Mysterious nights [part 188]

न जाने रूही, क्या सोचकर गर्वित को साथ लेकर, अपने घर आई थी और उसी के सामने, अपने सभी रहस्य खोल रही थी ? तब वो अपने माता -पिता से बताती है ,कि विवाह से पहले भी वो उनसे मिलकर गयी थी ,उनका आशीर्वाद लेने आई थी। तब नाराज होते हुए ,सरला कहती है -ये सभी बातें तूने हमें पहले क्यों नहीं बताईं ?


 अभी मेरा कार्य पूर्ण नहीं हुआ था, मुझे उस हवेली में वापस भी तो  जाना था ,यदि मैं आप लोगों को पहले से ही बता देती कि इन लोगों ने मेरे साथ क्या किया है ? तो क्या आप लोग दोबारा मेरा विवाह उस हवेली में होने देते ? और जब इन लोगों को भी पता चल जाता कि' मैं ही शिखा हूं और मैं ही रूही तो क्या ? ये  लोग ,मुझे जिंदा छोड़ते। इनकी हवेली का षड्यंत्र कैसे लोगों के सामने आता ?

मुझे तो, जीना ही नहीं था किन्तु अब जी हूँ, तो हवेली में कुछ तो होना ही था।  

रूही की बातें सुनकर, गर्वित को तो जैसे चक्कर आ गया था ,वह कुछ समझ नहीं पा रहा था, क्या करें और क्या नहीं ? क्या यह वही  शिखा है ? जो मुझे अपने करीब आने पर शिखा के रूप में मुझे डराती थी ? और मैं बेवकूफ़ यही सोचता रहा, कि शायद शिखा की आत्मा यहां भटक रही है। उसके मन में रूही के प्रति जो प्रेम था ,न जाने कहाँ लुप्त हो गया ? एक विरक्ति सी महसूस हुई। 

इसने कितना बड़ा षड्यंत्र रचा ,हमें बर्बाद करना चाहती थी ? और आज मुझे यहाँ लाई है ,अपने माता -पिता के सामने लज्ज़ित करना चाहती है। इसके आने पर ही हमारे घर में मौतों का सिलसिला बढ़ने लगा।  सोचा ,इस मनहूस को यहीं छोड़कर चला जाये ,दूसरे ही पल उसे डर लगा,कहीं इसका उद्देश्य मुझे यहाँ ला कर मरवाने का तो नहीं है। ये बातें सुनकर, इसके घरवालों को क्रोध आएगा और गांववालों के साथ मिलकर मुझे मार देंगे या फिर जिन्दा जला देंगे, उस अग्नि से गर्वित की आँखें जल उठीं। 

क्या सोच रहे हो ? दामाद जी ! किशोरीलाल जी का स्वर उसके कानों में पड़ा वो जैसे सोते से जागा ,और उसका सपना टूट गया।

जी.... कुछ नहीं,उसकी आवाज में घबराहट थी।  

हम आपके बहुत आभारी हैं ,जो आपने हमारी बेटी को अपनाया और जीने का नया अवसर दिया। अब ये सब गलती तो आपके परिवार वालों की थी। आपने तो कुछ किया ही नहीं था। आप तो विदेश में थे ,अब आप यही सोच रहे होंगे। हमारी बेटी और तुम्हारी पत्नी के साथ, तुम्हारे भाइयों के कितने अत्याचार किये हैं ? यदि आप वहां होते तो अवश्य ही उन्हें दंड़ देते किन्तु ''भगवान के घर ,देर है, अंधेर नहीं। ''उन्हें दंड तो मिलना ही था , ऊपरवाला सब देखता है। उनके अपराध की सजा उन्हें ऊपरवाले ने दे दी। 

मन ही मन रूही सोच रही थी ,मेरे घरवाले कितने भोले हैं ? ऊपर वाला इंसानों के कर्मों की सजा देने के लिए स्वयं नहीं आता, या तो किसी को भेजता है या फिर स्वयं ही न्याय करना पड़ता है।'' 

जी.... जी आप सही कह रहे हैं ,तब वो रूही की बातों का मर्म समझ सका। इसने पहले ही अपने घरवालों से बता दिया था कि  मैं विदेश में था ,मतलब इसका गुनहगार मैं नहीं था। जब हमने इस पर इतने अत्याचार किये तो इसने मुझे और सुमित को क्यों छोड़ दिया ?या फिर हमें इससे भी बद्त्तर मौत देना चाहती है। 

