धन ,सम्पत्ति के लालच में, पार्वती हवेली में आई थी। सोचती थी -अमीरों की तो अलग ही शान होती है। काम करने के लिए नौकर -चाकर होंगे। खूब मौज -मस्ती होगी। न ही किसी बात की फ़िक्र किन्तु यहाँ आकर अब उसकी सोच बदलने लगी।
हमें खाने को कितना चाहिए ,कितना ओढ़ेंगे ,पहनेंगे ? जब ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं ,तब लगता है ,जिसमें शांति और सुकून मिले उतना ही काफी है। वो ग़रीब घर से थी ,आगे बढ़ने के लिए परिश्रम किया ,मौसी की सहायता से विदेश भी पढ़ने भी गयी थी। अपने परिश्रम से आगे बढ़ना भी चाहती थी ,जितना मिल जाए ,उतना ही कम ,किन्तु जब ठाकुर परिवार की बहु बनी ,धीरे -धीरे उसे एहसास होने लगा। पैसा तो है, किन्तु शांति नहीं। इतनी बड़ी हवेली में रहकर भी वो सुख नहीं है ,जो उसे आगे बढ़ने के सपने देखने में आता था।यहाँ आकर तो जैसे उसकी सोच ही कुंठित हो गयी है।
अब वो अपने, सपने पूर्ण कर सकती है किन्तु अब वो जिज्ञासा नहीं रही ,वो उत्साह नहीं रहा। उसे लगता है ,उसकी अपनी कोई पहचान ही नहीं रही। बस ठाकुर ख़ानदान की बहु बनकर रह गयी है। जबसे गर्वित और रूही के रिश्ते में झाँका है। तब उसे एहसास हुआ, इन लोगों की नजरों में एक औरत की क़ीमत क्या है ?
वैसे भी ,रूही के जाने से, उसके उत्तरदायित्व बढ़ गए हैं ,अपने लिए सोच भी नहीं पाती है इसीलिए वो चाहती है ,रूही वापस आ जाये। दमयंती की भी उम्र हो चली है ,बड़ों का ध्यान भी रखना पड़ता है ,समाज की परवाह ज्यादा रखनी पड़ती है। कल को यदि कोई बात हो जाये तो उसे ही जबाब देना होगा क्योंकि हवेली में जो कुछ भी होगा ,उसका उत्तरदायी उसे ही माना जायेगा।
''पैसे वाला होना, सिर्फ़ महंगी साड़ियाँ और आभूषण पहनकर पार्टियों में या फिर शानदार समारोह में जाना ही नहीं होता वरन उत्तरदायित्वों को निभाना भी होता है ,उस गरिमा को बनाये रखना भी होता है। इसी कारण उसने जानना चाहा -मम्मी जी कहाँ गयीं थीं ?और अंदर आकर कमरे में क्यों बंद हो गयीं ?
समय के साथ-साथ गर्वित को भी लगने लगा ,अपनी जगह रूही सही थी। उसने हम लोगों के कारण न जाने, क्या-क्या परेशानियां झेली हैं ? वास्तव में देखा जाए ,तो वह एक तरह से मर चुकी थी। अब तक सच छुपाकर कर मेरे साथ रहती आई है , वो चाहती तो आगे भी रह सकती थी किंतु उसने ऐसा नहीं किया। वह सच्चाई का सामना करना जानती है किंतु मैं ,उस सच्चाई को झुठला देना चाहता था।
तभी उसकी दृष्टि, डायरी के उस पन्ने पर पड़ी, जिसमें रूही ने अपने मनोभाव लिखे हुए थे , उसे पढ़ कर उसे लग रहा था -वह उससे ,अपने बच्चों से बहुत प्रेम करती है किंतु सच्चाई के साथ जीना चाहती है। झूठ के साथ आगे की जिंदगी नहीं जीना चाहती थी। उसके बच्चे बार-बार उससे कह रहे थे -पापा बताओ !न.... मम्मी को कब लाओगे ? वह अपने बच्चों की हालत और डायरी के उन पन्नों को पलट कर देख रहा था। गुनहगार तो उसका, मैं भी हूं। सच्चाई तो मैं भी जानता हूँ ,किन्तु उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ।
जब उसने मुझे सच्चाई से अवगत कराया , मालूम नहीं ,क्यों ? मैंने उस सत्य को स्वीकार नहीं किया एक पति का कर्त्तव्य होता है कि वह अपनी पत्नी की सुरक्षा करें। किंतु मैंने क्या किया ? जब तो अक़्ल नहीं थी ,अब भी तो वही कर रहा हूँ। अब तक अपने भाइयों के सभी बुरे कार्यों में उनका साथ दिया है।
अब धीरे-धीरे ठाकुर का अहंकार दम तोड़ने लगा था, उसे लगने लगा था, मुझे सच्चाई का सामना करना चाहिए अपने बच्चों के लिए ,अपने परिवार के लिए ,इस हवेली के लिए और यहां की सुख- शांति के लिए तब वह अपने बच्चों से कहता है -मम्मी को लेकर आएंगे ! बच्चे इतना सुनते ही प्रसन्न हो जाते हैं और सारी हवेली में सबको बताते हुए घूम रहे थे।
कल हम मम्मी को लेकर आ रहे हैं। मौसी, कल हम मम्मी को लेकर आ रहे हैं ,कहते हुए आगे बढ़ गए ,सभी बड़े प्रसन्न थे।
दादी ! दरवाज़ा खोलो !किन्तु ख़ुशी संभाले नहीं सम्भल रही थी ,उन्होंने दरवाजे के खुलने की प्रतीक्षा भी नहीं की और बाहर से ही बोले -दादी !कल हम मम्मी को लाएंगे। सच्चाई किसी को भी मालूम नहीं थी।
शाम तक जब दमयंती जी के कक्ष का दरवाजा नहीं खुला ,तब पारो ने चाय देकर रामलाल को भेजा। जाओ ! मम्मी जी को चाय दे आओ ! वो भी जानना चाहती थीं, आख़िर वो कहाँ गयीं थीं और आकर तब से कमरे में ही क्यों बैठी हैं ?
