गुरुजी त्रिकालदर्शी थे, वह सब जान गए थे, कि 'शिखा' ही 'रूही' है और अब यह अपने बदले के उद्देश्य से इस हवेली में आई है किंतु उन्हें लगता है, कि यह अपना बदला लेकर भी प्रसन्न नहीं है। मन में शांति नहीं है। उसने बदला तो लिया है किन्तु मन व्यथित और विचलित है। वो उससे जानना चाहते हैं-' कि क्या बदला लेकर उसे शांति मिली है ?मन प्रसन्न है ,'बदले की भावना' कम हुई या नहीं।
इस बात का रूही के पास कोई जवाब नहीं था किन्तु उसे लगता है ,इन सबका उत्तरदायी गुरूजी मुझे ही मान रहे हैं। तब वो गुरुजी से ही प्रश्न करती है -आपको क्या लगता है ?इन लोगों ने जो कुछ भी, मेरे साथ किया, क्या मुझे उसका बदला नहीं लेना चाहिए था।
मैं मानता हूं, ये सभी दंड के अधिकारी थे, और ये और जो दो हैं ये भी इस दंड के अधिकारी हैं किंतु मैं यह जानना चाहता था। तुमने जो ये हत्याएं की हैं , उसके पश्चात तुम्हें कोई 'अपराध बोध' तो नहीं है।उनके इतना कहते ही रूही चौंक जाती है ,यह सब गुरूजी को कैसे मालूम ?
देखो !संसार में दो तरह के इंसान हैं ,एक सात्विक दूसरे तामसिक !दोनों में भिन्नता कुछ नहीं है। सब एक जैसे ही हैं। बस स्वभाव ,चरित्र और विचारों की भिन्नता है।
सात्विक व्यक्ति कुछ भी गलत कार्य करने से पहले वो, चार बार सोचता है किन्तु इसके विपरीत दूसरे लोग अपराध करने के पश्चात भी नहीं सोचते हैं। उन्हें जो करना है ,कर डालते हैं। उनके लिए यही जीवन है ,उससे ऊपर वो सोच ही नहीं सकते किन्तु ये भी प्रभु इच्छा ! क्योंकि उनकी कृपा दृष्टि जब होगी तो नीच व्यक्ति को भी ,ज्ञान की कुंजी से सुशोभित कर देते हैं। तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ प्रभु की ही कोई लीला रही। सब उसकी इच्छा से होता है।
गुरूजी ! अपराध बोध तो नहीं है, किंतु मैं बदला लेना भी नहीं चाहती थी, मैं अपनी जिंदगी को अपना नसीब समझकर उसमें ही प्रसन्न रहती या फिर जीवन में कोई और राह चुनकर आगे बढ़ जाती ,मेरी प्रकृति ही ऐसी नहीं है ,किंतु मुझे बदले के लिए उकसाया गया।
वैसे मुझे लगता है ,जो कुछ भी मैंने झेला ,उसका दंड उनको मिलना आवश्यक था। इस तरह तो मैंने न जाने कितनी अन्य लड़कियों का जीवन भी बर्बाद होने से बचाया है। मैं अपनी राह पर सही थी किन्तु अब वही लोग पीछे हटने के लिए कह रहे हैं इसीलिए मैं बड़ी दुविधा में हूं, अब मुझे क्या करना चाहिए ? मेरे दो अपराधी अभी और बचे हैं।
मेरे पीछे हटने का कारण मेरा स्वार्थी हो जाना है ,यदि मैं पीछे हटती हूं, और अपना स्वार्थ दिखाती हूं इस तरह तो मैं स्वार्थी कहलाऊंगी।मैं उस व्यक्ति के साथ अपना जीवन यापन कैसे कर सकती हूँ ?उसने और उसके भाइयों ने मिलकर मेरा बलात शोषण किया।
इसमें तुम्हारा क्या स्वार्थ है ?
मेरा यही स्वार्थ होगा, अब मैं गर्वित के साथ अपना जीवन सजाने के स्वप्न कैसे देख सकती हूँ ? जबकि वह भी मेरा अपराधी है।
मैं मानता हूं कि वह तुम्हारा अपराधी है किंतु उसके अपराध की सजा, उसको मृत्यु दंड देकर ही क्यों पूर्ण होती है ? उसके अपराध का दंड कुछ और भी तो हो सकता है। यदि वह मृत्यु को प्राप्त हुआ ,उसे अपने अपराध का कैसे पता चलेगा ,कि उसे किस अपराध की सज़ा मिली है ? गौरव और पुनीत वे भी नहीं जान पाए , कि उनकी मृत्यु का कारण क्या रहा ?