तब किशोरीलाल जी बोले -'अपने भाइयों की करतूत सुनकर आपको भी तो क्रोध आ रहा होगा। जो हो गया उसको सुधारा तो नहीं जा सकता, किन्तु अब उन्हें क्षमा कर दो ! भगवान उनको सदगति दे ! उनके किये की सजा उन्हें अपनी जान गंवाकर देनी पड़ी।हमारी बेटी जिन्दा है ,और हमारे सामने खड़ी है ,हमारे लिए तो यही बहुत है।  अब हमने ,हमारी बेटी को आपके हवाले किया है ,उसका हमेशा ख्याल रखियेगा । 

मन ही मन गर्वित  सोच रहा था ,मैं इसका ख़्याल कैसे रखूंगा ?अब तो इससे बचने के लिए हमें ही अपना ख़्याल रखना होगा। उसका जी चाहा , शिखा को यहीं छोड़कर चला जाए। रहे ,अपने माता -पिता के पास। तभी मन में विचार आया ,वैसे इसने ,मुझे अपमानित होने से मुझे बचा लिया ,ये चाहती तो मेरा नाम भी ले सकती थी। गांववालों से मिलकर, हमारे परिवार की बेइज्जती कर सकती थी,  किन्तु ये अपने घरवालों को ये सब बता रही है ,वो भी मेरे सामने ,कुछ बात समझ में नहीं आई।  

वैसे ये मेरे बच्चों की माँ है ,हो सकता है इसीलिए इसने मेरे विषय में किसी से कुछ नहीं कहा। सोचा होगा यदि मुझे कुछ हो गया तो, हमारे बच्चों का क्या होगा ?  बाहर खेलते बच्चों की आवाज सुनकर यही सब विचार मन में आ रहे थे। तब क्या मुझे शर्मिंदा करने के लिए यहाँ लेकर आई है ? 

रूही ने, अपने घर वालों से खूब बातें की, बच्चे भी अपने नाना -नानी के साथ खेल रहे थे। गर्वित भी मन ही मन सोच रहा था, यदि मैं इसे यहां छोड़ कर गया , तो इसकी बातों में सच्चाई की मोहर लग जाएगी और यहां आकर भी ,इसने मेरा कोई अपमान नहीं किया है। इसने तो मुझे बचा ही लिया  कि ये तो बाहर पढ़ने गए थे  किंतु यह बहुत बड़ा विश्वासघात था , जिसे वह हज़म नहीं कर पा रहा था। 

तब अचानक उठा और बच्चों से बोला -चलो ! अब हमें घर चलना चाहिए ,बहुत देर हो गयी। रूही ने गर्वित की तरफ देखा, शयद वो यह जानने का प्रयास कर रही थी ,ये सभी बातें सुनकर गर्वित के मन में क्या चल रहा है ?

अच्छा ,मम्मी -पापा ! अब मैं जा रही हूँ ,अपना ख्याल रखियेगा। 

हाँ ,ठीक है ,दामाद जी हमारी बेटी का ख़्याल रखियेगा ,ऐसा दामाद पाकर हम तो धन्य हो गए ,अपने भाइयों की गलती को भी क्षमा कर दीजियेगा और बेटी को भी समझाइयेगा।  

 कुछ देर बाद, वो सभी गाड़ी में बैठकर डॉक्टर अनंत के घर की तरफ रवाना हो गए। 

 रास्ते भर गर्वित ने रूही से कोई बात नहीं की, वह चुपचाप गाड़ी चलाता रहा। बच्चे अपनी  ही धुन में मग्न थे अपने नाना -नानी से मिलकर प्रसन्न थे। उन्हें क्या मालूम था कि हमारे माता-पिता के जीवन में क्या चल रहा है ? गर्वित समझ नहीं पा रहा था कि ऐसी स्थिति में, मैं क्या व्यवहार करूं ? मुझे रूही से नाराज होना चाहिए या फिर क्षमा मांगनी चाहिए। 

उसका अहम आगे आया ,मैं क्षमा क्यों मांगूं ? इसने ही हमारे साथ क्या अच्छा किया ? हम सबसे झूठ बोला। वो भी तो इस भीड़ में शामिल था,तभी उसके अंतर्मन ने उसे धिक्कारा  ,इसने अपने घरवालों के सामने तेरा सच नहीं खोला ,क्यों नहीं खोला ? प्रश्न मन में कुलबुलाने लगा।  

तभी अचानक रूही की तरफ देखकर गर्वित बोला -मैं तुमसे एक बात और पूछना चाहता हूं। 

 क्या ?

क्या तुम, ये  बातें मुझे, पहले नहीं बता सकती थीं। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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