आश्रम में बैठी ,रूही अपने आपको टटोल रही थी, शुरू में जब मैं यहां आई थी, मन में एक खालीपन था। सब कुछ रिक्त था ,न विचार ,न ही कोई भाव !न ही परिवार को छोड़ने का दुःख ! किन्तु जैसे -जैसे समय बीतता जा रहा है ,उतना ही मन विचलित हो रहा है।
अभी भी ऐसा लगता है,आश्रम में सामने कार्य करते लोगों को देखकर ,उसे लग रहा था -' जैसे लोग किसी मशीन की तरह अपनी-अपने उत्तरदायित्व निभा रहे हैं, किसी को किसी से मोह- माया या लगाव नहीं है। बस अपने कार्य करते हुए ,जैसे मशीन बन गए हैं। क्या यह मन का शांत होना है ? मन क्या इस तरह आश्रम में आने से शांत हो जाता है ? किन्तु मेरे मन का क्या ? जिसमें अनेक विचार और उथल-पुथल मची हुई है ।
उधर रूही के चले जाने पर गर्वित सोच रहा था -रूही को गए हुए, पंद्रह दिन हो गए हैं, किंतु एक बार भी उसने यह नहीं सोचा, मेरे बिना, बच्चे क्या कर रहे होंगे, कैसे रह रहे होंगे ? पारो तो उसकी बहन है और उसने भी, एक बार भी रूही के विषय में जानने या उससे मिलने का प्रयास नहीं किया। और मुझसे पूछ रही थी - क्या रूही ने चलते समय कुछ कहा था ?
वह क्या कहेगी ? उसने इतना बड़ा प्रपंच,जो मुझे सुनाया था ,क्या वह कहना काफी नहीं था ?इसके अतिरिक्त भी उसे और कुछ कहना था। तभी अचानक से गर्वित के मन में वही शब्द उभर कर आए - ''क्या तुम्हें, मुझसे कुछ कहना है ?'' मुझे भला उससे, क्या कहना होगा ? उसने इतना सब तो कर दिया है, मैं भला क्या कहूंगा ?क्रोध तो बहुत आया था किन्तु अब उसे जेल भी नहीं भेज सकता। सभी घरवालों को पता चलेगा ,तो क्या सोचेंगे ?उन पर क्या बीतेगी ?
तभी पार्वती, गर्वित के कमरे में आती है और उससे पूछती है - जीजा जी ! क्या रूही की तरफ से कोई जवाब या कोई संदेश आया ? क्या आप उसे लेने नहीं जाएंगे ? आज मम्मी जी भी पूछ रही थीं ' कि वह कब तक आश्रम में रहेगी ?' जो होना था, सो हो गया जिनको जाना था, वो चले गए। '' उसे लौटाया तो नहीं जा सकता, कम से कम इस वर्तमान को तो सही से जिया जा सकता है। ''
एक बात मेरे ध्यान में आई, गर्वित सोचते हुए बोला - तुम्हारी बहन अक्सर मुझसे पूछती थी -''तुम्हें, मुझसे कुछ कहना तो नहीं है ''इस बात का क्या अर्थ हो सकता है ?
इतने दिनों से रूही के साथ रह रहे थे, आप अभी भी उसको नहीं समझ पाए।
मैं भला औरत के मन को कैसे समझूंगा ? हो सकता है, जब उसने मेरे भाइयों के लिए, ऐसा सब किया और मुझे पता चला तो शायद उसे मुझसे उम्मीद रही होगी , मैं, उसे डाटूंगा या कुछ कहूंगा।
यहीं तो, आप गलत हैं,'औरत के तन को ही पढ़ना जाना किन्तु उसके मन को नहीं,' क्या उसने कभी अपने किये की आपसे माफी मांगी है या आपके भाइयों को मारने का अपराध स्वीकार करके आपसे माफी मांगी है ? नहीं न.... क्योंकि उसे अपने किये कार्य पर किसी भी प्रकार का दुख या अफसोस नहीं है। वह क्यों माफी मांगे ? उसने क्या गलत किया है ?उसके साथ गलत करने वालों को सजा दी है।
फिर वह मुझसे यह किस लिए कहती थी - कि क्या आप मुझसे कुछ कहना चाहते हैं, यह एक पहेली की तरह मेरे दिमाग में बार-बार घूम रहा है।
अपराध तो आपने भी किया था, क्या कभी आपने,उससे अपने किए अपराध की क्षमा मांगी ? उसने, आपको छोड़ दिया मेरे कहने पर सुमित को भी नहीं छुआ, इससे क्या तुम दोनों का अपराध कम हो गया ? उसने गौरव और पुनीत को, उनके किये अपराध का दंड तुरंत दिया। मुझे जरा एक बात सच -सच बताइये ! जब उसके साथ यह सब हो रहा था, क्या आप उसमें शामिल नहीं थे ?
