Zeenat [part 17]

मिसेज गुप्ता आगे बोलीं  -तुम्हें यकीन नहीं होगा, वह तो इसका[संजय खन्ना ] इतना साहस नहीं होता, वरना यह पड़ोसियों को भी ना छोड़े ! यह किटी पार्टी में भी औरतों पर नजर रखता है। कोई जरूरतमंद हो, उसका पूरा-पूरा लाभ उठाता है। तुम जानती नहीं हो ,कीर्ति की मम्मी के साथ क्या हुआ ?

कौन कीर्ति ? सोचने का प्रयास करते हुए भूमि ने पूछा। 

कैसे पता चलेगा ? जब घर से बाहर निकलती ही नहीं हो ,उनकी बेटी कीर्ति हमारे बच्चो से एक क्लास आगे है ,बेचारी बच्ची अच्छी थी । 


क्या उसका भी कोई किस्सा है ?अब इन किस्सों को सुनकर भूमि बोरियत महसूस कर रही थी किन्तु जिज्ञासु प्रवृति होने के कारण जानना भी चाहती थी, कि उनके साथ क्या हुआ ?

मिसेज गुप्ता भी ,इतनी देर से बोले जा रहीं थीं ,शायद थक चुकी थीं ,तब गहरी स्वांस लेते हुए बोलीं - होना क्या है ?उनका अपना मकान तो था नहीं , किराये के मकान में रहती थीं। 

तो क्या हुआ ?बहुत से लोग रहते हैं, उनके पति तो अच्छा कमाते थे। 

हाँ ,किन्तु नौकरी सरकारी तो थी ,नहीं ,न जाने उन्होंने क्या किया ? या उन लोगों को सक्सैना जी का काम पसंद नहीं आया और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। 

फिर क्या हुआ ? उन्होंने कोई और नौकरी नहीं की। 

वो तो कहते थे -उनका मन अब इन नौकरियों से हट ही गया है ,इतने परिश्रम के पश्चात भी, क्या परिणाम निकला ?बिना नोटिस दिए नौकरी से निकाल बाहर कर दिया।

हाँ ,ये तो है ,जब आदमी इतना परिश्रम करे और उसका परिणाम अनुकूल नहीं मिलता तब दुःख होना तो  स्वाभाविक है। 

 गलती उसके पापा की नहीं ,कीर्ति की मम्मी की थी। 

वो कैसे ?

सक्सैना जी का, बाज़ार का काम था ,कम्पनी से माल लेकर दुकानदारों को दिखाना और ऑर्डर लेना था किन्तु कम्पनी द्वारा ,जो भी सामान दुकानदारों को उपहार में देने के लिए दिया जाता था,उनकी पत्नी उन उपहारों को या तो घर में प्रयोग करती ,या फिर बेच देती थी। वो अपने को बड़ी समझदार समझ रही थी लेकिन एक बार एक दुकानदार ने उनकी शिकायत कम्पनी में कर दी। उन्होंने जाँच बैठाई और सक्सैना जी दोषी पाए गए और उन्हें नौकरी से'' हाथ धोने पड़े। ''

ये तो गलत हुआ ,थोड़े से लालच में जीवनभर का कलंक लग गया। अब आप समझीं, मैं इसीलिए बाहर नहीं निकलती ,''दुनिया में कितना ग़म है ?मेरा ग़म क्या किसी से कम है ? देखकर जो और ग़म ओटने चलूँ। ''जिसको भी देखो !जहाँ भी देखो !वही परेशां मिलेगा। 

अब ये तो जीवन है ,जीवन जीना है तो ये सब भी देखना और सहन करना ही होगा ,हम हालातों से भाग तो नहीं सकते। ''

भाग नहीं सकते किन्तु बचाव तो कर सकते हैं ,न ही देखेंगे ,न ही पता चलेगा। 

इस तरह स्वार्थी नहीं हुआ जाता ,हम किसी की सहायता के लिए बाहर निकलेंगे तो, अपनी सहायता के लिए भी बाहर निकलकर सहायता मांगनी होगी। यदि किसी को हमारी आवश्यकता महसूस हो रही है ,उसे नजरअंदाज करना तो गलत है। कल को तुमने, मुझसे सहायता मांगी तो क्या मैं मुँह मोड़ लूँगी ? 

