Khoobsurat [part 140 ]

कल्याणी जी को झूठ बोलकर यहाँ लाने की योजना सफल रही ,एक से एक धमाके हो रहे थे। जो केस बरसों से पड़ा अधूरा पड़ा था। आज परत दर परत उसके रहस्य सामने आ रहे थे। आज कल्याणी जी ने आखिरकार स्वीकार कर ही लिया, उन्होंने ही, अपनी बेटी को अपनी कोठी छुपा लिया था।

उनकी बातें सुनकर चांदनी को आश्चर्य होता है ,ये महिला कितनी चालाक है ? हमारी'' नाक के नीचे रहकर ''कांड पर कांड किये जा रही थी और हमें नाकारा साबित करने पर तुली थी। तब बोली -  तभी तो हम कहें ! एयरपोर्ट पर, बस अड्डे पर , कहीं भी आपकी बेटी का पता क्यों नहीं चल रहा था ?''बगल में छोरा और गांव में ढिंढोरा। ''


कल्याणी जी बयानों की रिकार्डिंग हो रही थी। साथ ही इंस्पेक्टर तेवतिया और कुणाल उनकी कहानी सुनकर हैरत में पड़ गए थे। उन्हें भी आश्चर्य हो रहा था,' ये महिला इतनी ''छुपी रुस्तम निकलेगी। ''किसी को भी अंदाज़ा नहीं था। 

तभी हम सोचें - आखिर शिल्पा कहाँ गयी ?''उसे धरती निगल गई या फिर आसमान निगल गया।'' हमें क्या मालूम था ?हत्यारे को तो कल्याणी ने, अपने घर में ही छुपा रखा है बल्कि शिल्पा क़ातिल नहीं, वह तो चश्मदीद  गवाह है ,कातिल तो ये स्वयं थी।

 इंस्पेक्टर साहब ! अब तो आगे की कहानी चाय पीते हुए सुनेंगे !चलिए आपका केस तो लगभग पूरा हुआ ही समझो ! इंस्पेक्टर कुणाल ने कहा। 

कृपाराम !जाओ !जरा चार चाय ले आओ ! इंस्पेक्टर साहब की दावत होनी चाहिए ,आखिर इन्होंने हमारे केस में इतनी सहायता जो की है। न ही ये कल्पित को वहां भेजते और न ही कल्याणी देवी हमारे चंगुल में फंसती। 

अच्छा कल्पित ये तो बताओ ! रोहिणी ने कुछ बताया या नहीं ....

उसी ने तो बहुत कुछ बताया ,तभी तो हमने कल्याणी जी पर हाथ डाला ,वरना उनको, उनके बिल से निकलना आसान नहीं था। 

कुछ देर पश्चात दो चाय इंस्पेक्टर चांदनी के पास भी पहुंच गयी ,उन्होंने और उनकी सहयोगी ने बाहर आकर चाय पी और वापस आकर पूछा -जब तुम्हारी बेटी, तुम्हारी कोठी में थी ,तब वो विदेश कैसे पहुंच गयी ? उसकी सुंदरता कैसे बढ़ी ? तुम्हारी वो लंदन वाली फुफेरी बहन 'कीर्ति' का उसमें कितना  हाथ है ?क्या वो ये सब जानती है ?

 बताती हूं - थोड़ा पानी तो पिलवा दीजिये ! 

अब पानी पियेंगी ,आपने तो न जाने कितनों को पानी पिलवा दिया  ? कहते हुए चांदनी ,उसकी तरफ गिलास बढ़ाती है। 

कुछ दिनों तक  रिश्तेदार आये ,उनके सामने जवान बेटी के खो जाने का ग़म और दामाद के चले जाने का दर्द बताकर लोगों से सहानुभूति बटोरती रही। उनके सामने रोने का नाटक किया, रंजन की मौत का अफसोस किया। 

और फिर अपनी बेटी को लेकर,आप , किसी ऐसे स्थान पर गईं , जहां पर' प्लास्टिक सर्जरी' हो सकती है और अपनी बुआ की बहन को विदेश से भारत में बुलाया, जिससे लोगों को लगे कि वो  यहां पर अफसोस करने आई हैं  और तब आपने उसे एक दुख भरी दास्तां सुनाई ,क्यों ? मैं सच कह रही हूँ न... 

उन्हें क्या कहानी सुनाई ,हमें भी सुना दीजिये ! 

