कुणाल तुम्हें एक बार उस मकान में जाकर छानबीन करनी होगी। हम चाहें तो कह सकते हैं ,इन दोनों ने मिलकर हत्याएं की हैं किन्तु हमें असली क़ातिल को ढूँढना है,इंस्पेक्टर तेवतिया बोले - मैं, नित्या से मिलने जाता हूँ। कल्पित तुमने इस लड़की का दिल तोडा है ,तुम्हें ही इसे समझाना होगा और सच्चाई की तह तक जाना है।
अब क्या वो मुझ पर विश्वास कर पायेगी ,मुझे नहीं लगता ,अब वो मुझसे बात भी करेगी।
कल्पित की बात में दम था ,तब क्या किया जाये ?
कुछ नहीं ,एक होशियार वक़ील से मिलना होगा ,चांदनी ने सुझाव दिया।
हाँ, यह सही है, चांदनी यह कार्य तुम्हारा है।
एक सप्ताह की जद्दोज़हद के पश्चात ,सबूतों के आधार पर कल्याणी जी को हिरासत में ले लिए गया। उस मकान में छानबीन करने पर पता चला। उस गमले पर कल्याणी जी के ही अँगुलियों के निशान थे। सभी जगह सफाई कर दी गयी थी किन्तु उस गमले को साफ करना भूल गयीं थीं।
नित्या ने बताया -बुआजी ! ऐसा कर सकती हैं ,जब उन्हें क्रोध आता है ,तब वो किसी को भी नहीं बख़्शती हैं इसीलिए घर में सभी उनसे डरे रहते हैं। यहाँ तक कि उनके सामने फूफाजी की भी नहीं चलती। हत्या जैसा कार्य शिल्पा नहीं कर सकती। वो एक भावुक लड़की है ,प्यार में पड़ सकती है। कलाकारी करती है किन्तु वो तो किसी जानवर या इंसान की चोट भी नहीं देख सकती। उसके'' हाथ -पांव फूल'' जाते हैं। हो सकता है ,वो रंजन के व्यवहार से नाराज रही हो किन्तु उसकी हत्या का वो सोच भी नहीं सकती।
बुआजी !अपनी इकलौती बेटी से बहुत प्रेम करती हैं ,उसको कभी भी परेशान नहीं देख सकतीं ,उनके सामने उनका दामाद और उसका प्रेमी उनकी बेटी का सम्मान तो दूर बेइज्जती कर रहे थे। ऐसे में उनका गुस्सा आना और हत्या कर देना ,सम्भव हो सकता है।
आज यदि वो लाल रंग को देखकर डर जाती है,इसका अर्थ यही है ,उसने हत्या होते तो देखी हैं और जब उसके सामने ये रंग आता है ,वो दृश्य उसकी आँखों के सामने उभरते होंगे। शिल्पा उनकी बेटी होने के बावजूद भी, उनसे ज्यादा कुछ नहीं कहती है। कभी -कभी बुआजी की ज्यादती भी सहन कर जाती है।
वकील जब शिल्पा से मिली ,पहले तो शिल्पा यानि रोहिणी ने बात ही नहीं की ,चुप ही रही। तब वक़ील ने कहा -अपने मन पर कब तक ये बोझ लिए रहोगी ? इसे उतार क्यों नहीं फेंकती ? कभी अपने बेटे के विषय में सोचा है ,जो तुम्हारे प्यार [कुमार] की निशानी है, हालाँकि वो इसे स्वीकार नहीं कर रहा था किन्तु तुम ही सोचो ! तुमने तो प्यार किया है। क्या तुम जेल जाकर उसका जीवन बर्बाद कर देना चाहती हो ?
