तब चांदनी पूछती है - हमने तो सुना है - रंजन ने, ये रिश्ता सहर्ष स्वीकार भी किया और निबाहने का प्रयास भी किया किन्तु आपकी बेटी किराये के घर में नहीं, अपनी कोठी में रहना चाहती थी। रंजन को उसकी कमियों का एहसास कराती थी। कभी उसे सुकून से दो रोटी भी बनाकर नहीं खिलाईं ,जैसे हर पत्नी अपने पति के लिए करती और सोचती है।
हर इंसान, एक जैसा नहीं होता ,मैं मानती हूँ ,नित्या एक पारिवारिक लड़की रही है ,उसे घर का काम करना अच्छा लगता है किन्तु मेरी बेटी ,कारोबार और पेंटिंग्स में अपना समय बिताती थी।ऐसे कामों के लिए नौकर किसलिए थे ?
एक माँ होने के नाते आपको, अपनी बेटी को समझाना चाहिए था कि उसका पति क्या चाहता है ? ऐसी बनने का प्रयास करे।
ये क्या बात हुई ?उसकी इच्छा के लिए क्या वो अपनी इच्छाएं मार देती ?
इच्छाएं मारने के लिए नहीं कह रही हूँ ,थोड़े दिनों के लिए रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए कह रही हूँ। ,ताकि रंजन भी उसे समझ सकता और फिर उसकी भावनाओं की इज्ज़त करता।
वो इज्ज़त कैसे करता ? जब उसके दिमाग़ में तो नित्या छाई हुई थी , ऐसे इंसान को कुछ नहीं सूझता ,झुंझलाकर कल्याणी जी ने जबाब दिया।
ख़ैर ! ये समझाना मेरा कार्य नहीं है ,मुझे तो ये बताओ !रंजन कैसे मरा ?उसका क्या कारण रहा ? क्या नित्या और रंजन के अवैध संबंध बढ़ रहे थे ?यदि ऐसा था ,तो ये सज़ा रंजन को ही क्यों ? तुम्हारी भतीजी भी तो शामिल थी।
आप गलत सोच रहीं हैं ,नित्या समाज की ऊंच -नीच , रिश्तों की मर्यादा सब समझती है। वो समझती थी - कि यह मेरी बहन का पति है, वह अपने परिवार में खुश थी किंतु रंजन ही उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहा था और इधर मेरी बेटी परेशान थी इसीलिए दोनों को एकांत में रहने के लिए, उस कोठी में भेजा था ताकि वहां के बदले वातावरण में दोनों में फिर से प्यार जग उठे ।
जो पहले से ही नहीं था ,कहकर चांदनी मुस्कुराई। तब क्या ये सब, आपकी योजना के अनुरूप हुआ ?
नहीं, एक दिन दोनों में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ ,मैं इस झगड़े को निपटाने के लिए , उस कोठी में गई थी , रात्रि में वहीं रह गयी ,ताकि दोनों को समझा सकूँ। मैं उन दोनों को देखना चाहती थी आखिर ये सारा दिन क्या करते हैं, इनके लड़ने का कारण क्या है ?
तब मैंने रंजन को समझाना चाहा - देखो ! अब तक जो कुछ हो चुका उसे भूल जाओ ! मैंने स्पष्ट रूप से कहा -तुम सोच रहे होंगे कि मैं कुछ नहीं जानती ,ये तुम्हारी गलतफ़हमी है। मुझे तुम्हारी पल पल की खबर रहती है।
नित्या इसकी बहन है और वह अपने पति के साथ खुश है। किसी दूसरे के कारण तुम लोग क्यों अपनी गृहस्थी उजाड़ना चाहते हो ? अपनी इस छोटी सी दुनिया में खुश रहो !इसीलिए तो तुम्हें यहाँ भेजा है ताकि एक -दूसरे को समझ सको !
आपकी बेटी की कौन सी इच्छा पूरी नहीं कर रहा हूँ ? मैं !
उसने तुरंत ही मुझसे प्रश्न किया ,इसके कारण नौकरी गंवा दी , इसके कारण 'घर जमाई' बनकर रह रहा हूँ और ये मुझसे क्या चाहती है ?