गर्वित की नजरें झुक गईं और बोला -उस समय हम बहुत छोटे थे, उम्र भी कम थी ,अक़्ल ही नहीं थी।
अब तो अक़्ल आ गयी ,जब आपको पता चला ,शिखा ने रूही बनकर उनको, उनके अपराध की सजा दी है ,क्या एक बार भी आपके मन में ये प्रश्न नहीं उभरा ,उसने हमें क्यों छोड़ दिया ? क्या उसकी नजरों में आप अपराधी नहीं थे ? और जब अक्ल आई तो ,आपने क्या किया ? क्या आपने अपने किए अपराध की उससे क्षमा मांगी ?
जब उसने संपूर्ण व्याख्यान आपको सुना दिया कि वह रूही नहीं शिखा है, तो उस शिखा से क्या आपको क्षमा याचना नहीं करनी चाहिए थी ? उस समय भी आप अपने परिवार और अपने भाइयों के लिए सोच रहे थे। उस दिन भी मैं कहने वाली थी किंतु यह सोचकर चली गई ,शायद एकांत में, इतने दिनों की दूरी, आपको एहसास कराएगी कि आपने क्या गलती की है ?वो इतने दिनों आपके साथ रही ,उससे आपके बच्चे हुए....ख़ैर छोडो !
जब आपसे उसने कहा- कि मुझे आश्रम में छोड़ आओ ! और आप उसे छोड़कर चले आये। आपके मन ने उसे रोका क्यों नहीं , उसे जाने क्यों दिया ? क्योंकि तब भी आपको लगता था कि उसने आपके भाइयों के प्रति गलत तो किया ही है, आप उसे सजा भी देना चाहते थे। एक तरफ आप, उससे प्रेम करने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ आपके अंदर वह अधिकार की, प्रेम भरी भावना भी नहीं रही , जो अपने प्रेमी को रोक सके क्योंकि जब आपको सच्चाई का ज्ञान हुआ ,वो प्यार तो कपूर की तरह उड़ गया।
उसने, इस हवेली को उनके वारिस दिए ,वो अब तक अपने इसी उत्तरदायित्व को निभाने के लिए आपके साथ थी। उसने अपना फर्ज निभाया भी... किंतु वह आपसे भी अपेक्षा रखती थी कि आप उसकी भावनाओं को समझें ,उसके रूही वाले रूप को ही न देखें बल्कि शिखा के मन को भी पढ़ने का प्रयास करें। वह शिखा जिसने इतने दुख- दर्द और परेशानियां झेली हैं।वो रिश्ते बनाना ही नहीं ,निभाना भी चाहती है।
आप उसके अपराधी थे। आपने, उससे एक बार भी यह नहीं कहा -''कि उस अपराध में, मैं भी उन लोगों के साथ शामिल था ,मैं भी तुम्हारा गुनहगार हूँ ,तुम जो चाहे मुझे सजा दो ,या मुझे क्षमा कर दो !'
इसीलिए वह बार-बार पूछ रही होगी, क्या आप मुझसे कुछ कहना चाहते हैं ? लेकिन उसने महसूस किया कि आपके मन में वह' अपराध बोध' तो है ही नहीं। तब उसे लगा होगा , हमारा एक साथ रहना उचित नहीं होगा और आप उसे छोड़ने चले भी गए ,एक बार भी उसे नहीं रोका ,अधिकार से कहते - रुक जाओ ! मेरे लिए ,इन बच्चों के लिए ,मैं तुमसे प्रेम करता हूं। जो हो गया ,उसे भूल जाओ ! मैं अपने किए पर शर्मिंदा हूँ , क्षमा चाहता हूं। बस इतना ही तो वह चाहती थी। '' लेकिन इस बात को समझने में भी आपने पंद्रह दिन लगा दिए। उसकी दूरी भी आपको समझा न सकी, कि गलती कहां है ?
पाठकों से निवेदन है ,आप इस रचना को पहले की तरह अपना प्यार बरसाते रहिये ! क्या गर्वित को अपनी गलती का एहसास होगा। क्या पार्वती के समझने पर वह अपनी गलती मानकर रूही को हवेली वापस ले आएगा ? जानने के लिए पढ़ते रहिये !''मिस्टीरियस नाइट्स '' साथ ही अपनी समीक्षा और सुझाव भी देते चलिए। धन्यवाद !
