जब मेरी बेटी ने, कुमार से कहा - कि वह उसके बच्चे की मां बनने वाली है, तो उसे कोई प्रसन्नता नहीं हुई उसने, उस बच्चे को गिराने के लिए शिल्पा से कहा।
और जब मेरी बेटी ने उससे कहा -''तुमने मेरे साथ इतना समय व्यतीत किया है, क्या तुम्हारे मन में, मेरे प्रति कोई भी कोमल भावना नहीं है, थोड़ा सा भी प्यार नहीं है। तब भी वह एकदम शांत रहा। तब वो बोली - 'इतने दिनों तक तो किसी जानवर के साथ भी रहते हैं ,तो उससे भी मोह हो जाता है, फिर मैं तो तुमसे प्रेम करती हूँ ,इंसान हूँ, कोई जानवर नहीं ,तुम्हारा वो मुझसे लिपटना ,मुझसे मिलने के लिए बेचैन रहना ,वो सब क्या था ? मैं तुमसे कुछ नहीं मांगूंगी ,बस मेरे इस बच्चे को जीवनदान दे दो ! उसे इस दुनिया में आने दो ! मैं तुम्हारी दूसरी पत्नी के रूप में कहीं अलग रह लूंगी ,तुम्हारे उस रिश्ते में मेरे कारण कोई दरार नहीं आएगी।'
तब कुमार के अंदर की गंदगी बाहर निकलकर आई और उसने जवाब दिया -'हम लोग, मन बहलाने के लिए कभी होटल में, कभी कोठों पर वेश्याओं के पास जाते हैं। तो क्या हम उनके बच्चों के पिता बन जाएंगे ? या उनसे शादी कर लेंगे।'
यह बात सुनकर मेरी बेटी बुरी तरह टूट गई थी ,तुम यह क्या कह रहे हो ? तुमने मुझे 'वेश्या' कहा है ,तुम समझ रहे हो। तुमने, मुझे ,मेरे प्यार को गाली दी है। क्या तुम्हें ,मैं 'बाजारू औरत' नजर आती हूँ ?
उसने इतना ही नहीं ,बल्कि उसने उस बच्चे का पिता होने से भी इंकार किया, बोला - न जाने ,कहाँ -कहाँ मुँह मारा होगा ? और अब इस गंदगी को मुझ पर थोप रही है।
अब चांदनी थोड़ा गंभीर हो गयी ,उसने पूछा -यह कब की बात है ?
यह बात तभी की है, जब आगरा में यामिनी की कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगी थी। अपने सपने और कल्पनाओं को उन चित्रों में समेटकर लाई थी। उसके लिए वह प्यार भी, कितना निर्मोही हो गया था ? जिसके लिए वह अपना जीवन दांव पर लगा रही थी, इतना समय उसका प्यार पाने के लिए लालायित रहती थी। उसी ने, बिना देर किए उसके उस प्यार को, 'आवारा 'कह दिया।
वह नहीं चाहता था कि वह बच्चा इस जीवन में आए और वह उस पर दबाव बना रहा था कि वह इस बच्चे को गिरा दे ! वह नहीं चाहता था ,उसके कारण उसके परिवार में क्लेश हो।
शिल्पा के जीवन में दोबारा खुशियां आईं और पत्ता -पत्ता होकर बिखर रहीं थीं ।
वह मन ही मन सोच रही थी, इतने दिनों से हम दोनों का साथ है। उसका बार -बार मेरे समीप आना -जाना ,मेरे लिए प्यार में पागल हो जाना ,वह सब क्या था ? उसे इन सवालों का जवाब ही नहीं मिल रहा था। उसके फोन आने पर ही, मैं घबरा गयी थी, वो कहीं कुछ कर न बैठे क्योंकि जब उसका फोन आया ,वो रो रही थी। उससे मिलने के लिए मैं भी आगरा पहुंच गई।
जब मैं वहां पहुंची ,उस समय मेरी बेटी रो रही थी ,उस 'नीच 'से अपने प्यार की भीख मांग रही थी ,उसके सामने गिड़गिड़ा रही थी।
मुझे देखकर वो शांत हो गयी और कुमार बोला -ये किसे बुला लिया ?
