शिखा ,अपने कक्ष में बैठकर, सोच रही थी - गुरूजी ! ने मुझे यहां से जाने के लिए क्यों कह दिया ?आख़िर मैं यहां क्यों नहीं रह सकती ? अब तो मैं अपने, उस ''अपराध बोध'' से भी, मुक्त हो गई हूं। मेरे मन में बस यही एक'' अपराध बोध'' था कि मैंने इस हवेली के दो बेटों की जान ली है। मैं विवश थी, यह मुझे करना पड़ा किंतु उसके लिए मुझे गर्वित का सहारा लेना पड़ा। वह उन दिनों को याद करती है, जब उसकी बहन' पार्वती -सुमित' से विवाह करके, उस हवेली में प्रवेश करती है।
वो रूही से नाराज़ थी ,वो चाहती थी, कि किसी भी तरह से रूही मौसी -मौसाजी की ज़िंदगी से चली जाये इसलिए वो हवेली वालों से बदला लेने के लिए, रूही को उकसाती है किन्तु जब गर्वित से रूही का विवाह होने पर ,उसको पता चलता है कि ये हवेली वाले कोई मामूली इंसान नहीं है। तब उसे महसूस होता है रूही किसी मामूली ख़ानदान की बहु नहीं है। शानो -शौकत में तो डॉक्टर अनंत भी उनके सामने कुछ नहीं हैं ।
चिढ़कर पार्वती सोचती है ,भले ही इसने, इन लोगों के द्वारा दुःख झेला हो किन्तु ये इस सम्पत्ति को ठीक से नहीं संभाल सकी। अपने मन के विचार.... वो एक दिन रूही के आभूषण पहनकर देखते हुए कह भी देती है किन्तु रूही को इन सबमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। अब' तीर- कमान से निकल चुका था''तब वो सोचती है -मेरे लिए मौसा -मौसी की सम्पत्ति ही ठीक रहेगी ,ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है, यही सोचकर वो संतुष्ट हो जाना चाहती है।
कुछ दिनों पश्चात पार्वती को पता चलता है ,कि डॉक्टर अनंत पहले ही उस कोठी को ,रूही के नाम कर चुके हैं। अब तो पार्वती को बहुत क्रोध आता है किन्तु उसने अपने को शांत किया और ठंडे दिमाग़ से सोचने लगी और मौक़े की तलाश में थी ,किसी तरह रूही से ,उस कोठी के कागज़ों पर हस्ताक्षर करवा लेगी किन्तु उस समय उसे, इससे भी बड़ा मौका हाथ लगा ,जब गौरव की मौत पर उस हवेली में पहुंची।
उस हवेली को देखकर ,उसका इरादा बदल गया ,अब क्या इस हवेली पर एक गंवार राज करेगी ?यही सोचकर ,उसने सुमित के भाई की मौत पर सहानुभूति जतलाते हुए उससे दोस्ती कर ली। सही तरह से देखा जाये ,तो ये सब पार्वती का रूही को कोठी से निकालने का षड्यंत्र था ,यदि ये यहाँ न आती तो सुमित भी उसके षड्यंत्र का शिकार न होता।
रूही चाहती तो कह भी सकती थी- कि यह सब पार्वती का षड्यंत्र है और इस हवेली की संपत्ति के लिए वह यहां आ रही है। किंतु जब उसे ही, इस संपत्ति से कोई मोह नहीं है तो फिर उसे क्या ?कोई भी संपत्ति का उपभोग करें। यद्यपि रूही जान गयी थी ,इन सभी बातों के पीछे पार्वती की सोच है किन्तु उसने इन बातों को नजरअंदाज किया। मेरा यहाँ कुछ भी नहीं है। पार्वती तो इतने गहने और आभूषण पाकर अत्यंत प्रसन्न थी , उसने यह सब उन गहनों और आभूषण के लिए ही तो किया था।
वह नही चाहती थी कि पार्वती के मन में उसके प्रति कोई दुर्भावना पनपे। कहीं ना कहीं तो पार्वती का विवाह होगा ही, यदि यहीं हो जाता है तो मुझे क्या परेशानी हो सकती है ? कम से कम हम दोनों को एक दूसरे का साथ तो रहेगा।
