अपने पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर, गर्वित हवेली पहुंच जाता है और रोता है, अपने आप को कोसता है और कहता है -''मैं कितना बदनसीब हूं ? अंत समय में भी, अपने पिता और अपने भाई के साथ नहीं था। कुछ देर पश्चात सुमित भी आ जाता है किंतु सुमित के साथ रूही की बहन और उसके माता-पिता भी हवेली में प्रवेश करते हैं, सभी को आश्चर्य होता है। सुमित इन लोगों के साथ कैसे ? हवेली के अंदर प्रवेश करके, पार्वती यानी पारो, रूही की बहन उसके समीप आकर बैठ जाती है। ऐसे वातावरण में, रूही उसको चुपचाप देखती है और नज़रें नीची कर लेती है।
कुछ देर पश्चात पार्वती पूछती है-आखरी यह सब अचानक कैसे हो गया ? रूही ने रोते हुए बताया -पापा जी , पुनीत की मौत का सदमा सहन न कर सके और वो भी.... कह कर मुंह पर अपना पल्लू रखकर रोने लगी। तब कुछ देर पश्चात पारों ने, रूही को इशारे से उठाया, और उसे, उसके कमरे की तरफ ले गई। रूही से पूछा -पुनीत कैसे गया ? क्या तुम्हारा बदला अभी भी जारी है ?
क्या मतलब ? मेरा यहाँ आने का उद्देश्य ही यही था फिर भी मैं, बदला लेना नहीं चाहती थी, किंतु यदि कोई मुझ पर फिर से दृष्टि जमायेगा या किसी को मुझ पर शक होगा तो ''अपना रास्ता साफ करना ही होगा।' तुम नहीं जानतीं ,एक बार भी किसी को पता चल गया इन मौतों में मेरा हाथ है ,ये लोग मुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे। कल रात्रि में वो मेरे कमरे घुस आया था ,मेरे हाथ -पांव बांध दिए थे ,तब मुझे उसे रास्ते से हटाना पड़ा।
अब यह सब बंद करो ! वह जो पाउडर मैंने तुम्हें दिया था, उसे मुझे वापस कर दो !
कैसे ?अभी दो और बाकी हैं।
इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। क्या तुम चाहती हो ? एक बार पहले भी विधवा हो चुकी हो, दोबारा विधवा होकर इसी तरह अकेले जीवन बिता देना चाहती हो।
मेरे अपराधियों में अभी सुमित भी जिंदा है , रूही ने जवाब दिया।
उसे, मैं देख लूंगी ,उसे मेरे लिए छोड़ दो !! कह कर पारो फिर से भीड़ में आकर बैठ गई। यह किस तरह की पहेली बुझा कर गई है ? रूही को कुछ समझ नहीं आया, वह सुमित को अपने लिए क्यों कह रही है ?क्या सुमित ने इसके साथ भी, कोई बदतमीज़ी की है ?यदि ऐसा है ,तो ये लोग उसके साथ कैसे आये ?
इसी ने तो मुझे, अपने अपराधियों का से बदला लेने के लिए, उकसाया था और अब यही मना कर रही है, आखिर इसके मन में क्या चल रहा है ? मेरे इस जीवन का उद्देश्य इन लोगों से बदला लेना ही तो है फिर यह मुझसे मना क्यों कर रही है ? मैं तो मर ही चुकी थी, यह तो मैंने दूसरा जन्म लिया है, अब मैं अपने बदले के लिए ही तो जी रही हूं। अब मैं किसी को भी नहीं छोडूंगी, पारो के कहने पर भी मैं नहीं मानूंगी।
सभी लोग आ चुके थे, दो अर्थियां तैयार की जा रही थीं। दमयंती तो जैसे टूट चुकी थी किंतु अभी भी वह अपने बच्चों की सलामती के लिए उन महात्मा का साथ चाहती थी। उसे लग रहा था अवश्य ही कोई तो है जो उसके बच्चों से बदला ले रहा है। अब तो महात्मा जी ने भी यह बात कही है-' कि वह बदला ले रही है।' यदि मुझे पता चल जाता, कि वह जिंदा है, और किस तरह से मेरे बच्चों से बदला ले रही है ? अबकी बार मैं, उसे बचने का एक भी मौका नहीं देती। दमयंती के मन में अपने पति और बेटे के जाने का दुःख तो था किन्तु दूसरी तरफ उस अनजान दुश्मन के लिए क्रोध की अग्नि जल रही थी।
