बेटा होने के पश्चात ,रूही ,को हवेली के ठाकुर अमर प्रताप सिंह जी,का स्मरण होता है किन्तु उसे आजकल वे कहीं नहीं दिख रहे। घरवालों को तो जैसे, उनकी कोई परवाह ही नहीं है। वो तो ये भी नहीं जानते, उनके पिता कहाँ रहते हैं ? न ही, उन लोगों ने ये जानने में कोई रूचि ही दिखलाई किन्तु अपने परिवार का मोह ठाकुर साहब को कभी -कभी खींच ही लाता इसीलिए वे हवेली के पिछले दरवाजे से अपनी हवेली को देखने चले आते।
ऐसे में ,उसी समय शिखा की उनसे पहचान होती है ,उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया था किन्तु शिखा ने ,उनके कक्ष में ,उनकी तस्वीर देखी थी इसीलिए पहचान गयी। उन्हें ढूंढते हुए ,शिखा रामलाल के संग उनके पास पहुंच जाती है ,और उनके ' परपोते 'से उन्हें मिलवाती है और घरवालों से उन्हें हवेली में लाने के लिए बात करती है।
रामलाल के संग, जब' रूही' ठाकुर साहब को लेने गयी तब वो वहां नहीं मिले बल्कि पलंग पर उनका शव मिला। उसे बहुत दुख हुआ और साथ ही खुशी भी, दुख इस बात का था, कि जीते जी वो हवेली में नहीं आए और खुशी इस बात की थी, अपनी तीसरी पीढ़ी देखकर, उससे खेलकर खुश होकर गए हैं।
इसी घर में उन्हें अंतिम विदाई दी गई , क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी सुनयना देवी के मरने के पश्चात, उस हवेली में न जाने का निर्णय जो लिया था ,इस हवेली में इतनी घटनाएं हुईं ,उन्होंने दर्द भी महसूस किया,अपनी संतान को अपने जीते जी जाते देखा, किन्तु फिर भी वे हवेली में नहीं आए। शायद उन्होंने अपनी पत्नी के गुनहगारों को क्षमा नहीं किया था ।
अभी अनमोल तीन बरस का भी नहीं हुआ था, अबकी बार हवेली में दो-दो खुशी की खबरें थीं। पार्वती के भी पांव भारी हो गए थे और रूही भी , दूसरे बच्चे की मां बनने वाली थी।
दमयंती तो अपने सब दुख भूल चुकी थी, और उसे बस इतना ही स्मरण था कि अब उसका तेजस और पुनीत भी आने वाले हैं। उन बाल रूप में वो अपने गए हुए, बच्चों की छवि देख रही थी। सारा दिन उनके साथ खेलने में व्यतीत कर देती थी, समय के साथ बच्चे बड़े हो रहे थे।
तब एक दिन रूही ने गर्वित से पूछा -क्या आप जानते हैं, कि मैं कौन हूँ ?
यह क्या प्रश्न हुआ ? मैं जानता हूं ,तुम डॉक्टर साहब की बेटी रूही हो और अब तो मेरे दो बच्चों की माँ हो , प्रसन्न होते हुए गर्वित ने जवाब दिया।
रूही इस समय गंभीर थी, वो बोली -मैंने अभी तक अपनी पहचान खोई हुई थी, मैं अपनी पहचान को और छुपाना नहीं चाहती।
तुम्हारा क्या मतलब है ? मैं कुछ समझा नहीं, तुमने अपनी कौन सी पहचान छुपाई है ?
आज मैं घूमने जाना चाहती हूं ,क्या तुम मुझे अपने साथ ले चलोगे ?
तुम कुछ अजीब सी पहेलियां बुझा रही हो , कभी कहती हो-' कि मेरी पहचान खोई हुई है, तो कभी कहती हो, कि मुझे घूमने जाना है।
अब अंतिम बार मैं अपने उन बड़ों से मिलना चाहती हूं, जिन्होंने मुझे पैदा किया है।
बस, इतनी सी बात है ,मैं आज ही तुम्हें ,उनसे मिलवा लाता हूँ ,कहते हुए गर्वित आगे बढ़ा और बोला -तुम तैयार हो जाओ !
रूही ने अपने दोनों बच्चे तैयार किये और बाहर आ गयी ,गर्वित से बोली -तुम अपनी गाड़ी बाहर निकाल लो !ड्राइवर को साथ मत ले जाना।
गाड़ी में बैठने के पश्चात रूही बोली -'खेड़ा ''गांव की तरफ चलो !
तुम कहाँ जा रही हो ? क्या अपने माता -पिता से मिलने नहीं जाना है ?
