जरूरी नहीं, महफ़िल के चार लोगों में ही, मेरी पहचान हो।
अपने आप को परखने के लिए, क्या' हम ही 'काफी नहीं ?
बहलाने के लिए बज़्म में तो कोई झूठी वाहवाही भी कर देगा।
जब तलक मन को सुकूँ न मिले, वो इबादत भी इबादत नहीं।
माना कि चार लोग मुझे जानते नहीं, साधारण सी दिखने वाली मैं !
अपने आप में सागर हूं, क्या हुआ ?जो मैं महफिलों की शान नहीं।
कोई ना पहचाने मुझे, सब चलता है, पर मुझमें मेरा घर बसता है।
गैरों की परवाह नहीं,पीड़ा होती जब,मेरे अपनों ने ही समझा नहीं।
माना कि,थोड़ा भावुक हूँ, तन से दुर्बल ! मन से हिम्मतवाली हूँ
दिखने में हूं, कमज़ोर ! क्या शक्ति की मेरी तुम्हें पहचान नहीं ?
मां की ममता ,घर के आंगन की खुशियों से ही मेरी पहचान है।
संस्कारी रही , रिश्ते निभाये ,तुमने दोस्त कभी समझा नहीं ?
देखती हूं, सपने !भरती हूं, ऊंची उड़ान ! घर का हूं, 'मैं' सम्मान !
अग्रणी रही, हर क्षेत्र में, फिर भी देखो ! तनिक भी' अभिमान' नहीं।
औरत बन कई रूपों में बटी हूं, मां बहन पत्नी बेटी रूपों में खिलती हूं
लड़ती हूं हर रोज, अपने आप से, अपनों से , मैं कोई साधारण नहीं।