मैं मानती हूँ ,तुमने इसके लिए ये सब किया किन्तु वो प्यार और अपनापन नहीं दिया, जिसके लिए ये तड़प रही है। वो चाहती है ,तुम उसकी परवाह करो ! जैसे वो तुम्हारे लिए सोचती है , उसी अपनेपन और प्यार की उम्मीद तुमसे करती है।
तब उसने मुझे उलाहना दिया- आपकी बेटी से मैं जो उम्मीद लगाता था, क्या उसने मेरी भावनाओं को समझा ? मैं क्या चाहता हूँ ? वह सारे कार्य तो नित्या अपने पति के साथ करती है। इसने कभी मुझे अपना पति नहीं एक खिलौना समझा। इसको जब चाहे ,उसमें चाबी भरे और खेले और फिर उसे कोने में बिठाकर रख दे ! ऐसा पति चाहिए।
अब मैं क्या कर सकती थी ? मेरी बेटी की परवरिश ही ऐसी हुई थी। रात्रि का समय था, भोजन करके हम बेटी के चित्रकारी के कमरे में ही थे ,वहीं पर बातें कर रहे थे, मेरी बेटी चित्रकारी का आनंद ले रही थी । बातें करते-करते , मैंने रंजन से कहा -अब तुम अपनी जिंदगी में आगे बढ़ो ! और नित्या का पीछा छोड़ दो !
वो कभी भी तुम्हारी नहीं होने वाली है। शिल्पा जो कुछ भी तुम्हारे लिए कर रही है ,अपने परिवार के लिए ही तो कर रही है।
रंजन ने मुझ पर एहसान दिखाया, यह तो भला मानो-' कि मैंने, आपकी बेटी को स्वीकार किया, वह भी नित्या के कारण , ताकि मैं नित्या के करीब रह सकूं ,कहकर हंसने लगा -क्या मेरी अपनी कोई सोच नहीं होनी चाहिए ,ना ही मेरा अपना कोई अस्तित्व हो। बस आपकी इस' कुरुपा 'के पीछे मेरी जिंदगी नरक बन ही गई है। इस जीवन में अहंकार और स्वार्थ के सिवा आपने,इसे कुछ और सिखाया भी है गुस्से से रंजन बोला।
मैं तो उन लोगों को समझाने गई थी ,रंजन की बातें सुनकर लगा ,मेरे समझाने पर भी इस पर कोई असर नहीं हुआ। इसकी बातों से लगता है ,इसे मेरी बेटी से ही नहीं वरन इसकी नजरों में हमारा भी सम्मान नहीं है। मेरे मन में यही सब चल रहा था। मुझे, वो, हम सबके ऊपर हँसता हुआ महसूस हो रहा था।
मुझे अचानक उस पर बहुत तेज गुस्सा आ गया और तब मैंने अपनी बेटी का रंग भरने वाला 'नाइफ 'उठाकर पूरी ताकत से उसकी गर्दन पर खींच कर मारा क्योंकि मुझे लग रहा था यह मेरे समझाने पर भी नहीं समझ रहा है ,मेरी बेटी को क्या समझेगा ?इसे तो जैसे अब रिश्तों और उम्र का लिहाज़ ही नहीं रहा।
उसकी रक्त से भरी गर्दन देखकर, तभी मेरी बेटी की चीख निकली, मैं भी जैसे होश में आई, मैंने अपनी बेटी को शांत रहने के लिए कहा। उस समय मैं भी उसका रक्त देखकर घबरा गई थी।
शिल्पा ने डॉक्टर को बुलाने के लिए कहा ,किंतु मैंने उससे पूछा -यदि डॉक्टर पूछेगा, कि इसे क्या हुआ है उसको यह सब पता चलेगा तो हो सकता है, वह पुलिस में खबर कर दें !
हम बचेंगे नहीं जो हम बताएंगे पुलिस उस पर विश्वास भी नहीं करेगी।
आओ ! पहले हम घर चलते हैं , और वहां जाकर तुम्हारे पापा से मिलकर बात करते हैं और सोचते हैं कि क्या करना है ? और कुछ देर पश्चात मैं अपनी बेटी को लेकर वहां से निकल गई।
कल्याणी जी की बातें सुनकर चांदनी ने एक गहरी स्वांस ली और बोली -हम आपकी बेटी को इधर-उधर घूम रहे थे , तब आप अपनी बेटी को लेकर कहां गई थीं ? कठोरता से, चांदनी ने प्रश्न किया ?
मैं अपनी बेटी को लेकर कोठी पर ही गई थी, मुझे लग रहा था कि, रंजन नहीं सुधरेगा मैंने अपनी बेटी से तो कहा कि इसे डॉक्टर को दिखाएंगे लेकिन मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया, क्योंकि हम कोई भी कदम उठाते ,पुलिस हम पर विश्वास नहीं करती।
अधिक रक्त बह जाने के कारण रंजन की मौत हो गयी। मैंने अपनी बेटी को कोठी के अंदर पिछले दरवाजे से प्रवेश कराया, जहां पर हमारा कोई नौकर नहीं जाता और उसको वहीं गोदाम में रखा ,जहां उसकी अपनी पेंटिंग्स हैं और ऐसा दिखलाया जैसे हमें कुछ मालूम ही नहीं है
अपनी बेटी का अपहरण तो आपने ही कर लिया था, बीच में ही बात काटते हुए , चांदनी ने कहा।
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