रूही, किशोरी लाल और उनकी पत्नी सरला को उनकी गलतियों का एहसास करवाती है कि उन्होंने ठाकुर ख़ानदान पर किस तरह आँख मूंदकर विश्वास करके, कितनी बड़ी गलती की है ? जिसकी सज़ा उनकी बेटी को भुगतनी पड़ी। जब उन दोनों को पता चलता है, कि हमारी बेटी अब इस दुनिया में नहीं रही। तब वे गहन पीड़ा से भर जाते हैं।
तभी ,रूही उन्हें बताती है -कि उनकी बेटी को अभी और जीना था,और वो उस जलती चिता से अर्धजली हालत में ही उठ जाती है और दौड़ते हुए ,श्मशान से बाहर आती है। तब वो एक गाड़ी से टकरा जाती है। तब वो गाड़ी वाला उसे बचा लेता है।
बचा लिया, क्या ? उस पीड़ा से वो बाहर आ पूछते हैं -क्या अब हमारी बेटी जिंदा है ,क्या हम उससे मिल सकते हैं ?
उन दोनों को एक उम्मीद जागी और उन्होंने पूछा - हमारी बच्ची को बचाने वाला फरिश्ता कौन था ? हमारी बेटी को किसने बचाया ? क्या वो फ़रिश्ता! तुम ही तो नहीं क्योंकि तुम उसकी कहानी को इस तरह से बता रही हो ,जैसे तुमने, उसके दर्द को महसूस किया है।
आप सही कह रहे हैं ,'मैंने उस दर्द को जीया है।''
गर्वित ,रूही की तरफ देख रहा था , इसको इन सब बातों का कैसे पता चला ? किन्तु कुछ पूछ न सका। तभी उसे स्मरण हुआ। जब भी मैं इसके करीब आता था तो इस पर शिखा का भूत आ जाता था आज कहीं वो ही तो नहीं आ गयी है। उसके चेहरे की तरफ देखने लगा, किन्तु शीघ्र ही नजरें हटा लीं ,लापरवाही से इस तरह बैठा रहा ,जैसे उसका इन बातों से कोई सरोकार ही नहीं है।
हमारी बेटी को बचाने वाला वो, फ़रिश्ता कौन था ?
जिसने आपकी बेटी को बचाया वह एक डॉक्टर था - डॉक्टर अनंत !
रूही के इतना कहते ही , गर्वित एकदम से जैसे अपनी जगह से उछल पड़ा और वह रूही की तरफ देखने लगा , रूही ने आंखों के इशारे से कहा - यही सच्चाई है।
''बिटिया ! तुमने हम पर बहुत एहसान किया है, तुम हमारी बेटी का पता लगा कर आई हो। भगवान !तुम्हें लंबी उम्र दे, तुम्हारे बच्चों को कामयाब करें !''
तुम्हारा पति भी ठाकुर परिवार से ही है किंतु अब हम, इसे बद्दुआ भी नहीं दे सकते, कहते हुए रोने लगे और गर्वित से बोले -तुम लोगों ने, हमारी बेटी के साथ अच्छा नहीं किया ,कितने अरमानों से उसका विवाह किया था ?तुम लोगों ने उसे' अनाथ 'और 'लावारिस' बना दिया। हमारी बेटी के साथ जो कुछ भी किया, वह अच्छा नहीं था , ऊपर वाला सब देखता है।
अभी तो इन्होंने [ रूही ] बताया,मैं पढ़ाई के लिए विदेश गया था।
उसकी बात सुनकर रूही के चेहरे पर एक मुस्कान आई ,वो सोच रही थी -कैसा इंसान है ? ये सब जानता है ,ये भी उन्हीं में शामिल था। मैंने इसका सम्मान बनाये रखने के लिए अपने घरवालों से झूठ बोला किन्तु ये शर्मिंदा होने की बजाय उस झूठ के सहारे अपने को निर्दोष ही समझे बैठा है। मैं तो सोच रही थी ,ये बदल गया है किन्तु मुझे नहीं लगता ,इसके विचारों में कोई परिवर्तन आया है।
तभी उसके कानो में अपने माता -पिता के स्वर सुनाई दिए ,बिटिया !क्या सोच रही हो ? क्या तुम ,हमें उस डॉक्टर अनंत के घर का पता दे सकती हो, उन्होंने हम पर बहुत बड़ा एहसान किया है। उन्होंने हमारी बेटी को मौत के मुँह से बचाया है।
हम कैसे अभागे माता -पिता हैं ? जिन्हें अपनी बेटी की कोई खबर नहीं थी। बुरे समय में हम उसके साथ नहीं थे। पता नहीं ,उसने और क्या -क्या झेला होगा ? रोते हुए सरला जी बोलीं।