रामलाल ने दरवाजा खटखटाया किन्तु उन्होंने दरवाजा नहीं खोला ,तब उसने चाय को एक तरफ रखा और दरवाजे को धक्का दिया। थोड़े से धक्कों में ही दरवाजा खुल गया। दमयंती जी अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी हुई थीं। रामलाल को थोड़ा शक़ हुआ कहीं इनकी तबियत तो नहीं बिगड़ गयी इसीलिए चाय लेकर आगे बढ़ा और बोला -मालकिन !बहुत देर हो गयी ,लीजिये चाय पी लीजिये !किन्तु दमयंती जी हिली भी नहीं।
तब उसने पारो को बुलाया ,वो डॉक्टर की बेटी है। कभी- कभी उसे और रूही को ''डॉक्टर की बेटी'' कहकर पुकारता- डॉक्टर की बेटी ! शीघ्र आइये ! मालकिन, उठ नहीं रही हैं।
पारो शीघ्र ही, लगभग दौड़ते हुए ,उनके कक्ष में गयी और बोली -मम्मी जी !मम्मी जी ! किन्तु दमयंती के शरीर में कोई हरकत न देखकर, उसने उनकी नब्ज़ की जाँच की और उनकी नाक के समीप अपना हाथ लेकर सांसों की जाँच की ,तब बोली - मम्मी ! अब हमारे बीच नहीं रहीं।
रामलाल का चेहरा उतर गया और एकदम से बाहर की तरफ भागा ,और घरवालों को खबर देने के लिए इधर -उधर दौड़ने लगा। थोड़ी ही देर में लोग इकट्ठा होने लगे। इस घर की नींव दमयंती अब नहीं रहीं।
क्या हुआ था ? किसी ने पूछा।
क्या बताएं ?वे तो पूरी तरह से स्वस्थ थीं।
सुमित और गर्वित ने भी यही प्रश्न पारो से किया ,मम्मी को क्या हुआ ? वो तो स्वस्थ थीं।
मुझे क्या मालूम ? कुछ देर के लिए बाहर गयीं थीं ,बाहर से आकर अपने कमरे में बंद हो गयीं ,तब से बाहर ही नहीं निकलीं।
कहाँ गयीं थीं ?
मुझे नहीं मालूम , मुझे क्या बताकर गयी थीं ? न ही आकर बताया।
दमयंती जी ,आकस्मिक मौत सबके लिए चौंका देने वाली खबर थी। धीरे -धीरे सभी रिश्तेदारों को सूचित कर दिया गया था।
यह ख़बर आश्रम तक भी पहुंची ,रूही को इस बात का न ही दुःख हुआ,न ही ख़ुशी ! कि दमयंती जी अब इस दुनिया में नहीं रहीं , किन्तु उसके अंदर एक मौन समा गया था। मेरे जीवन में इस सबकी जिम्मेदार वो ही तो थीं। अब तो सम्मान से बोलने का मन भी नहीं करता। उसने औरत होकर ,औरत के दर्द को ही नहीं समझा।'' उसने कभी अपने बच्चों को नहीं समझाया-' कि उनकी सोच गलत है या वो जो कुछ भी कर रहे हैं। वो गलत है। मेरी ही नहीं ,न जाने कितनी लड़कियों की ज़िंदगी उन्होंने बर्बाद की है।''
