गर्वित धीरे-धीरे, अपने भाइयों के दर्द को भूलकर, रूही के समीप जा रहा था। रूही यह जानते हुए भी कि यह मेरा दोषी है, उसने गर्वित को अपने करीब आने दिया। हालांकि अब गर्वित का व्यवहार पहले जैसा नहीं था , किंतु रूही अभी तक अपने उस अपमान और तिरस्कार को भूली भी नहीं थी। न जाने, उसके मन में क्या चल रहा था ? वह किसी से भी कुछ नहीं कहती थी ? हवेली में खुशियां छा गई , जब रूही और गर्वित के बेटे 'अनमोल' ने हवेली के अंदर जन्म लिया , यह देखकर दमयंती जी तो भाव विभोर हो उठीं और भावुक होकर बोलीं - आज मेरा बेटा 'गौरव' वापस आया है हालांकि यह बात रूही को अच्छी नहीं लगी किंतु वह शांत रही।
धीरे-धीरे, अब वह हवेली नई करवटें बदल रही थी, नवजीवन की उत्पत्ति हो रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे वह हवेली फिर से जिंदा हो रही है। 'अनमोल' के नन्हें कदम जब उस हवेली के फ़र्श पड़ रहे थे , तो सभी भावुक हो गए थे।
एक दिन रूही ने गर्वित से कहा -तुम्हारी मम्मी कह रही हैं -' कि गौरव वापस आया है, क्या तुम ऐसा समझते हो ?
हमारे समझने न समझने से क्या होता है ?अगर उन्हें इस बात से ही प्रसन्नता मिलती है तो कोई बुराई भी नहीं है। हमें कुछ कार्य अपनों की ख़ुशी के लिए भी करने होते हैं।
जब पहली बार रूही और गर्वित का मिलन हुआ, उससे पहले रूही ने गर्वित से पूछा था -क्या तुम्हें मुझसे कुछ कहना है ?
मैं, भला तुमसे क्या कहूंगा ?क्या तुम चाहती हो ,मैं कुछ कहूँ !
मेरे चाहने और न चाहने से कुछ नहीं होता ,मुझे ऐसा लगा, जैसे तुम कुछ कहना चाहते हो ?आज जब अनमोल ने हवेली की छाती को अपने नन्हें कदमों से गुदगुदाया ,तब रूही ने गर्वित से फिर से पूछा -क्या तुम मुझसे कुछ कहना चाहते हो ?
हाँ ,तुम्हारा धन्यवाद ! करना चाहता हूँ ,तुमने इस हवेली को एक नई पीढ़ी दी और एक वारिस दिया है और मुझे उम्मीद है ,तुम इसकी अच्छे से परवरिश करोगी।
उसकी बातें सुनकर रूही को निराशा हुई और बोली -धन्यवाद की कोई आवश्यकता नहीं है ,यह तो मैं अपने कर्त्तव्य निभा रही हूँ, मेरी गलतियों को क्षमा करना। गर्वित रूही की बातों का अर्थ नहीं समझ पाया किन्तु उसने जानने का प्रयास भी नहीं किया।
पार्वती और सुमित अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे,सुमित ने होटल का काम संभाल लिया था। अब दमयंती, पार्वती से भी कहने लगी थी -' मैं' तुम दोनों की संतान को भी देखना चाहती हूं।
रूही, दमयंती से कम ही मिलती थी ,उनके सामने कम ही जाती थी क्योंकि वो भी उस अपराध के लिए कम उत्तरदायी नहीं थी।
एक तरफ से देखा जाये तो.... हवेली का जैसे एक युग बीत गया था। घर के बुजुर्ग अपनी अनुभवी नजरों से उस हवेली को ताकते और अपने भविष्य को देखकर प्रसन्न होते।
बहुत दिन हो गए, रूही ने महसूस किया कि अब वे बुजुर्ग यानी कि इस हवेली के असली मालिक तो अब दिखलाई नहीं देते।
एक दिन ठाकुर अमर प्रताप सिंह जी से ही उसने पूछ लिया था ,कि किसके द्वारा आपको पता चलता है कि हवेली में क्या हो रहा है ? तब उसने उसी नौकर को पकड़ा और उससे पूछा -'ठाकुर अमर प्रताप सिंह जी' कहां पर हैं ?