मैं इसकी माँ हूँ ,तब मैंने उसे समझाते हुए कहा - बेटा ! बहुत दिनों से तुम दोनों एक -दूसरे को जानते हो और सबसे खुशी की खबर तुम्हारे लिए यही है ,ये तुम्हारी' शिल्पा' ही है, जो तुमसे, बरसों से प्यार करती हुई आई है।
क्या यह' शिल्पा' है ? वह बुरी तरह बौखला गया। गुस्से से शिल्पा की तरफ देखकर बोला - तुम्हारी फितरत ही झूठ बोलने की है ,इसने पहले भी 'तमन्ना' बनकर झूठ बोला था और अब तो रूप -रंग ही बदल लिया।
इसने जो कुछ भी किया, तुम्हारे प्यार के लिए ही तो किया ,यह तुम्हारा प्यार पाना चाहती थी।तुम्हीं इसका 'पहला प्यार' हो। मेरे मुँह से शिल्पा ऐसी बात सुनकर मेरी तरफ देखने लगी। तब मैंने कहा -हाँ ,मैं जानती हूँ ये बहुत दिनों से तुमसे ही प्यार करती आई है।
ओहो ! अब पता चला ,इस षड्यंत्र में माँ -बेटी दोनों शामिल हैं। इसने तो अपना रूप- रंग ही बदल लिया है ,इस रूप में भी , ये लोगों की जिंदगियों से खेलती है, उन्हें बर्बाद कर देना चाहती है। पहले तो इसमें रूप- रंग भी नहीं था और अब यह इस रूप रंग के माध्यम से' जहरीली नागिन' बन गई है। एक ऐसी' जहरीली नागिन 'जो डसने के बाद उसे जिंदा नहीं छोड़ती, कोई जिन्दा बच भी जाये तो इसके चंगुल में ,उसका दम घुट जाये। तभी तो अपने पति को डस गयी। तुम कितनी भी कोशिश कर लो ! मैं तुम्हारा कभी नहीं बनूंगा और यदि मुझे पता होता ,तुम वही झूठी ,फ़रेबी शिल्पा हो तो तुम्हारे क़रीब नहीं फटकता। इसकी पोल तो अब मैं खोलूंगा ,पुलिस को बताऊंगा कि ये 'ज़हरीली नागिन 'कौन है ?
अब तुम ही बताओ ! ऐसी बातें सुनकर किसको क्रोध नहीं आएगा ? वो भी मेरे सामने, मेरी बेटी की बेइज्जती किये जा रहा था। जिसकी हमारे सामने बैठने तक की औकात नहीं थी ,अपनी बेटी के लिए मैं उसकी बातें सुन रही थी और वो मेरी बेटी को 'वेश्या' ,'ज़हरीली नागिन 'फ़रेबी और भी न जाने क्या -क्या कहे जा रहा था ? और मेरी बेटी उसके प्यार के लिए अपने को विवश पा रो रही थी ,शायद उसे उम्मीद थी ,कुछ देर के लिए ही सही ,उसकी हालत पर उसे तरस तो आयेगा।
बाहर प्रदर्शनी लगी थी, हम लोगों ने,चौबीस घंटों के लिए , एक अलग कमरा लिया हुआ था ,जहाँ हम मिले थे। लोग उसे एक अच्छी कलाकार के रूप में जानते थे, पहचानते थे और दूसरी तरफ वो' नीच' 'कुमार' उसे वेश्या, झूठी, धोखेबाज ठहरा चुका था। तब वो बोला -मेरी पत्नी, मेरी प्रतीक्षा में होगी ,अभी तो मैं जा रहा हूँ ,बाद में तुम लोगों से निपटूंगा।
अपने प्यार के मुख से ऐसी अपमान भारी बातें यामिनी बर्दाश्त न कर सकी और वहीं बैठ गयी ,उसे बाहर की तरफ जाते देख ,मुझे उस पर क्रोध आया। शिल्पा की हालत बिगड़ रही थी ,और वो जा रहा था ,ऐसे समय में मुझे कुछ नहीं सूझा, पास में रखा गमला उठाया और उसके सिर पर दे मारा और तब तक मारती रही,जब तक की मेरे मन का सम्पूर्ण क्रोध शांत नहीं हो गया। किन्तु मुझे ऐसा करते देख ,मेरी बेटी बेहोश होकर वहीँ गिर पड़ी।
वह मकान उसने, कुमार से मिलने के लिए अलग से किराए पर लिया हुआ था। दिखाने के लिए वह होटल में रह रही थी।
मैंने शिल्पा को होश में लाने बहुत प्रयास किया , जब उसे होश आया तो वहाँ खून से लथपथ कुमार की लाश ,उसके सामने थी। वह घबरा गई और फिर से बेहोश हो गयी। मैंने तुरंत ही अपने कपड़े बदले, और उसको वहां से ले गई। जहाँ प्रदर्शनी लगी थी ,उन लोगों से कहा - उसे शीघ्र कहीं जाना है,उसके पति की तबियत ठीक नहीं है ,कोई पूछे तो... कुछ भी मत बताना।
