आज अचानक ही ',ज़ीनत ' की बातों के माध्यम से, भूमि को पता चला कि उनके मौहल्ले के सफेदपोश ,मिस्टर खन्ना' किस तरह के इंसान हैं ? अब बात छिड़ी ही है ,तो दूर तलक जाएगी। जहाँ दो महिलाएं बातें करने बैठ ही गयीं हैं ,तो समय का भान ही कहाँ रहता है ? किन्तु आजकल ये तो अच्छा है ,फोन पर ही बातें हो जाती हैं। फोन स्पीकर डालो, बात भी होती रहेगी और साथ ही साथ काम भी होता रहता है। वैसे मानना तो पड़ेगा ,आजकल जैसे हर आदमी की व्यस्तता बढ़ती जा रही है ,उसी के साथ ही साथ सुविधाएँ भी बढ़ रहीं हैं, सब्ज़ी काटते हुए भूमि ने कहा।
हाँ, ये बात तो सही है, किन्तु अब मेरा इतना काम भी नहीं रहा ,वो जब तक आएंगे तब तक मैं सब तैयार कर लूंगी। कई बार तो अपने दूसरे घर चले जाते हैं ,वहां से खाकर ही लोेटते हैं।
अच्छा तो बताइये !आपने कभी भाभी जी को बताया या नहीं ,या फिर उन्होंने ही आपसे खन्ना जी की शिकायत की या नहीं की।
नहीं, बताया तो नहीं किन्तु एक बार बच्चों के,स्कूल के '' सांस्कृतिक कार्यक्रम ''में उनसे मुलाकात हुई थी वो आईं थीं। तब उनका उदास चेहरा देखकर, मैं समझ गयी थी ,अवश्य ही कुछ तो गड़बड़ है हालाँकि वे मुस्कुराने की नाक़ामयाब कोशिश कर रहीं थीं किन्तु मैंने ताड़ लिया और तुम तो जानती ही हो। मेरे मन में कोई बात आ जाये तो बिना कहे रुका नहीं जाता ,इसीलिए तो आजकल मुझे बहुत से लोग पसंद ही नहीं करते क्योंकि जो जैसा होता है ,उसको मैं ,उसके मुँह पर ही कह देती हूँ। कोई कुछ भी सोचे ,मुझे क्या ?मेरे मन में जो विचार या प्रश्न आया ,तो पूछ ही लेती हूँ। उन्हें देखकर भी ,मेरे मन में विचार आया और पूछ लिया -घर में सब ठीक है।
हाँ ,उन्होंने भी संक्षिप्त सा जबाब दिया।
किन्तु मुझे तो कुछ भी ठीक नहीं लग रहा था इसीलिए पूछा -आंटी -अंकल, कैसे हैं ?किसी तरह बात की शुरुआत तो करनी ही थी।
वे भी ठीक हैं।
मुझे याद करते हैं ,उसने मेरी तरफ कुछ इस तरह से देखा ,जैसे कह रही हो -'वो तुम्हें क्यों याद करेंगे ?तब मैंने ही आगे बढ़कर कहा -तुम मुझे तो जानती हो या नहीं ,हम तुम्हारे पड़ोस में ही तो रहते हैं ,अक़्सर मैं आंटी -अंकल से मिलने जाती रहती थी किन्तु आजकल बच्चों के कारण उनसे मिलने जाना ही नहीं हो पाता। तुम भी बाहर कम ही निकलती हो, इसीलिए मैंने पूछा -मुझे जानती हो या नहीं।
मेरे प्रश्नों को सुनकर वो एक पल के लिए मुस्कुराई और बोली -हाँ, हाँ , अच्छे से जानती हूँ।
तब मेरी हिम्मत आगे बढ़ी और पूछा - खन्ना साहब ! ठीक हैं। उसने मेरी तरफ गहरी नजरों से देखा ,शायद वो मुझसे पूछ रही थी, कि मैं उससे, इतनी पूछताछ क्यों कर रही हूँ ? या शायद उसने मेरी तरफ इस तरह से देखा ,जैसे पूछ रही हो ,क्या तुम खन्ना के विषय में कुछ जानती हो ? मैं नहीं जानती,उस समय, उसके मन में क्या चल रहा था ?क्या सोच रही हो ?तुम्हारे पतिदेव के विषय में पूछ रही हूँ।
हाँ ,उन्हें क्या होना है ?वे भी ठीक हैं। मैं जरा बच्चों को देख लेती हूँ ,कहकर वो उठकर जाने लगी।
