पुराने समय में विवाह होते थे, तब लड़की वाले लड़के का घर बार देखते थे और जमीन -जायदाद देखते थे कि लड़का पढ़ा -लिखा है ,या फिर उनके खेती-बाड़ी भी है या नहीं। परिवार में तीन या चार बच्चे होते थे तीन या चार बेटे भी होते थे ,उनमें से एक या दो बाहर नौकरी करने भी निकल जाते थे। उस समय पर कमाई के नाम पर 5,000 से लेकर 8,000 की महीने की कमाई करता था और उसमें भी, उसके माता-पिता, उसके साथ उसकी बहू को भी भेज देते थे। इस आठ से 10,000 की कमाई में वह अपना जीवन यापन करता था और उसकी पत्नी भी उसी बजट में, अपनी गृहस्थी को संभालती थी।
उस समय पति बाहर काम करता और वो घरेलू कार्य करती थी। कई बार घरेलू कार्य करते हुए भी ,घर बैठे ही कमाई का कोई न कोई माध्यम चुन लेती थी, जिससे पति की कमाई में वो उसकी आर्थिक सहायता भी कर देती थी। वह सिलाई भी घर पर ही कर लेती थी। घर की साफ- सफाई से लेकर, हर चीज को क़रीने से सजा कर रखती थी। घर, घर की तरह लगता था ,एक-एक चीज उसके हाथों से निकली हुई होती थी। हालांकि समय के साथ आमदनी बढ़ती थी, किंतु जितनी भी आमदनी होती थी उसी में वो अपना जीवन यापन करते थे और बच्चों को भी पालते और पढ़ाते थे। तब भी दो या तीन बच्चे तो हो ही जाते थे।
आज के समय में, आज भी कुछ लोगों की आमदनी पचास हज़ार से लेकर 60,000 रूपये महीना है। अब आप कहेंगे ! ''ये क्या नई बात है ? आमदनी के साथ -साथ महंगाई भी तो बढ़ी है। ''आपकी बात अपनी जगह सही है ,लेकिन कुछ लोगों की आमदनी 20 से 40 लाख तक का पैकेज भी है।
उम्र भी 30 से 40 की ओर जा रही है लेकिन विवाह करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं ।
घर -परिवार में माता-पिता है, बहन का विवाह हो चुका है। अकेला लड़का उसे 20 से 30 लाख की नौकरी में एक पत्नी को पालना, उसके लिए जैसे'' हाथी को पालने जैसा नजर आता है।'' उम्र के साथ-साथ वह अपना आत्मविश्वास भी खोता जा रहा है। उसे महंगाई से डर लगता है ,खर्चे इतने अधिक लगते हैं कि वह 40 लाख की नौकरी में भी, विवाह करने का साहस जुटा नहीं पा रहा है।
लड़की से पूछता है -कि तुम तीन-चार महीने में नौकरी ढूंढ़ पाओगी या नहीं ,तब तो मैं मैनेज कर लूंगा लेकिन यदि तुम्हें ज्यादा समय तक नौकरी नहीं मिली तब मेरा बज़ट हिल जायेगा। ये कथन -एक ऐसे लड़के का है ,जो 48 लाख ले रहा है ,पिता की पेंशन आती है और दो दुकानें भी हैं।
अब इसे क्या कहेंगे ? एक इंसान जो 20 लाख का पैकेज ले रहा है, वह एक लड़की को जो कि उसकी पत्नी बनने वाली है ,उसका जीवन यापन करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। जब इतना कमाते हैं ,तो उन्हें लड़की भी कमाने वाली चाहिए ,खर्चे तो इन लोगों ने अपने आप ही बढाए हैं।
पहले महिलाऐं'' ब्यूटी पार्लर '' नहीं जाती थी,कभी विशेष मौकों पर या फिर अपने विवाह पर पॉर्लर वाली घर पर ही आ जाती थी। आज पांच -पांच हज़ार' ब्यूटी पार्लर' में लग जाते हैं। पहले समय में कपड़ों की सिलाई करवाने के लिए दर्जी के यहाँ नहीं जाती थीं, या तो स्वयं सिलती थीं या मौहल्ले में ही किसी महिला से सस्ते में ही सिलवा लेती थीं।
आजकल तो रेडीमेड कपड़े लेती हैं ,वो भी डिजाइनर जो बज़ट बिगाड़ दे और उसकी फिटिंग के लिए भी दर्जी के लेकर जाती हैं। खर्चे इतने बढा लिए हैं। रहन-सहन उच्च स्तर का बनाने के चक्कर में महंगी से महंगी गाड़ी ले रहे हैं ,फिर चाहे उसे घर में खड़ी करने की जगह ही न हो।
अब तो फ्लैट चल रहे हैं ,जिनमें चार आदमियों के रहने की जगह होती है ,जिनमें न छत है ,न ही अपनी जमीन !और गाड़ी धूप में ,बरसात में बाहर खड़ी रहती है। लाखों का परिश्रम से इकट्ठा किया पैसा उस बरसात और धूप को झेल रहा है। तब भी और कमाने की ललक जाती नहीं,और महंगी गाड़ी घर से बाहर खड़ी करने का मोह छूटता नहीं। लोगों ने अपनी सुविधाएँ बढ़ाई हैं ,तो उसी आधार पर कमाई है। फिर डर कैसा ?
