बिटिया ! तुम हमारी बेटी के बारे में इतना सब कैसे जानती हो ? सरला जी ने प्रश्न किया जबकि ये तो हवेली वाले ही हैं ,इनके भाई से ही तो, हमारी बेटी का विवाह हुआ था। किंतु इन्हें, हमारी बेटी के विषय में कोई जानकारी नहीं है।
हां ,मैं जानती हूं , ये उसके विषय में कुछ नहीं जानते ,दरअसल ये तो, विदेश में पढ़ने गए थे ,उसने गर्वित की तरफ इशारा किया।
तब रूही बताती है -उस हवेली में आपकी बेटी चली तो गयी थी किन्तु उसका मन नहीं लग रहा था उसका कोई संगी- साथी भी नहीं था। वह तेजस के सिवा किसी से विवाह नहीं करना चाहती थी। किंतु आप लोगों ने भी उसे नहीं समझा और उसे, उन ठाकुरों के हवाले कर दिया।
किशोरी लाल जी,रूही की बात सुनकर बोले -नहीं, बिटिया !हमने ऐसा कुछ भी नहीं किया वह तो ठाकुर साहब कहने लगे-' आपकी बेटी कुंवारी ही है और इससे हम, अपने दूसरे बेटे का विवाह कर देंगे।'
आपने भी, ठाकुर साहब की सुनी, बाबूजी ! अपनी बेटी से भी पूछा था,' कि वह भी, उनमें से किसी से विवाह करना चाहती है या नहीं।' अब आप मुझे ये बताइये ! क्या उन्होंने, अपने किसी भी बेटे का उससे विवाह किया या नहीं ? आपने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया ,व्यंग्य से रूही बोली।
न..न... ऐसा मत कहो ! हमारी एक ही तो संतान है ,भला उसके विषय में हम न जानना चाहेंगे ,रूही की बात सुनकर सरला जी को जैसे धक्का लगा और वो बीच में ही बोल उठीं -सरपंच जी को तो मैंने, उसकी खबर लाने के लिए कई बार भेजा था किन्तु हर बार बेचारे उदास होकर वापिस लौट आते थे। वो लोग उससे मिलने भी नहीं देते थे।
तब आपने ये नहीं सोचा ,ये हमारी बेटी को, हमसे ही मिलने नहीं देते ,कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है। पुलिस की सहायता ले सकते थे।
नहीं, बिटिया !ये हम कैसे कर सकते थे ?वो हमारी बेटी की ससुराल थी ,वहां पर पुलिस को ले जाना उचित नहीं था। इस तरह रिश्तों में दरार भी पड़ सकती थी। हम तो रिश्ते बनाये रखना चाहते थे।
तो क्या रिश्ते बने रहे ?आपकी बेटी बची ,आपने ये नहीं सोचा कि हमारी बेटी से ही हमें मिलने नहीं दे रहे कहीं उसके साथ कुछ गलत तो नहीं हो रहा है,जो ये छुपाना चाहते हों ।
ये सब तुम क्या कहे जा रही हो ?नाराज होते हुए गर्वित ने रूही से पूछा -क्या तुम भूल गयी हो ?अब वो तुम्हारा भी ससुराल है।
जानती हूँ , किन्तु इतने दिनों से ये लोग अपनी बेटी के विषय में जानना चाहते हैं , वो सच्चाई ही, इन्हें बता रही हूँ, कि इनकी बेटी के साथ क्या हुआ ?
तुम, इतना सब कैसे जानती हो ? क्या तुम, उससे मिली हो ?गर्वित ने अविश्वास से पूछा।
वो भी शीघ्र ही पता चल जायेगा। तब वो किशोरीलाल जी की तरफ देखकर कहती है -आपकी बेटी ने ,ठाकुर साहब के किसी भी बेटे को स्वीकार नहीं किया,क्या आप जानते हैं ?उनके यहाँ एक रस्म होती है।
कैसी रस्म ?उन्होंने तो हमें ऐसी कोई भी रस्म के विषय में कुछ भी नहीं बताया ,सरला ने जबाब दिया।
अब तुम हद से ज्यादा बाहर जा रही हो ,क्रोध से गर्वित कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
क्यों ? क्या तुमसे, सच्चाई सुनी नहीं जा रहीं ,व्यंग्य से रूही ने गर्वित की तरफ देखा।
बेटा, बैठो ! इस तरह से इस बच्ची से क्यों नाराज हो रहे हो ? हो सकता है ,तुम भी उस रस्म के विषय में न जानते हों ,तुम तो विदेश में पढ़ाई कर रहे थे ,न....