अरे ,बैठो !बच्चे सामने ही तो खेल रहे हैं ,बाद में तो अपने -अपने घर में जाकर कैद हो ही जाना है। तब मैंने उसे विश्वास में लेकर उससे कहा -मेरा तो उस घर में बहुत आना -जाना रहा है ,अंकल -आंटी मुझे बेटी की तरह मानते रहे हैं ,वो तो अब बच्चों के कारण वहां जाना नहीं होता। अब तुम जो आ गयी हो ,उनका ख़्याल रखने के लिए.... तुम भी मेरी छोटी बहन तो नहीं कहूंगी किन्तु हम अच्छे दोस्त तो बन ही सकते हैं। मैं जानती हूँ ,तुम्हारे मन में अवश्य ही कुछ तो चल रहा है। मैं उस घर के, उस लड़के को भी जानती हूँ ,इसीलिए पूछ रही थी। बाक़ी तुम्हारी इच्छा !तुम्हारी अपनी ज़िंदगी है। अपनी बात किसी से बाँटना चाहो या मत बांटो !किन्तु मेरा विचार तो यही है -''समस्या बाँटने से बंट जाती है। '' मन का बोझ भी हल्का हो जाता है।
शायद आप सही कह रही हैं, आप उस परिवार को पहले से ही जानती हैं किंतु मैं इस परिवार में नई आई हूं , वैसे इतनी नई भी नहीं हूं, मेरे दो बच्चे हो गए हैं, स्कूल जाने लगे हैं, किंतु समय के साथ-साथ लोगों के रंग नजर आ रहे हैं। मैं बड़ी परेशान हूं, समझ नहीं आता ,'क्या करूं, क्या नहीं ?' भय भी बना रहता है, 'अपनी समस्या किसी से बांटने से, कई बार बात का बतंगड़ भी बन जाता है।'मैं उसका इशारा समझ रही थी। तब मैंने उसे आश्वासन दिया -तुम बेफ़िक्र रहो !'
ये परिवार के लोग, बाहर से जैसे दिखते हैं, वैसे नहीं हैं।
क्यों? क्या आंटी- अंकल भी अच्छे नहीं हैं ?
नहीं, मम्मी- पापा तो बहुत अच्छे हैं, इसीलिए तो आज तक मैं यहां टिकी हुई हूं, इस उम्मीद से कि शायद मेरे दिन बदल जाएंगे।किन्तु अपने बेटे के सामने बहु की कैसे सुनेंगे ? सोचती हूँ , कभी तो इन्हें अकल आएगी। मम्मी जी तो.... प्रतिदिन ही मुझसे अपने बेटे के किए की माफी मांगती रहती हैं किंतु लालची वे लोग, भी हैं।बेटे का व्यवहार ऐसा है कि आज ही घर छोड़ दूँ किन्तु मम्मी जी अपने बेटे को समझाने की बजाय मुझसे माफ़ी मांगने लगती हैं। अज़ीब क़शमक़श में हूँ ,इस घर को छोड़ भी नहीं पा रही हूँ और रहना भी दूभर हो गया है।
कैसे लालची ? मैं कुछ समझी नहीं,जिज्ञासावश मिसेज़ गुप्ता ने पूछा।
तब मिसेज गुप्ता ने, पारूल खन्ना की कहानी बताइ वह बोली- जितने भी ऊंचे खानदान और घर होते हैं उतनी ही उनकी सोच कुछ और होती है मेरे पापा बड़े अच्छे परिवार से हैं , हमारे परिवार में सभी सभ्य और संस्कारी हैं। बहू -बेटियों का मान- सम्मान करते हैं, हमारे यहां सभी बहुएं और बेटियां, पूजा- पाठ करती हैं भजन- कीर्तन करती हैं, किंतु मैं इन लोगों में आकर न जाने कैसे फंस गई ? मेरी सोच से बिल्कुल विपरीत हैं।
ऐसा नहीं है ,आंटीजी तो अच्छी हैं ,संजय इनका इकलौता बेटा है ,घर में ये सब तो बेटियां या बहुएं ही करती हैं ,तुम तो करती हो या नहीं ,करती हो तो आंटी ने तुम्हें कभी रोका भी नहीं होगा। तुम्हारे कारण उनके घर में ''गायत्री मंत्र ''गूंजने लगे। उनकी इतनी अच्छी बहु जो आई है ,इससे बड़ा उनका और क्या सौभाग्य होगा ?
उनका सौभाग्य मेरा दुर्भाग्य बन गया ,अब धीरे-धीरे वो मुझसे खुल रही थी ,तब बोली -'इन लोगों की असलियत मुझे अब मालूम हो रही है। यह लोग तो शराब भी पीते हैं, इतना ही नहीं, मेरे पापा कि मैं इकलौती बेटी हूं। मम्मी- पापा के बाद उस संपत्ति की वारिस मैं ही हूँ।
तुम कहना क्या चाहती हो ?
पाठकों से पूछना चाहती हूँ ,आपको' ज़ीनत' की कहानी कैसी लग रही है ?कहानी के मध्य में ये 'मिसेज गुप्ता'का क़िरदार केेसा लग रहा है ?अपनी समीक्षाओं द्वारा अवश्य बताइये ! कहानी से जुड़े रहिये !कहानी रोचक होने वाली है ,बस अपना प्यार भेजते रहिये !