किन्तु आजकल की पीढ़ी विवाह करने का साहस खो चुकी है ,आत्मविश्वास उम्र के साथ-साथ घटता जा रहा है। एक लड़का जो 20 लाख का पैकेज ले रहा है, वह अपने नाम से 5 या दस साल की नौकरी में अपने नाम से एक फ्लैट तक नहीं खरीद पा रहा है, उसकी शादी होना तो दूर की बात है,इस सबका क्या कारण रहा है ?क्या कभी इस बात पर गौर किया गया है ?
अब थोड़े बहुत तो माता-पिता भी स्वार्थी तो हो ही गए हैं। पहले माता-पिता बच्चों को पढ़ाते थे और स्वयं गांव में रहकर खेती-बाड़ी पर ध्यान देते थे। बच्चों की सहायता ही कर देते थे ,किंतु आज माता-पिता बच्चों के साथ हैं, खेती-बाड़ी बेच चुके हैं। उसे पढ़ाया है ,या यूँ कहें उसे पढ़ाया ही इसीलिए गया है कि बुढ़ापे का सहारा बने। इतना स्वार्थ तो हर माता -पिता का अपने बच्चे से जुड़ा रहता ही है। और यह बच्चे का कर्त्तव्य भी बन जाता है कि अकेला लड़का होने के कारण, माता-पिता की जिम्मेदारी भी उसी पर है। जिनकी पेंशन आ रही है ,वो अकड़ के साथ घर में रहते हैं ,उनमें भी यह भावना समाप्त हो जाती है कि परिवार मिलजुलकर ही चलते हैं।
क्या माता-पिता बजट में रहकर, तरीके से बच्चे को कम बज़ट में रहना सीखा पा रहे हैं ? स्वयं उनकी आकांक्षाएं उस अकेले पुत्र जुड़ जाती हैं। सारी ज़िंदगी परिश्रम किया ,अब क्या आराम की ज़िंदगी भी न बिता सकें ,तो ऐसी औलाद से क्या लाभ ? बच्चों की उम्र के साथ,माता -पिता की उम्र और बीमारियां भी तो बढ़ रहीं हैं। समय रहते बेटे का विवाह न हुआ ,ऐसे में यही बच्चा यदि शहर से बाहर है ,वो क्या करेगा ?अपने विवाह की सोचे। माता -पिता की सेवा, उनके लिए नर्स रखे ,या फिर बच्चे पैदा करे ,जिनके कारण बजट का बढ़ना स्वाभाविक है।
उनकी उम्र अब बढ़ने लगी है , बच्चे पर अपना अधिकार नहीं जता पा रहे हैं ,उसकी इच्छा पर सब छोड़ देते हैं। अकेला बच्चा आत्मविश्वास खोता जा रहा है, अब उम्र भी ऐसी नहीं रही कि आकर्षण बढ़े ,समझदारी आ जाती है और अब तो हाथ में पैसा होना चाहिए ,इच्छापूर्ति तो कहीं से भी हो जाती है। माता-पिता को देखे , पत्नी के खर्चों का निर्वहन करें या फिर बच्चे पैदा करें या फिर बच्चों की पढ़ाई के लिए महंगी से महंगी फीस जुटाए। जब यह सब चीजें एक अकेले लड़के पर पड़ती है तो वह अपना आत्मविश्वास खो देता है और वह विवाह करने से इनकार करता है या फिर घर में तनाव का वातावरण बन जाता है।
सभी को अकेली संतान चाहिए और अकेली संतान पर कितना बोझ पड़ जाता है ? उम्र बढ़ती जा रही है पैकेज भी बढ़ रहे हैं, किंतु विवाह नहीं हो रहे हैं क्योंकि पत्नी को पालने के लिए ''जिगरा चाहिए'' हिम्मत चाहिए और या फिर पत्नी उसके साथ बराबर कमाने वाली हो। दूसरे घर की बेटी कैसी होगी ?उसे समझना चाहते हैं। न जाने, उसको समझने में कितने दिन ,महीने या फिर वर्ष लग जाएँ।
कभी सोचा है ,हमारे चाचा ,ताऊ ,पिता ने क्या विवाह नहीं किये थे ,उन्होंने उन महिलाओं को समझने के लिए कितना वक़्त माँगा था ? क्या कभी अकेले में उनसे मिलते थे ?माता -पिता ने जहाँ रिश्ता तय कर दिया, वहीं बस गए। जगह -जगह मुँह नहीं मारा, किसी हीरोइन जैसी लड़की की इच्छा नहीं की। स्वयं की जैसी इच्छा रही अपनी पत्नी को उसी रूप में ढाल लिया ,बजट के अनुसार अपने रहने -सहने का स्तर बढ़ा लिया। थोड़ी परेशानी होती भी तो दोनों मिलकर सामना करते और समय के साथ एक -दूसरे को समझते -बूझते समय कट जाता और गृहस्थी के अनुभव सुनहरी यादों में समाते।