कुछ देर की चुप्पी के बाद वो बोली -उसे तो मम्मी पाल लेंगी ,मैंने जीवन में ऐसा क्या किया है ? जो मैं जिन्दा रहूं। मम्मी, इस उम्र में मेरे लिए जेल जाएँगी, क्या ये सही है ? उन्होंने जो कुछ भी किया मेरे लिए ही तो किया। ,
पालना ही सब कुछ नहीं होता ,उसको अच्छे संस्कार देने हैं ,पढ़ाना है ,तुम्हारी मम्मी की अब उम्र हो चली है ,वो ये सब कैसे संभालेंगी ?
आप कहना क्या चाहती हैं ? क्या वो इस उम्र में जेल में रह पाएंगी ,जेल के अत्याचार सह पाएंगी ?
उन्हें ज़िंदगी के अनुभव हैं। अपने को अच्छे से संभाल सकती हैं उनकी उम्र देखकर उनके साथ कोई ज़्यादती नहीं होगी। उनका वहां पर रहन -सहन ठीक रहा तो हो सकता है उनकी सजा भी कम हो जाये किन्तु इतने छोटे बच्चे की ठीक से देखभाल नहीं कर पाएंगी।
मैं जानती हूँ ,मेरी माँ ने जो कुछ भी किया, मेरे लिए ही किया ,मेरे दुःख से दुःखी होकर ही , वे ये सब कर पाईं। न ही मैं होती, न ही मेरे ग़म होते और न ही ये सब होता। इन सबका कारण तो मैं ही हूँ। वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं। मेरे बच्चे से भी करेंगी।
जब तुम्हें इतना सब मालूम है। वो ,तुमसे इतना प्यार करती हैं, तो क्या वो ये बात सहन कर पाएंगी कि उनकी बेटी जेल में उम्र कैद की सजा काट रही है या फिर हत्या करने के अपराध में उसे फांसी हो गयी। हो सकता है। वे तुम्हारे बेटे को भी इसका ज़िम्मेदार माने और उसके साथ अच्छा व्यवहार न करें या फिर उसे कुमार की संतान समझ उसकी अच्छे से परवरिश ही न करें। तब क्या उसका जीवन उनके हाथों में सुरक्षित रहेगा ?
अब ये तुम्हें सोचना है, जो हो गया उसे लौटाया तो नहीं जा सकता किन्तु जो बिखर रहा है ,उसे समेटा तो जा सकता है। उन्होंने अपना अपराध स्वीकार लिया है।
मेरी माँ ने जो कुछ भी किया ,अपनी बेटी के लिए किया। मैं भी जो कुछ भी करूंगी अब अपने बेटे के लिए ही करूंगी यही सोचकर वो बोली - हाँ ,ये सभी हत्याएं मेरी माँ ने ही की हैं , रोहिणी ने स्वीकारा।
कुछ दिन अदालत में मुक़दमा चला और कल्याणी जी को उम्र कैद हो गयी। उन्हें जेल में आये एक महीना हो गया किन्तु उनसे मिलने कोई नहीं आया। सबको लगा जैसे उनका परिवार ,उनका अपना कोई नहीं है। एक दिन कैदी नंबर पांच सौ पचपन से मिलने कोई आया।
उनके चेहरे पर एक गंभीरता थी ,वो जब उससे मिलने गयीं ,तो सामने रोहिणी खड़ी थी। माँ को देखते ही उसकी आँखों में आंसू आ गए और बोली -माँ ! मुझे क्षमा कर दो ! मैं आपके लिए कुछ न कर सकी। वैसे मैं आपके लिए हाईकोर्ट में जाउंगी।
तुम्हारे पापा कैसे हैं ?
वो ठीक हैं।
तुम्हारा बेटा !
