वेद प्रकाश जी ,अब सेवा निवृत्त हो चुके हैं ,भरा पूरा परिवार है, किन्तु सेवानिवृत्ति के पश्चात ,उन्होंने कुछ निर्णय लिए ,अगले दिन '' वेद प्रकाश जी'', अपनी' पुरानी साइकिल' पर घूम रहे थे, उन्हें देखकर उनके मित्र रोहन लाल जी उन्हें रास्ते में मिले और हंसने लगे।
वेद प्रकाश जी ! क्या बात है ? इतने बड़े पद से मुक्त होकर फिर भी '' साइकिल'' चला रहे हो। अरे घर में तीन- चार वाहन हैं ,गाड़ी है, स्कूटर है ,मोटरसाइकिल है फिर इस साइकिल को चलाने की क्या आवश्यकता है ?
यह साइकिल ,मेरी भावनाओं और स्वास्थ्य दोनों से जुड़ी है, वेद प्रकाश जी मुस्कुराते हुए बोले।
आज के समय में साइकिल कौन चलाता है ?अब तो यह फैशन पुराना हो गया है और आपको इसे चलाते देख बहुत ही अजीब सा महसूस हो रहा है। देखिये !ये तो 'साईकिल भी पुरानी ''है। कम से कम नई साईकिल ही ले लेते।
रोहन लाल जी ! आपको ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? क्या हम पहले से ही बड़े पद पर थे ,हमने बचपन से ही, साइकिल चलाई है।
मेरे पिता ने मुझे, जब मैं छोटा सा था ,एक छोटी सी साईकिल लाकर दी थी,ताकि मैं साईकिल चलाना सीख़ सकूँ। उसके पश्चात थोड़ी और बड़ी साइकिल लेकर आए ,जिस पर मैंने अभ्यास किया और अपने सपनों की उड़ान भरने लगा। इस साइकिल ने तो जैसे मेरे सपनों को पंख लगा दिए थे, साइकिल पर ही तो मैं स्कूल -कॉलिज पढ़ने जाता था, ट्यूशन जाता था।
हमारे घर में , मात्र एक स्कूटर ही मेरे पिता के पास था। तब मैं भी सोचता था -''कि जब मैं बड़ा होऊंगा तो स्कूटर तो क्या, मैं चार पहिए वाली गाड़ी लूंगा ,वे सपने भी मैंने इसी साईकिल को चलाते हुए देखे थे। इसी पर बैठकर उन्नति की डगर पर चल रहा था।''
और देखो !मैंने, अपने सपनों को साकार करने के लिए, इसी साइकिल का तो सहारा लिया था इसी साइकिल ने ही मुझे स्कूल से कॉलेज की राह दिखाइ, हालांकि कुछ समय के लिए यह आराम कर रही थी और मैं भी शायद , इसे भुला चुका था।
अब उम्र के इस पड़ाव पर ,जब अपने व्यस्त जीवन से मुक्त हुआ ,तब एक दिन मैंने इसे देखा ,जिसने मुझे अपनी मंज़िल तक पहुंचाने में कितनी सहायता की थी ,आज वो घर के एक कोने में शांति पूर्वक मेरी प्रतीक्षा में खड़ी, मुझे दिखलाई दी।
अब जब सेहत का सवाल आया तो यही साइकिल याद आई। अब तो डॉक्टर भी कहते हैं -कि साइकिल चलाया करो ! अब बुढ़ापे की मंजिल को यही तय करवाएगी , कहते हुए उन्होंने अपनी साइकिल को प्यार भरी नजरों से देखा और हौले से उसकी गद्दी को सहलाया,बोले -ये मात्र एक साईकिल नहीं ,इससे मेरी भावनाएं जुडी हैं। इसने मेरे जीवन किसी 'हमसफ़र 'की तरह ही साथ निभाया है।
रतन लाल जी से बोले -मेरा कहा मानो ! तो तुम भी कल से अपनी साईकिल ले आना,' पुरानी' नहीं तो 'नई' भी चलेगी कहते हुए हंसने लगे। स्कूल -कॉलिज के दिनों को दुबारा जीकर देख लेंगे,कहते हुए आगे बढ़ गए।
