थी। तब सलमा बोली -सबको मालूम है, अहमद का रिश्ता ! ज़ीनत के साथ तय था ,रिश्ता टूटने पर अब इससे कौन शादी करेगा ? दोनों ही पति- पत्नी परेशान थे। सोच रहे थे - क्या किया जाए ?
हमें क्या मालूम था ? तुम्हारी बहन इस तरह धोखा कर जाएगी ,गुस्से से सलमा बोली -मैं तो इसे बहुत पहले से ही जानती थी, बहुत ही चालाक औरत है।
तुम ये सब क्या कह रही हों ?अब उसका बेटा नहीं मान रहा है ,तो वो भी क्या कर सकती है ?
वो भी कोई' दूध की धुली नहीं है ' पूरी' शैतान की खाला है।' 'मुझे तो लगता है ,ये इसी की चाल है ,आपने देखा नहीं ,घर में अहमद थे, ही नहीं। हमारे आने से पहले ही उन्हें कहीं भेज दिया होगा ताकि हम उनसे सीधे बात ही न कर लें।
गुस्से से फुफकारते हुए सलमा बोली -न जाने ,इस लड़की के नसीब में क्या लिखा है ? अब तो मुझे अँधेरा ही नजर आ रहा है। न जाने, वो कौन सी मनहूस घड़ी थी ,जिस समय वो [अनजान शख़्स ]इसे उठा ले गया था । इसकी ज़िंदगी में अँधेरा भर गया। सोचा था ,अहमद से इसकी शादी हो जायगी ,इसका ये 'कलंक' भी धुल जायेगा ,कहते हुए रोने लगी।
सलमा का इस तरह रोना सुनकर यूसुफ़ मियां का भी दिल घबराने लगा।सलमा तो रोने लगी किन्तु वे अपना ग़म किससे जाकर कहें ? जब बर्दाश्त न हुआ तो घर से बाहर निकल गए।
उन्हें जाता, देखकर सलमा की रुलाई बढ़ गयी , क्या मैं ,समझती नहीं ये सब कारस्तानी उस रुकैया की ही है। अपनी आपा को कुछ न कहेंगे। तब अपनी ज़ीनत का ख़्याल आया तो उसकी बदनसीबी पर फिर से रो उठी।
कुछ दिनों पहले उन्हें लग रहा था,उनकी ज़िंदगी में खुशियां ही खुशियां हैं किन्तु आज वे महसूस कर रहे थे जैसे उड़ते परिंदों के किसी ने पर कतर दिए हों। अपने को असहाय पा रहे थे। मन अनेक परेशानियों में उलझा था। न जाने ,किसकी नज़र लग गयी ?
ज़ीनत अपने कमरे में बैठी ,अंधेरे को ताक रही थी ,शायद उस अँधेरे में उस अनजान शख़्स को पहचानने की कोशिश कर रही थी। वो उस कमरे में जैसे नज़रबंद थी। उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था उसे किस गलती की सज़ा मिली है ?
शाम को जब यूसुफ़ मियां ने, अपने घर में क़दम रक्खा ,अंदर से बड़ी अच्छी खुशबू आ रही थी। मन ही मन उन्होंने सोचा -शायद सलमा ने आज गोश्त बनाया है। तभी उन्हें दिन की बातें याद आ गयीं और सोचने लगे। सुबह तो उसकी हालत देखकर लगता नहीं था कि आज खाने को कुछ मिलेगा। फिर सोचा ,अपने को समझा लिया होगा।
उनके आने की आहट से सलमा ने दस्तरख़ान सजवा दिया और सभी वहीं पहुंच गए। सभी काम हो रहे थे किन्तु घर ख़ामोश था। वो चुपचाप खाने के लिए बैठ गए। खाना खाते हुए ,इधर -उधर देख रहे थे। ख़ामोश घर कुछ कहता महसूस हो रहा था। इस ख़ामोशी का राज क्या है ? तजस्सुस से उन्होंने इधर -उधर देखा।
खाना खाने के बाद ,सलमा मुस्कुराने की कोशिश करते हुए ,उनके क़रीब आकर बैठ गयी।
बेग़म !कुछ कहना चाहती हो ? वो समझ रहे थे ,ये माहौल को बदलने की कोशिश कर रही है ,अपनी बेटी का ग़म अभी भी इसके ज़हन में समाया है।