वहीँ जा रही हूँ, कहते हुए ,बच्चों के साथ गाड़ी में आकर बैठ गयी, गर्वित को आश्चर्य था कि आखिर यह कहां जाना चाहती है ? मेरे साथ जा रही है ,लेकिन यह नहीं बताया -कि हमें कहां जाना है ?उस गांव में इसका कौन है ?
बताया तो... चलो ! आज' खेड़ा' गांव में घूम कर आते हैं ?
'खेड़ा' गांव आश्चर्य से गर्वित ने पूछा -वहां पर क्या है ?
जब वहां पहुंचेंगे तो, आपको अपने आप ही पता चल जाएगा, गर्वित गाड़ी चला रहा था किंतु दिमाग में अनेक विचार आ जा रहे थे आखिर' रूही' खेड़ा' गांव को कैसे जानती है ?इसके माता-पिता तो शहर में है।ये डॉक्टर साहब की बेटी है, वहां कहां जा रही है ? हो सकता है ,वहां इसके कोई और रिश्तेदार वहां रहते हों।
ये नाम कुछ सुना -सुना सा लग रहा है , तब उसे स्मरण हुआ कि' खेड़ा' गांव में ही तो तेजस भाई का विवाह हुआ था। उसने एक नजर रूही की तरफ देखा है किंतु यह, वो कैसे हो सकती है ? क्या यह उसकी कोई रिश्तेदार है ? या उसको जानती है, अनेक प्रश्न गर्वित के मन में उमड़कर आ रहे थे किंतु किसी भी प्रश्न का जवाब उसे नहीं मिल रहा था।
इतना बड़ा गांव है ,क्या उस गांव में एक ही परिवार और घर है ?सोचते- सोचते गर्वित का दिमाग थक गया। खेड़ा गांव भी ज्यादा दूर नहीं था, उन्होंने गांव के अंदर प्रवेश किया। आते -जाते लोग उन्हें देख रहे थे लेकिन कोई भी उनको नहीं पहचानता था।
तब रूही ने 'खेड़ा' गांव के सरपंच किशोरीलाल जी के यहाँ चलने के लिए कहा। उनको तो शायद वो भूल ही चुका था क्योंकि वो लोग ,जब तेजस की बारात में इस गांव में आये थे ,तब उनकी उम्र ही क्या थी ?एक बार आये थे ,जवानी की वो ही मस्ती, लड़कियों को देखना, मस्ती में झूमना। नया -नया शोेक था, किसी के कहने पर शराब भी पी थी। न जाने ये, मुझे कहाँ ले जा रही है ? सोचते हुए गर्वित को पसीना आ गया।
जब वे लोग सरपंच जी के घर के सामने पहुंचे , अब वो साधारण मकान नहीं रह गया था ,उन्होंने अब बड़ी सी कोठी बनवा ली थी।
तुम, मुझे और बच्चों को यहां क्यों लाई हो ? क्या तुम, यहां किसी को जानती हो ?
रूही ने ,गर्वित की तरफ देखा मुस्कुराई ,बच्चों को गाड़ी से उतारा और स्वयं भी उतरकर गाड़ी से बाहर आ गयी।
सरपंच किशोरीलाल जी के घर के सामने किसी की गाड़ी आकर रुकी तो गांव में जिसने भी देखा ,सभी को आश्चर्य हुआ।
शहर से कुछ लोग आये हैं ,उनके साथ उनके बच्चे भी हैं। गांव में यह खबर फैलती चली गयी और किशोरी लाल तक पहुंच गयी।
हो सकता है ,सरपंच जी की बेटी शिखा हो, किसी ने अंदाजा लगाया।
नहीं ,वो अपने गांव की शिखा नहीं है ,वो तो कोई शहरी लड़की है।
रूही ने कोठी के अंदर प्रवेश किया ,उसकी मम्मी बाहर आई ,और उन्हें पहचानने का प्रयास करने लगी ,तब उन्होंने पूछा -बिटिया कौन हो ?क्या मैंने, तुम्हें पहले कभी देखा है।
हाँ ,आपको ध्यान नहीं ,मैं अपनी बहन के साथ एक बार यहां आई थी।
उनकी बातें सुनकर गर्वित ने थोड़ी चैन की साँस ली ,कि जो वो समझ रहा था ,वो बात नहीं है।
अरे हाँ ,हाँ याद आया तुम तो बहुत दिनों में आईं ,बच्चों की तरफ देखकर पूछा -विवाह हो गया ,बच्चे भी हो गए ,तुमने हमें तो नहीं बुलाया। आज कैसे याद आई ?उलाहना देते हुए वो बोलीं।