किन्तु सभी ऐसे नहीं होते। 

भूमि की बात पर जैसे, उन्हें कुछ स्मरण हुआ और वो बोलीं  - तुमने सही कहा ,ऐसे समय में सक्सैना परिवार को भी सहायता की आवश्यकता थी। कुछ दिन तो उन्होंने अपनी जमा -पूंजी से काम चलाया ,अब वो भी समाप्त होने को आई। अब तक जो खन्ना उन्हें भाभी जी !भाभीजी !कहकर बुलाता था। कई बार आपस में एक -दूसरे को रात्रि के खाने पर भी बुलाया गया था किन्तु जैसे ही सक्सैना की नौकरी छूटी, खन्ना का असली रंग दिखने लगा।

उनके घर की परेशानियां देख सुनकर पहले तो बोला -'अपनी बेटी को मेरे यहां काम पर भेज दो ! 'किन्तु उन्होंने कहा -ये अभी पढ़ रही है। ''तब श्रीमती सक्सैना को लगा, ऐसे समय में यही हमारा शुभचिंतक है। इसे, हमसे हमदर्दी है ,और ये हमारे लिए सोचता है ,तब वो बोलीं - मेरे लायक कोई काम होगा तो मुझे बताना।

अजी भाभीजी ! हमारे रहते, आप काम करेंगी ,इसीलिए तो कह रहा था ,बेटी है ,पढ़ाई के साथ -साथ काम भी कर लेगी। 

नहीं ,भाई साहब !अभी उसे पढ़ने जाने देते हैं ,तुम अपने भइया से कहो !कोई काम ढूंढ़ लें इस तरह घर बैठने से काम नहीं चलता। अब तुम समझ ही सकती हो ,उसने किस -किस तरह से उनकी मजबूरियों का लाभ उठाया होगा। 

ये जरूरी तो नहीं ,इसने उनका भी लाभ उठाया हो ,ऐसे क्या इंसानियत बिल्कुल ही मर चुकी है ?लाभ -हानि ,सुख -दुःख तो जीवन में आते ही रहते हैं ,तो क्या आपसदारी भी समाप्त हो जाएगी ? 

यही तो.... कलयुग है ,मैं अपनी तरफ से बात नहीं बना रही हूँ ,कभी तुम सोचो ! मैं तो खन्ना के पीछे ही पड़ गयी, उसी की बुराई कर रही हूँ।  वो तो एक बार सक्सैना की पत्नी ही मुझे मिली थी। उसी ने बताया -'ये बड़ा नीच है ,मौक़ापरस्त है ,बच्चों की फीस के लिए पैसे मांगे थे ,उसी दिन अपने साथ रात को सोने को कह दिया। अच्छा ,अब बहुत देर हो गयी तुम तो अपने काम भी करती जा रही हो, मेरे पतिदेव भी आने ही वाले हैं ,अब फोन रखती हूँ ,कहते हुए उन्होंने विदाई के साथ फोन काट दिया।    

 मिसेज खन्ना से, अक्सर मेरी मुलाकात, किट्टी पार्टियों में, अथवा किसी वैवाहिक कार्यक्रम वगैरह में होती रहती थी। देखने से वो कितनी शांत और शालीन नजर आती हैं किंतु उन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता वह ऐसे पुरुष के साथ, जीवन निर्वाह कर रही हैं जो अपने ही घर में काम करने वाली महिलाओं तक को नहीं छोड़ता। 

आज इस परिवार का एक कड़वा सच ! मेरे सामने आया, जो मन में एक कड़वाहट दे गया।

 मुझे आश्चर्य हो रहा था, क्या ऐसे भी लोग होते हैं ? एक पढ़ी-लिखी सभ्य महिला, संस्कारी, महिला वह इतने अत्याचार सहने के पश्चात भी, उसके साथ कैसे रह सकती है ? उसका व्यवहार कैसे सहन कर सकती है ? अपनी आंखों से गलत होते हुए देखती रहती है और कुछ कह नहीं पाती।कहने को तो अब महिलाओं को बहुत आज़ादी मिली हुई है किन्तु क्या उस आजादी का वो लाभ उठा पाती हैं ,जो सही में हक़दार हैं।' 

महिलाओं की आजादी की बात ' सुनकर ही हंसी आती है। आज की नारी , हवाई जहाज चला रही है, बंदूकें चला रही है, देश को आगे बढ़ाने में अपना अच्छा योगदान दे रही है किंतु जब वह एक पारिवारिक नारी बन  जाती है, तब उसकी शक्ति न जाने, कहां लुप्त हो जाती है ? और उसे सुनने पड़ते हैं, वही सास के ताने , पति का अभद्र व्यवहार , परिवार का सौतेला व्यवहार और न जाने किन परिस्थितियों से जूझती रहती है ?जिन्हें आजादी मिली है ,वे उसका अनुचित लाभ उठाती हैं। 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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