इतना तो वह समझ गयी थी, ये मौतें अचानक ही नहीं हुई हैं ,इनके पीछे अवश्य ही किसी का हाथ तो है ,अब तो महात्मा जी ने भी बताया -वो बदला ले रही है। इसका अर्थ है ,मैं सही थी ,अब तक तो उसे लगा शिखा का भूत है किन्तु अब उसे पता चल गया है कि वो जिन्दा है किन्तु कहाँ है ?ये नहीं बताया ,इतनी भीड़ में हर महिला के चेहरे को ध्यान से देख रही थी। उसे लग रहा था ,शायद अब दिख जाये। एक पल के लिए भी यदि उसे भनक लग जाए कि यह कि शिखा यहीं है, तो वह महात्मा के आने से पहले ही उसकी हत्या कर देगी।
सभी लोगों के चले जाने के पश्चात, रूही को हवेली के पिछले द्वार पर फिर से वही बुजुर्ग दिखाई दिए। रूही दौड़ती हुई उनके पास गई और उनसे पूछा -आप इस हवेली के मालिक हैं, फिर आप इस हवेली में क्यों नहीं आते ? मैंने आपकी तस्वीर, आपके कमरे में देखी है। इस परिवार के लोगों को क्यों नहीं बता देते ? कि आप जिंदा है और यहीं आसपास रहते हैं, हवेली पर नजर रखते हैं।
उन्होंने उसकी तरफ एक नजर देखा और बोले -मैं जानता हूं, तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं, तुम भी दूसरों के साथ अन्याय करने लगो। तुम्हारी सास ने भी ऐसा ही एक अन्याय बहुत साल पहले किया था, उसी का पश्चाताप मैं आज भी कर रहा हूं। अब मैं कभी भी हवेली के अंदर प्रवेश नहीं करूंगा।
मेरी सास यानी कि दमयंती जी ने ऐसा क्या किया था ? क्या आप मुझे बताएंगे ?नहीं ....
बताना तो नहीं चाहता हूं, किंतु तुम पूछ रही हो, तो इस हवेली की भलाई के लिए कहे देता हूं , तुम्हारी दादिया सास, तुम्हारे पति तेजस से प्रेम नहीं करती थी, उसे यह लगता था कि तेजस उस बंधन से मुक्त है जो उसने अपने गुरूजी से बंधवाया था। उसे लगता , यह इस हवेली का बच्चा ही नहीं है जबकि वह जानती थी कि वह उसी के पुत्र की संतान है किंतु किसी के मन में, कोई ग्रंथि बैठ जाती है , उसे हम बदल तो नहीं सकते।
तब उसने, एक दिन उस क़ीमती गुलदस्ते को तोड़ने पर तेजस को बहुत डाँटा था। तुम्हारी सास तेजस से बहुत प्यार करती थी,उसने कहा भी -मांजी !इससे गलती हो गयी है ,इसे माफ कर दीजिये ,क्या यह फूलदान आपके पोते से भी ज्यादा कीमती है किन्तु उस दिन न जाने उसे क्या हुआ ?उसने तेजस पर हाथ उठा दिया।
दमयंती से यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने अपनी सास को धक्का दे दिया, जिसके कारण उसका सिर हवेली के खम्बे से जा टकराया। उसकी उम्र भी हो चुकी थी यह झटका बर्दाश्त न कर सकी और तुरंत ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए । हालांकि यह सब क्रोध में अचानक से हुआ था किंतु ऐसा कुछ हो गया था 'जिसको अब बदला नहीं जा सकता था।' मैं भी हवेली में नहीं था। इन लोगों ने मुझसे यह बात छुपाई और वह जो पेड़ तुम देख रही हो उसी के नीचे मेरी पत्नी की समाधि बनी हुई है।
मैं कई दिनों तक सुनयना को खोजता रहा ,उसे ढूंढता रहा, किंतु मुझे किसी ने कुछ नहीं बताया, क्योंकि यह बात सिर्फ दमयंती उसका बेटा तेजस और उसका पिता जतनसिंह ही जानते थे। घर में और किसी को कुछ मालूम नहीं था। मैं प्रतिदिन सुनयना को खोजता, उसे इधर-उधर ढूंढता। मुझे ऐसा महसूस होता जैसे वह मेरे आस-पास है। मुझे बुला रही है, इसका आभास होता किंतु वह कहीं नहीं दिखती।
यह मेरे उपन्यास'' मिस्टीरियस नाइट्स ''का एक भाग है ,पसंद आये तो सुंदर समीक्षा दीजिये और इसके अन्य भाग पढ़ने के लिए मुझे फॉलो भी कीजिये 🙏
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