हअअअअ एक गहरी साँस लेते हुए ,उसने जबाब दिया रूही मुस्कुराई।
वो क्या रस्म थी ?तुमने बताया नहीं ,सरला ने पूछा।
आपकी बेटी का एक लड़के से विवाह हुआ ,या यूँ कहें -वो एक की बेवा बनी किन्तु उन चारों की 'रोज रातों की दुल्हन' बन गयी।
हाय ! राम ! ये तुम क्या कह रही हो ? कहते हुए सरला जी ने अपना माथा पीट लिया। इतनी अनहोनी हमारी बेटी के साथ हो रही थी। शिखा के पापा मैंने आपसे कितनी बार कहा था ? वे लोग हमारी बेटी को ही हमसे मिलने नहीं दे रहे ,अवश्य ही कोई बात है ?
मैं उससे, मिलने तो जाता था किंतु उन्होंने बैठक में थोड़ी मेहमानवाज़ी कर बाहर से भेज देते थे। कभी कहते ,बाहर घुमने गयी है ,विदेश गयी है ,तब मैं क्या करता ?कहते हुए वे रोने लगे।
किन्तु अब गर्वित ड़र रहा था ,ये सच्चाई जानकर वे लोग कहीं मुझसे ही बदला न लें ,मेरे बच्चों को न मार दें ,उसने रूही की तरफ गुस्से से देखा किन्तु वो लापरवाही से अपनी बात कह रही थी - क्या आप जानते हैं ?उसका वे चारों ही प्रतिदिन शोषण करते थे।
घबराहट के कारण गर्वित के कान गर्म हो गए ,चेहरा लाल पड़ गया क्योंकि अब रूही ने 'चारों ' कहा। इस आधार पर तो मैं भी उस अपराध !!!थोड़ा ठहरा और सोचा ,हाँ ये अपराध ही तो था ,जिसमें मैं भी शामिल था।
रूही की बातों पर तो उन्हें जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था -यह तुम क्या कह रही हो ?
वही बता रही हूं, जो सच्चाई है। उन ठाकुरों की हवेली में, उसका रोज शोषण होता था वह रोज तिल तिल मरती थी धीरे-धीरे वह कमजोर होती जा रही थी और एक दिन वह इस दुनिया को ही छोड़कर चली गई।
यह सुनते ही सरला जी के हाथों से, चाय की केतली छूटकर गिर गई और बोलीं -क्या मेरी बच्ची मर गई और उन लोगों ने तो हमें बताया था -कि वह किसी के साथ भाग गई है , उन्होंने नफरत से गर्वित की तरफ देखा गर्वित सर झुकाए बैठा था।
मन ही मन गर्वित सोच रहा था -आखिर यह क्या करना चाहती है ? मुझे यहां लेकर क्यों आई है ?क्या यह मुझे इन लोगों से पिटवाना चाहती है या उसका बदला ले रही है आखिर यह शिखा को कैसे जानती है ?स्वयं गर्वित के मन में अनेक विचार आ रहे थे ?
तब रूही बोली -आपकी बेटी तो मर ही चुकी थी और रातों -रात ये लोग उसके अचेतन तन को लेकर ,अग्नि के हवाले करने भी चले गए।
आपकी लाड़ली बेटी !जिसे आपने इतने नाज़ों से पाला ,उस दिन वो एक लावारिस लाश बन गयी थी ,कहने को उसके माता -पिता भी थे, उसका ससुराल था किन्तु वो उस समय 'अनाथ 'थी।
ऊपरवाले !की माया देखो !तभी उसमें जैसे जान आई जो उसकी चिता की अग्नि थी उसके तेज प्रज्वलित होने से पहले ही, बरसात के कारण वो अग्नि बुझ गई। शिखा का शरीर थोड़ा जल गया था। ठाकुर परिवार के लोग उसे 'भूत' समझकर वहां से भाग खड़े हुए ।
तब वो अपनी चिता की अग्नि से उठी और उस शमशान से बाहर आई ,ऐसे में वो उन लोगों से भी मुक्त हो गयी ,किंतु उसकी हालत बहुत खराब थी। वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी ,तब वह एक गाड़ी से टकराई किंतु उसे तो जिंदा होना था। उसे अभी अपने माता-पिता से दोबारा मिलना था इसलिए उनकी गाड़ी ठीक मौके पर रुक गई और उन्होंने उसे बचा लिया।
