Abhiman nahi

 जरूरी नहीं, महफ़िल के चार लोगों में ही, मेरी पहचान हो। 

अपने आप को परखने के लिए,  क्या' हम ही 'काफी नहीं ?

बहलाने के लिए बज़्म में तो कोई झूठी वाहवाही भी कर देगा। 

जब तलक मन को सुकूँ न मिले, वो इबादत भी इबादत नहीं। 



माना कि चार लोग मुझे जानते नहीं, साधारण सी दिखने वाली मैं !

अपने आप में सागर हूं, क्या हुआ ?जो मैं महफिलों की शान नहीं। 

कोई ना पहचाने मुझे, सब चलता है, पर मुझमें मेरा घर बसता है।

 गैरों की परवाह नहीं,पीड़ा होती जब,मेरे अपनों ने ही समझा नहीं।

 

माना कि,थोड़ा भावुक हूँ, तन से दुर्बल ! मन से हिम्मतवाली हूँ  

दिखने में हूं, कमज़ोर ! क्या शक्ति की मेरी तुम्हें पहचान नहीं ?

मां की ममता ,घर के आंगन की खुशियों से ही मेरी पहचान है।

 संस्कारी रही , रिश्ते निभाये  ,तुमने दोस्त कभी समझा नहीं ?


देखती हूं, सपने !भरती हूं, ऊंची उड़ान ! घर का हूं, 'मैं' सम्मान !

 अग्रणी रही, हर क्षेत्र में, फिर भी देखो ! तनिक भी' अभिमान' नहीं।

औरत बन कई रूपों में बटी हूं, मां बहन पत्नी बेटी रूपों में खिलती हूं

लड़ती हूं हर रोज, अपने आप से, अपनों से , मैं कोई साधारण नहीं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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