खामोश रहना है तो, इन दीवारों से सीखिए !
ये सब कुछ देखती है, सुनती हैं, किंतु खामोश रहती हैं।
लोग कहते हैं -''दीवारों के भी कान होते हैं।''
इनका धैर्य तो देखिए !देख- सुनकर भी खामोश रहती हैं।
किसी मासूम दिल ने, नाजुक से हाथों ने,
उस पर कुछ उकेरा था , याद कर उन लम्हों को मुस्कुराती हैं।
उन आड़ी -तिरछी आकृतियों को देख, झिलमिलाती हैं।
चुगली नहीं करतीं , ख़ामोश रह, बहुत कुछ कह जाती है।
किसी की यादों को दिल में संजो ,उम्मीदों के चिराग़ जलाती हैं।
कभी किसी के जन्मदिन पर, गुब्बारों और फूलों से सज जाती है।
किसी माला पड़ी तस्वीर को, अपने सीने से लगा लेती है।
टांग लेती है ,उन यादों को.....खुशियों के पलों को संजो लेती हैं।
कभी किसी बड़े -बुजुर्ग की उंगलियों का सहारा बन,
उनके स्पर्श की वो ठंडक सीने में उतार लेती हैं ।
कभी खुशियों के मौके पर, मेहंदी की थाप से सज जाती हैं ।
सभी सुख -दुःख अपने समझ, सहन कर ख़ामोश रह जाती हैं।
कभी किसी के प्रथम मिलन को अपनी आंखों से देख,
शर्म का पर्दा गिराती हैं ,देख -सुन सब ख़ामोश रह जाती हैं।
किसी से कुछ कहती नहीं, सब अपने में समा लेती हैं ।
वह घर उसमें बसता है ,वो घर के अंदर बसती हैं ।
सहन कर सब , घर की सुरक्षा में मजबूत रहती हैं ।
बाहर से कोई भीतर न आये ,भीतर की बात बाहर न जाये।
पोली नहीं ,सुदृढ़ रहती हैं।सुनती हैं ,सबकुछ ख़ामोश रहती हैं।
घर के सुख-दुख में शामिल होकर भी कुछ न कहती हैं।
कुछ ना कह कर भी , दीवारों बहुत कुछ कह जाती हैं ।
कभी-कभी लगता,सजधज कर दीवारें बोल उठती हैं।
एक जीवन के जाते ही ,' खामोश' हो जाती हैं।
अगले ही पल किलकारियों की गूंज से गूंज उठती हैं।
उम्र के इक पड़ाव पर इतिहास बन ,जर्जर सी दीवारें ,
ख़ामोश रहकर भी , बहुत कुछ कहना चाहती हैं।
वो नन्हीं हंसी ,वो स्पर्श ,रातभर सुनी थी जो प्रेमभरी बातें !
न जाने कितनी बीती ? करवट भरी यादें ,जर्जर काया ,
कैसी थी ,इस घर की माया ,ख़ामोश दीवारें सब जानती हैं।
इनके सीने से लग कभी , बहुत कुछ सोचा था ,
खिड़कियों में झाँकते यहाँ न जाने कितना वक्त बीता था ?
ये सब जानती हैं , न जाने ये दीवारें, क्यूँ ख़ामोश रहती हैं ?
समय आज करवट लेता है, दिल की बात क्यूँ न कहती हैं ?