हम उन डॉक्टर साहब के यहां जाकर अपनी बिटिया से भी मिल लेंगे। बहुत दिन हो गए, उसे बहुत दिनों से देखा नहीं है।
आप लोग कितने अच्छे हैं ? आप लोगों ने कोई गलती नहीं की , फिर भी क्षमा याचना करना चाहते हैं, किन्तु कुछ लोग तो गलती करके भी लज्जाहीन ही रहते हैं , किन्तु गर्वित ने रूही की तरफ नहीं देखा बल्कि उसकी बातों को नजरअंदाज किया।
आप चाहे तो मैं, आपको अभी उसके नए माता-पिता के पास ले जा सकती हूं , उनके तो कोई औलाद ही नहीं है अब आपकी बेटी ही, उनकी बेटी है। वो उसे बड़े ही प्रेम से रखते हैं और उन्होंने अपनी बेटी का विवाह भी कर दिया है।
क्या ??दोनों ने आश्चर्य से एक दूसरे की तरफ देखा। तुम, ये क्या कह रही हो ? प्रसन्नता ने ,उनके व्यथित मन को शांत किया, दोनों के चेहरों पर मुस्कान तैर गयी। आँखों में अभी भी आंसू की बूंदें झलक रही थीं और चेहरे पर मुस्कान ! ये विचित्र आभास था।
हमारी बेटी का विवाह भी हो गया न जाने, बेचारी ! ने, कितने कष्ट सहे होंगे ? उसने कितना अपमान झेला होगा ? एक तरह से उसकी मौत ही हो गई थी दूसरी जिंदगी में वह अब डॉक्टर अनंत की बेटी बनकर जी रही है।
क्या अब वह हमें पहचान पाएगी ,हमें अपना माता -पिता कहेगी, कहते हुए सरला जी रोने लगीं ।
हां, वह आप लोगों को बहुत याद करती है, उसे इस बात का दुख है कि उसके माता-पिता उससे दूर हो गए किंतु वह अपने माता-पिता से मिलने के लिए तड़पती रहती है। पहले भूल गयी थी ,अब तो उसे सब कुछ याद आ चुका है।
रूही की बातें गर्वित को कुछ पहेलियों की तरह लग रही थीं , एक मन कह रहा था -'जिसकी यह कहानी सुना रही है ,क्या यह खुद हो सकती है ,या इनको कहानी सुना कर इन्हें खुश करना चाहती है ,डॉक्टर अनंत के और तो कोई बेटी नहीं है ,शिखा तो अलग थी।
तभी रूही बोली -आप कहें , तो मैं अभी भी आपको ,आपकी बेटी से मिलवा सकती हूं।
सच में, क्या तुम उसे अपने साथ लेकर आई हो , क्या तुमने उसे कहीं छुपा रखा है , सरला ने पूछा।
हाँ , उसका असली चेहरा मेरे ,इस चेहरे के पीछे छुपा हुआ है। रूही की बात सुनकर सभी उसकी तरफ देखने लगे। मैं ही डॉक्टर अनंत की बेटी'' रूही'' हूं और मैं ही आप दोनों की बेटी ''शिखा'' भी हूं।
यह तुम क्या कह रही हो ऐसा कैसे हो सकता है ?आश्चर्य से दोनों उसकी तरफ देख रहे थे ? गर्वित को तो जैसे विश्वास ही नहीं हुआ और वो वहां से उठकर बाहर चला गया।
यह डॉक्टर साहब के कारण, संभव हुआ मैं कम से कम एक वर्ष तक कोमा में रही। मुझे कुछ भी याद नहीं था , मैं सब कुछ भूल चुकी थी। उन्होंने मेरा जला हुआ, चेहरा ठीक करवाया। मुझे अपनी बेटी बनाया और फिर उन्होंने मेरे कहने पर उस ठाकुरों की हवेली में मेरा विवाह भी करवाया।
क्या ? दोनों ही आश्चर्य होकर उसे इस तरह देख रहे थे, जैसे पहले कभी न देखा हो या यह कोई कहानी गढ़ रही है। उस चेहरे में अपनी बेटी को ढूंढने का प्रयास कर रहे थे। इसमें आश्चर्य चकित होने की कोई बात नहीं है मैं ही आपकी बेटी 'शिखा' हूं। विवाह से पहले भी आप लोगों से, इसीलिए मिलने आई थी कि आप लोगों का आशीर्वाद मिल जाए।
तब तुमने हमें यह बात क्यों नहीं बताई थी, नाराज होते हुए सरला जी ने पूछा।