कुछ देर कल्याणी जी ,शांत रहीं ,उन्हें ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वो इस तरह फंस भी सकती हैं ,रोहिणी न जाने कहाँ होगी ? घर पहुंची होगी या नहीं, सोच रहीं थीं ,उसे पता चलेगा तो तुरंत ही अपने वकील से बात करेगी। 

क्या सोच रही हो ? चुपचाप आगे की कहानी भी आराम से सुना दो !वरना ये डंडा उगलवायेगा ,अब तो चांदनी का रवैया उनके प्रति और भी रुखा हो गया था। 

मैंने उससे कहा -मेरी बेटी ,बेचारी की ज़िंदगी ही उजड़ गयी ,बहुत परेशान थी। उसका पति उसे बहुत परेशान करता था। चरित्रहीन था ,मेरी बेटी सुंदर न होने के कारण, ये सब झेल रही थी। मैंने  उन्हें अलग रहने के लिए जगह भी दी और वहां पर न जाने कौन? उसकी हत्या करके चला गया। इसका जीवन तो जैसे बर्बाद ही हो गया है ,अब इस 'बद्सूरत बेवा' से कौन विवाह करेगा ?

मेरी परेशानी सुनकर उन्हें मेरी बेटी से सहानुभूति हुई तब वो बोली - तू ,परेशान मत हो ,मैं इसी चीज की डॉक्टर हूँ ,मुझे कोई क्लिनिक मिल जायेगा तो मैं इसे नया रूप  दे सकती हूँ।  ताकि यह  अपने बाकी बचे जीवन को, सुकून से बिता सके ! 

तब मैंने अपनी जानने वाली डॉक्टर से बात की और उससे सहायता मांगी ,पैसा सब कुछ सरल कर देता है और कीर्ति  मेरी बेटी शिल्पा को,एक  नया रूप देकर चली गयी। 

शिल्पा के उस नए रूप का नाम हमने' यामिनी 'रखा। अब कोई पहचान नहीं सकता था और  यामिनी नाम बदलकर उसे विदेश में अपनी बहन के पास ही भेज दिया। क्यों सही कह रही हूं ? न....चांदनी ने पूछा  

यामिनी कुछ दिन तो चुप रही क्योंकि वह अभी भी उसी सदमे में थी। रंजन से उसे इतना लगाव भी नहीं था, किंतु उसने, उसे खून से लथपथ तड़पते तो  देखा ही था। वहां उसकी दवाइयां चलीं ,अब तक वो कीर्ति के घर ही रह रही थी।  धीरे-धीरे वह अपने को उस हादसे को भूलने लगी और फिर से अपने जीवन में लौटने लगी।

 लंदन में सबकुछ अलग था ,वहां के लोग ,पहनावा ! तब वो अपना जीवन जीने के लिए फिर से चित्रकारी करने में जुट गयी किन्तु लाल रंग को देखकर फिर भी उसके हाथ काँपने लगते। उससे बातचीत के लिए मेरा अलग नंबर था। वैसे मैंने उससे  ज्यादा बात नहीं की ,मुझे मालूम था पुलिस हत्यारे का पता लगाने के लिए हमारे फोन भी खंगालेगी इसीलिए बेटी के जीवन के लिए मैंने उससे कम ही सम्पर्क रखा। 

हमने आपके नौकरों से भी बातचीत की किन्तु उनमें से किसी को इस बात की भनक तक नहीं थी कि आपकी बेटी ,आपके साथ ही है ,ऐसा तुमने कैसे किया ?

जब ये हादसा हुआ ,सभी अपनी परेशानियों में थे किसी का ध्यान इस और नहीं गया। मैं तो अपनी बेटी के साथ रात्रि में ही लौट आई थी किन्तु उस समय मैं अकेली थी मेरे साथ शिल्पा नहीं थी तो गार्ड को  कैसे पता चलता ? शिल्पा कोठी में ही  है। 

तब वो अंदर कैसे आई ?

 हमारे बग़ीचे में भी एक दरवाज़ा है जो अधिकतर बंद ही रहता है। बस उसके लिए खोल दिया और वो वहां से सीधे गोदाम में ही दाख़िल हुई। घरेलू नौकर भी, मेरी बिना आज्ञा के इधर -उधर नहीं जा सकते इसलिए बेटी को एक सप्ताह छुपाकर रखना कोई मुश्किल काम नहीं था। वो डरी हुई भी थी। तब उसे मैंने नींद की दवाई खिलाई और वो ज़्यादा समय सोती ही रही। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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