अब तो हालात यह है ,दोनों ही एक -दूसरे में कमियां खोजने में समय बिताते ,किसी की कोई कमी मिल जाती तो सुलझाते नहीं ,लड़ते ,बात तलाक तक पहुंच जाती। सबका अहम बड़ा है ,अब तो लड़की भी कमा रही है ,किसी के बाप की नौकर थोड़े ही है ,जो किसी से दबेगी। अब जमीनें नहीं रहीं ,अब बेटे की कमाई से एक- दो प्लॉट या फ्लैट ले रहे हैं। उनके ही कारण अहंकार आसमान छू रहा है।
पहले किसान की कई -कई बीघा जमीन पर भी उन्होंने अहंकार नहीं दिखाया ,वो उनका रोज़ी -रोटी का साधन रहा। बच्चों की सम्पत्ति समझ उसमें परिश्रम करते रहे
अब गृहस्थ जीवन की नींव रखी जाती है ?जिसमें कि लड़की अपने मायके से भी महंगे से महंगा सामान लाती है। आज के समय में एक मिट्टी भी मोल की है ,गहने ,आभूषण अब लड़कियां कम ही पहनती हैं, लोगों के शौक ही इतने बढ़ गए हैं। विवाह में जो आभूषण चढ़ाने का चलन रहा है ,उससे भी बचते हैं। बेटी के पिता कहते -ससुरालवाले चढ़ाएंगे। ससुराल वाले सोचते ,इतने दिनों से कमा रही है ,वही लाएगी।
कम बजट में अधिक से अधिक कार्य करना नहीं चाहते ,अब लड़कियां भी घर -परिवार में रहकर बड़ों की सेवा करना या फिर गृहस्थ जीवन में अपना भोजन स्वयं बनाना, अपनी गृहस्थी को संभालना सब नौकरों के हाथ छोड़ दिया है। अब वो भी कोई बच्ची नहीं रही है ,जो नौकरी करती हैं उनका तो बनता है कि वह नौकरी कर रही है ,दोहरी जिंदगी कैसे जिएंगे ?किंतु कुछ तो नौकरी भी नहीं करती हैं और अपने उच्च स्तर का बनाने के लिए ,होड़ करने लगी हैं। बर्तन मांजने वाली ,पोछा -झाड़ू वाली,खाना बनाने वाली अलग होती है। महंगे से महंगे होटल में खाना खाना है। महंगे से महंगे स्कूल में बच्चों को डालना है।कमाते -कमाते चाहे कमर झुक जाये ,आँखों पर चश्मा चढ़ जाये या फिर सिर पर बाल दिखाई न दें।
हम जीना चाहते हैं ,अपने लिए नहीं ,आधुनिक कहलाने के लिए ,महंगे फ़्रिज ,गाड़ी ,या फिर महंगे और ब्रांडेड सामानों के लिए ,उस फ्लैट में रहकर अपने को अफ़लातून समझ बैठते हैं। न ही रिश्तों का लिहाज़ ,न ही जीवन में कोई मर्यादा ,न ही कोई रिश्ता अपना नज़र आता है। न जाने कब अपने लिए जियेंगे ?
क्या कभी किसी ने सोचा है ऐसा क्यों हो रहा है क्यों यह पीढ़ी परेशान है ? क्योंकि दिखावटी जीवन का बोलबाला है ? लोग सरल नहीं रहे ,सरल जीवन जीना ही नहीं चाहते ,जो हैं ,उन्हें तो अपने स्तर का ही नहीं समझते। हर रिश्ता व्यापार बन गया है। भावनाएं हैं ,अपने लिए ,अकेले में रोते हैं ,अपने लिए।
यही सब देखते हुए तो लगता है ,आज के लड़के -लड़कियों के विवाह में देरी क्यों हो रही हैं ?क्योकिं गृहस्थ जीवन को निभाने के लिए ' ज़िगर चाहिए। ''लड़का इतनी महंगाई में अपने बिखरते आत्मविश्वास को सम्भाल सके और लड़की दोहरी ज़िंदगी जी सके। गृहस्थ जीवन भी आसान नहीं ,कुछ त्याग करने पड़ते हैं ,सहनशीलता और धैर्य चाहिए। जो आज लुप्त से होते नजर आ रहे हैं।