हालांकि शुरुआत में पार्वती में शिखा को धमकी भी दी थी, यदि वह उसे इस हवेली में नहीं आने देगी, तो वह यहां के लोगों को संपूर्ण सच्चाई बता देगी कि उसने इस घर के बेटों के साथ क्या किया है ? शिखा उसकी धमकी से डरी नहीं थी, क्योंकि अब उसने हर परिस्थिति से सामना करना सीख लिया था।
तब वह बोली - दीदी ! तुम मुझसे छोटी हो या बड़ी कुछ फ़र्क नहीं पड़ता ,हो सकता है ,हम साथ के ही हों किन्तु जब मैं परेशानियों में घिरी थी ,आपने ही मेरा मनोबल बढ़ाया ,उस समय आपने मेरा साथ दिया। मुझे तुम्हारे यहाँ आने से कोई आपत्ति नहीं है। 'एक से भले दो' किन्तु ये मत समझना कि मैं तुम्हारी धमकियों के डर से चुप हूँ ,यहाँ रिश्ते में, मैं ही बड़ी रहूंगी कहते हुए आगे बढ़ी किन्तु तभी वापस आई और बोली - किसी भी कारण वश मैं जेल जाती हूं तो तुम भी नहीं बचोगी, क्योंकि मैं इतनी पढ़ी-लिखी नहीं हूं कि मैं इस तरह की दवाइयों के विषय में जान सकूं यह सब तो तुमने ही ,मुझे दिया था। तुम्हारी और मेरी भलाई इसी में है, 'जो बीत गया, सो बीत गया' अब हमें जीवन में आगे बढ़ना चाहिए।माना कि इतनी पढ़ी -लिखी नहीं हूँ किन्तु मूर्ख भी नहीं हूँ ,जो सही -गलत को न पहचान सकूं। धन संपत्ति की यहां पर कोई कमी नहीं है जो भी होगा हम दोनों का ही होगा।
अधिक की तुम्हें लालसा क्यों होगी ?तुम्हारे तो'' पांचों अंगुलियां घी में और सिर कढ़ाई में है। ''दोनों तरफ की सम्पत्ति तुम्हें ही मिली है। क्या तुम वो कोठी ,मेरे नाम कर सकती हो ? हां तो बताओ !क्या तुम त्याग की मूर्ति बनोगी ? क्योंकि मौसा जी और मौसी ने अपनी कोठी भी तुम्हारे नाम कर दी है। सब कुछ तो तुम्हारा है ,तभी ऐसे सुंदर विचार मन में आते हैं ,बोलो से... फूल झरते हैं ,पार्वती ने व्यंग्य किया।
मुझे उसका कोई लालच नहीं है , तुम भी वहां रह सकती हो, वह घर जितना मेरा है उतना ही तुम्हारा भी है।रही बात नाम करने की ,वो चाहते तो अपनी सम्पत्ति तुम्हारे नाम भी कर सकते थे किन्तु उन्होंने ऐसा करके मुझ पर अपना विश्वास जतलाया है। मैं उसे तुम्हारे नाम करके, उनके विश्वास को ठेस नहीं पहुंचाउंगी।
ये कहो न... तुम्हें लालच आ गया है ,गुस्से से पार्वती बोली।
घृणा और बदले की भावना में , हमने अपना बहुत समय व्यर्थ गंवाया है इसलिए मैं चाहती हूं। कि हम दोनों यहां पर, प्रेम पूर्वक रहे और किसी के विषय में कुछ भी ना कहें। तुम इस घर की बहू बनना चाहती थी वह तुम्हारा सपना अब पूर्ण हो गया है।
दमयंती के मन में अभी भी, क्रोध की ज्वाला भड़क रही थी उसे लग रहा था मेरे बच्चों के साथ अवश्य ही किसी ने कुछ किया है किंतु उसके पास ऐसा कोई भी सबूत नहीं था,जिसके बल पर वो किसी से कुछ कह सके। किससे क्या कहे ?कुछ दिनों तक मन में तिलमिलाहट सी रही ,समय के साथ धीरे -धीरे कम होने लगी।
अब तो घर में दो-दो बहुएं आ गई हैं, एक तरीके से देखा जाए तो इस हवेली का श्राप समाप्त हो गया है। पार्वती तो पढ़ी- लिखी है और वह नौकरी भी करना चाहती है। परिवार में यह सब, जब सभी बड़ों से पूछा गया तो कोई भी इंकार न कर सका। अब धीरे-धीरे, उम्र के साथ-साथ उनकी सोच भी बदल रही थी। हवेली का भाग्य परिवर्तन की ओर बढ़ रहा था।