मालकिन ! वो तो बहुत बीमार हो गए हैं, उनकी उम्र भी तो हो गई है, अब कहीं आ जा नहीं सकते।
तब तुम, मुझे ही वहाँ लेकर चलो ! इस हवेली की तीसरी पीढ़ी, उनकी नजरों के सामने, खेलती -दौड़ती नजर आएगी तो अपने को स्वस्थ महसूस करेंगे। रामलाल के साथ, रूही वहां पर पहुंची जहां ठाकुर और प्रताप सिंह जी, बिस्तर पर लेटे हुए थे।
शायद उनकी बहुत ही ज्यादा तबीयत खराब थी, उन्हें दवाई देकर सुला दिया गया था। वह स्थान कोई हवेली तो नहीं थी, किंतु वह उनका बहुत पुराना मकान था जिसमें वो रह रहे थे। रूही को आश्चर्य हो रहा था इतने दिनों से इन लोगों के पिता, इस पुराने मकान में रह रहे हैं लेकिन किसी ने भी यह जानने का प्रयास नहीं किया, कि हमारे पिता कहां है ?
जब रूही वहां पहुंची तो उस समय ठाकुर साहब सो रहे थे , वो कुछ देर बैठी रही ,वह उस घर को देखती है तब उसने डॉक्टर को भी बुलाया।
डॉक्टर ने कहा -'अब इनकी उम्र हो चुकी है , अपने सभी कर्तव्य इन्होंने पूर्ण कर लिए हैं अब तो बस यह जब तक सांसें हैं , तब तक खुश रहें ,प्रसन्न रहेंगे तो शायद इनके जिन्दा रहने के कुछ दिन और बढ़ जाएँ। ' यही बहुत है।
तब डॉक्टर को रूही ने समझाया - समय-समय पर आकर उसे, ठाकुर साहब को देखना होगा। उनकी सेवा के लिए, एक महिला सेविका भी रख दी गयी। ठाकुर साहब ! ने जब रूही को देखा तो बोले - हवेली का तुम पर कोई रंग नहीं चढ़ा।
बाबा !अब आप खुश हो जाइए !
आपका ' पड़पोता' आपसे मिलने आया है, कहते हुए उसने, बाहर खेलते हुए अनमोल को बुलाया।
अनमोल को अपने सामने देखकर एकाएक ठाकुर साहब की आंखों में आंसू आ गए , प्रसन्न होते हुए बोले -बेटा ! इसे अच्छी शिक्षा और इसे अच्छे संस्कार देना ! ताकि मेरी यह हवेली बिखरने से बच जाए। यह मेरी तीसरी पीढ़ी है। कहते हुए उन्होंने अपने तकिए के नीचे से चाबी निकाल कर रूही को थमाई और बोले -यह तुम्हारा इनाम है।
मेरी यह तिजोरी, तुम मेरे मरने की बाद खोलना।
बाबा ! मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है, आप मुझे बस अपना आशीर्वाद दीजिए ! पैसा तो जरूरत के लिए होना चाहिए ,जरूरत से अधिक पैसा भी , बर्बाद ही कर देता है।
शायद तुम ठीक कह रही हो, इतनी देर में ही उन्हें थकान महसूस होने लगी और वो लेट गए।
रूही ने कहा - बाबा !आप आराम कीजिए ,मैं आपसे आकर मिलती रहूंगी। रूही ने परिवार में किसी को कुछ नहीं बताया था, किंतु अब उसने परिवार के सभी लोगों को बता दिया कि ठाकुर साहब जिंदा है और पुराने मकान में रहते हैं।
अगले दिन रूही ने सोचा -क्यों न, ठाकुर साहब को हवेली में ही, ले आए ! उनकी अच्छे से देखभाल भी हो जाएगी इस बात के लिए उसने, अपने बड़ों से परामर्श लिया।
जगत सिंह जी तो अब रहे नहीं थे दमयंती और तीन अन्य बड़े थे, वे तीनों को चाहते थे - कि बाबूजी ! यही हवेली में आ जाए और हमें क्षमा कर दें ! सब की बात मानकर रूही बाबूजी से मिलने चली गई और सोचा आज मैं उनको हवेली में लेकर ही आऊंगी , किंतु वहां पर उसे बाबूजी नहीं मिले।
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