वो भी स्वस्थ है।
उनकी आँखों में जैसे कुछ प्रश्न थे ,पूछा -तुमने ऐसा क्यों किया ? मैंने जो कुछ भी किया ,तुम्हारी भलाई के लिए ही तो किया।
मम्मी !मैंने भी जो कुछ भी किया अपने बेटे के लिए ही किया ,मैंने तो अपना अपराध स्वीकार कर ही लिया था किन्तु आपने न जाने क्यों? अपने ऊपर ओट लिया। तब मुझे वकील साहिबा ने समझाया - पहले अपना स्वार्थ देखा जाता है ,बेचारी को मुझसे बड़ी हमदर्दी थी। उनके लिए मैं भी बेचारी बन गयी और स्वार्थी भी... वैसे मैं ,आपको छुड़ाने का भरसक प्रयास करूंगी कहकर रोहिणी वहां से चली गयी।
अपने बच्चे के साथ गाड़ी में बैठी थी ,सोच रही थी - एक माँ अपने बच्चे के लिए क्या -क्या नहीं कर जाती ?मैंने भी वही किया। उसकी नजरों के सामने वे दृश्य तैर गए जब उसने क्रोध में आकर रंजन पर वार किया और घबरा गयी और अपनी माँ को बुला लिया और माँ उसे छुपाकर कोठी में ले गयी। उसने बाहर भी कई लोगों पर वार किये, किन्तु नहीं जानती कौन मरा ,कौन जिन्दा रहा ? वो देश ही छोड़ देती। कल्याणी जी को सब मालूम था, किन्तु वे बेटी की हर हरक़त पर पर्दा डालती आई हैं। कभी उसके सच को झूठा साबित करके तो कभी उसकी हत्याओं के लिए, किसी को भी दोषी ठहराकर ,या फिर उसके चेहरे की सर्जरी कराकर ,उन्होंने हर बार उसे बचाया।
आगरा में तो मेरे पेट में बच्चा भी था और कुमार मुझे स्वीकारने के लिए तैयार ही नहीं था। तब मैं थोड़ा सा कमज़ोर पड़ गयी थी और तब मम्मी को बुलाया लेकिन उन्हें आने में देरी हो गयी '' जब तू मेरा नहीं हो सका ,तो किसी और का भी नहीं होने दूंगी '' कहकर अपमानित हुई मैं ,गमले से उसका सिर फोड़ चुकी थी। मम्मी ने तब बात को संभाला और मुझे बचाकर निकल गयीं।
आज मैंने भी ,अपने बच्चे के लिए ,एक झूठ को सच बना दिया। उसकी गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी और समय की परतें बनती चली गयीं।
साठ वर्ष की उम्र में ,पुलिस की सही से छानबीन न कर पाने के कारण, कोई ठोस प्रमाण न मिलने के कारण, दस वर्ष के पश्चात ,कल्याणी जी को छोड़ दिया गया।
''माँ की ममता ,जो न कराये वो थोड़ा '' आज मेरी इस ''खूबसूरत '' कहानी का अंत यहीं होता है। कहानी के किरदारों से मैं इस तरह जुड़ चुकी थी ,उनसे अब विदा लेते हुए ,कहानी के अंतिम भाग की इति श्री करते हुए प्रसन्नता के साथ -साथ दुख का भी आभास हो रहा है ,क्योंकि मैं इन किरदारों से जुड़ चुकी थी। साथ ही उन पाठकों से कहना चाहती हूँ ,जिन्होंने हर भाग को अच्छे से पढ़ा और सुंदर समीक्षाएं देने के साथ -साथ मेरी कहानी में अंत तक बने रहे। विशेष रूप से''आशा गर्ग ''दीदी ,महारानी और ''संतोष नायक जी'' का विशेष रूप से आभार !🙏प्रकट करना चाहूंगी।
कई बार कहानी में ,मैं अटक भी जाती थी ,कहानी कैसे आगे बढ़ानी है ?कभी -कभी लिखने का, आगे बढ़ने का मन नहीं करता था तब इनकी समीक्षाएं इनकी प्रेरणा मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती। एक बार फिर से सभी पाठकों का भी तहेदिल से आभार 🙏ऐसे पाठक मिल जाएँ तो लेखक कभी हार नहीं मानेगा। उसके प्रेरणास्रोत तो पाठक ही हैं। धन्यवाद !
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