पारुल की बातें सुनकर ,मिसेज गुप्ता को भी आश्चर्य हुआ ,मन ही मन सोच रही थी -अंकल -आंटी लगते तो नहीं ,लालची होंगे।
तब वो आगे बोली - जब से इन्हें लगा था, कि वह संपत्ति मेरी है, तब तक ये लोग ठीक-ठाक रहे और संजय मुझसे बड़े प्यार से कहते -'देखो ! तुम्हारे पापा की अब उम्र हो रही है ,हालांकि वो अपनी संपत्ति को अभी भी संभाल रहे हैं, लेकिन कब तक संभालेंगे ? उनकी भी उम्र है जो संपत्ति बाद में उन्हें तुम्हारे नाम करनी है ,वह पहले ही तुम्हारे नाम हो जाये तो अच्छा है , इसमें क्या बुराई है ?बाद में भी तो हमें ही सम्भालनी है। वो अपनी इच्छा से ही,अपने जीते जी यदि तुम्हारे नाम कर दें, तो कितना अच्छा रहेगा ?मैं भी तो उनके बेटे जैसा ही हूँ ,समय रहते उनसे कुछ सीख़ भी लूंगा और सम्पत्ति को कैसे संभालना है ?देख लूंगा।
यह बात कहने की मेरी हिम्मत नहीं हुई ,पापा से किस मुंह से कहती ? कि वो तो आपके मरने का इंतजार कर रहे हैं या फिर आपके जीते जी आपकी संपत्ति अपने नाम करवा लेना चाहते हैं। मुझे भी,उस समय उनकी बातें उचित ही लग रही थीं किंतु अब मुझे लग रहा है , उनकी नज़र मेरे पिता की सम्पत्ति पर ही थी। फिर मैंने भी सोच लिया था, सही तो कह रहे हैं ,बाद में भी तो ये सब हमें ही संभालना है ,तब समय रहते ही ये सब संभाल लें, तो अच्छा ही होगा।
मम्मी- पापा को भी, मैं यहीं बुला लूंगी और उनका ध्यान रखूंगी। इन्होंने मुझसे ऐसा ही वादा किया था यह परिवार बहुत मीठा है। आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते, कि इन लोगों के मन में क्या चल रहा है ?एक बार को इंसान कड़वे बोल, बोल दे तो उसकी बातों का हमें अवश्य ही, बुरा लगेगा किन्तु हम उसकी कड़वाहट के कारण सजग तो हो जायेंगे ,उसकी मनःस्थिति की हमें जानकारी तो होगी, किन्तु इतनी मिठास..... जो धीरे -धीरे ज़हर का काम करती है, वो तो इंसान को बेकार ही कर देगी।
ये कब की बातें हैं ?
जब मेरा पहला बेटा हुआ था , धीरे-धीरे संजय ने सारी संपत्ति बड़े प्यार से अपने नाम भी करवा ली क्योंकि मुझे समय ही कहाँ था ? कुछ भी सोचने -समझने का .... उनके वंश को जो बढ़ा रही थी। मुझसे कह रहे थे -'जो कुछ भी मेरा है, वही तुम्हारा भी है। 'तुम कहां कोर्ट- कचहरी के चक्कर में पड़ोगी ,क्या उस संपत्ति को देखोगी ? या बच्चों को संभालोगी। तुम मेरी हो, 'मैं' तुम्हारा और यह संपत्ति हम दोनों की है। हमें ही तो मम्मी -पापा का ख्याल रखना है और इस संपत्ति को संभालना है यह सब कहकर वह संपत्ति उन्होंने अपने नाम करवा ली।
मैं भी संजय के प्यार में इतना बहक गई थी कि मैंने अच्छा -बुरा कुछ सोचा ही नहीं, मुझे तो उन पर विश्वास था ,उनसे प्यार जो करने लगी थी। धोखा !ये शब्द हमारे मध्य कैसे आ सकता है ?मैं तो सोच भी नहीं सकती थी और जब संपत्ति उसके नाम हो गई तब उसने अपना'' रंग दिखाना'' आरंभ किया।
मनुष्य के पास कितना भी पैसा आ जाए किंतु उसका चरित्र कभी नहीं बदल सकता, पैसे से 'चरित्र'भी नहीं खरीदा जा सकता है। अब उसके पास ससुराल का भी पैसा है और उसके बाप का भी पैसा है किंतु चरित्र उसने अपने पिता से ही पाया है। वह भी ऐसा ही है ,मिसेज गुप्ता ने बिना डरे स्पष्ट रूप से पारुल से यह सब कहा।
आप इतना सब जानती हैं फिर भी आपने कभी कुछ नहीं कहा, कम से कम मेरे घर वालों को एक बार उनके विषय में पता चल जाता तो वो लोग, फिर यहाँ कभी रिश्ता नहीं करते। पारुल ने, मिसेज गुप्ता से शिकायत भरे लहज़े में कहा।
यह तुम लोगों का आपस का मामला है, तुम्हारे घर का मामला है , मैं इसमें, कैसे दखल अंदाजी कर सकती थी ? किन्तु मैं इतना गहराई से भी,इन लोगों को नहीं समझ पाई ,मेरे साथ तो उन्होंने अच्छे पड़ोसी की तरह ही व्यवहार किया। यह सब तो विवाह करने से पहले आपको, आपके पिता को सोचना चाहिए था या विवाह से पहले आसपास के लोगों से जानकारी लेनी चाहिए थी, कि यह लोग कैसे हैं या लड़का कैसा है ?
हर कोई स्पष्ट वक्ता नहीं होता, और हर व्यक्ति में कुछ ना कुछ कमी होती है। यदि वह आज तुम्हारी कमी बता रहा है, तो कल को, दूसरा भी तुम्हारी कोई कमी बता देगा ,हर इंसान में कमी होती है इसीलिए कोई कुछ कहना या बताना नहीं चाहता।कल को उसका भी नंबर आ सकता है,पापा ने पूछा था ,किसी ने कुछ नहीं बताया।
पहले समय में गांवों में विवाह होते थे, उस व्यक्ति के चरित्र के बारे में, उसके खानदान और परिवार के बारे में पूरा गांव जानता था किंतु तब भी, गांव और परिवार की इज्जत के लिए कोई मुंह नहीं खोलता था। यहां तो सब, एक दूसरे को जानते भी हैं और जानते भी नहीं हैं इसीलिए कोई किसी के विषय में कुछ कहना नहीं चाहता।''पानी में रहकर मगरमच्छ से कोई बैर करना नहीं चाहता। '' अब तुमसे दोस्ती की है तो इसलिए तुम्हें बता रही हूं।
तभी उनका बेटा आकर बोला -मम्मी, चलो ! मैडम ने बुलाया है।
अच्छा आज बहुत देर हो गई, फिर कभी मिलकर बातें करते हैं, वैसे कहने को तो मैं, तुम्हें छोटी बहन भी कह सकती थी किंतु दोस्ती का रिश्ता ही ऐसा होता है ,हम छोटी -बड़ी सभी बातें आपस में एक दूसरे को बिना झिझके बता सकते हैं। तुम परेशान मत हो, मैं तुम्हारे साथ हूं। देखते हैं ,क्या करना है ? कहकर मैं अपने बेटे के साथ उसकी मैडम से मिलने चली गईं।
आपने इतना बड़ा ख़तरा मोल लिया, एक ऐसे आदमी की बीवी से बात की, जो अपनी बीवी की भी नहीं सुनता, जिसको आपने पहले भी, अपनी हरकतों से काफी छकाया है। जब उसको पता चलेगा, कि आप उसकी बीवी को भड़का रही हैं , तब क्या वह आपके विरुद्ध कुछ नहीं बोलेगा , भूमि ने मिसेज गुप्ता से पूछा।
अरे, मैं उसकी नस-नस जानती हूं। वह भी जानता है कि मैं ,उसे अच्छे से जानती हूं। मुझे छेड़ने की हिम्मत नहीं कर सकेगा, जो उसके सामने कमजोर पड़ेगा, उसी पर वह हाथ रखता है वरना मोहल्ले में उसे और उसके व्यवहार को सभी लोग जानते हैं , वह कैसा है ? लेकिन कहते इसलिए नहीं है क्योंकि मोेहल्ले में व्यवहार जो रखना ही पड़ता है।
मुझे आश्चर्य हो रहा था ,इतनी पढ़ी -लिखी अच्छे परिवार की लड़की सब जानते हुए ,आज भी अपने पति के साथ रह रही है ,जो एक नौकरानी से संबंध बनाने से भी नहीं हिचकता ,तब वो उसे अपने क़रीब कैसे आने देती होंगी ? आपने उनके लिए कुछ किया या नहीं।
क्या कर सकती हूँ ? वो भी कितना लड़ेगी ? कितना रोएगी ? या तो पति को छोड़ दे ! तो कहां जाएगी ? दो बच्चों की माँ बन चुकी ,तब उसे होश आया। सब पैसा भी उसे सौंप दिया ,अब तो यहाँ देखने से लगता है। एक कोठी की मालकिन और एक अच्छे ख़ानदान की बहु है। यदि ये खन्ना को छोड़ती है ,अब उसके माता -पिता भी बूढ़े हो चले हैं। इस उम्र जो थोड़े बहुत दिन जिन्दा रहते तो वो दिन भी कम हो जायेगे। छोटा या बड़ा परिवार होने से कुछ नहीं होता, बाहर से जो शालीन और सभ्य नजर आते हैं, अंदर से ही, उतने ही खोखले, बदबूदार और क्रूर नजर आते हैं , उनके चेहरे बड़े भयानक होते हैं।