गुरुजी !मैं कुछ समझी नहीं, और किस तरह से दंड दिया जा सकता है ?
यह कोई सामान्य बात नहीं है, दंड के कई माध्यम हो सकते हैं, तुमने उससे विवाह किया है, अब वह तुम्हारे जीवन का संपूर्ण उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठायेगा, तुम्हारे सुख-दुख में तुम्हारे साथ रहेगा। वह तुमसे प्यार करने लगा है।'' कोई छोटी सी चोट ही जीवनभर का दर्द बन जाती है।''
यह मैं जानती हूं, किंतु यह बात जानकर, मुझे कोई आंतरिक खुशी नहीं हो रही है बल्कि मुझे लगता है मैं उसके साथ छल कर रही हूं। क्या मुझे, उसे संपूर्ण सच्चाई बता देनी चाहिए ?
यदि तुम उसको संपूर्ण सच्चाई बता दोगी , तब वह जीवन भर इस अपराध बोध में जीता रहेगा। हो सकता है वह अपने आपको माफ न करें और हवेली छोड़कर फिर से कहीं चला जाए। तब तुम उसके बिना अकेली कैसे जीवन यापन करोगी ? और यदि तुम उसकी हत्या कर भी देती हो , तो उससे क्या होगा ? इस हवेली में रहने के लिए तो कोई और भी आ सकता हे।
हाँ मेरी बहन ने कहा है -सुमित को तुम मेरे लिए छोड़ दो ! गुरुजी उसे इस हवेली की धन संपदा का लालच है।
मैं जानता हूं , इस लालच के तहत उसके अंदर सकारात्मक विचार तो उत्पन्न हुए हैं , उसी ने तुम्हें इस राह पर आगे बढ़ने से रोका है। लोभ ,मोह ,क्रोध हमारे मन के विकार कहे जाते हैं किन्तु उनके पीछे की भावना क्या है ?उस भावना को देखना चाहिए ,उसकी उस लालच की भावना ही तुम्हें अन्य अपराध करने से रोक रही है और वही अब तुम्हें समझा भी रही है।
यह सब ईश्वर की माया है या फिर उसकी कृपा ! वो तुम्हें किसी और राह पर भेजना चाहते हैं। वह साधन और साध्य तुरंत ही बना भेज देता है। मुझे लगता है ,तुमने यह जो हत्याएं की हैं। तुम अपराध करना नहीं चाहती थीं किन्तु अपराधी बन गयी हो ,इसी कारण तुम बदला लेकर भी संतुष्ट नहीं हो ,कानून की दृष्टि में तो तुम भी अब अपराधी ही हो। वे लोग भी अपराधी थे ,किन्तु उनकी आत्मा भी मर चुकी थी। तुम्हारे सामने कारण ऐसा बना , तुम्हें न चाहते हुए भी अपराधी बनना पड़ा। तुम जाग्रत हो ,तुम अभी भी इस जीवन को जीत सकती हो।
तुम्हारा जीवन -दो हिस्सों में बंट चुका है , पहला जीवन -जिसमें तुमने दर्द झेला ,वह अग्नि की भेंट चढ़ा।
दूसरा जीवन - अपने अपराधियों को दंड़ दिया। अब तुम इस जीवन को नए मार्ग पर ले जा सकती हो ,वो जीवन शांति पूर्ण सद्गति की ओर ले जायेगा। मन को शांत करेगा ,अब ये निर्णय तुम्हारा होगा तुम किस मार्ग पर जाना चाहती हो ?
पहला जीवन तुम्हारे वश में नहीं था ,दूसरा मार्ग तुमने किसी के कहने पर चुना ,अब आगे का जीवन अपने लिए चुनो ! जिन दोनों को तुमने मुक्ति दी ,उनकी करनी की सज़ा दी ,उन्हें वापस नहीं ला सकतीं किन्तु इन दोनों को जीवन देकर अपने 'अपराधबोध' से मुक्ति पा सकती हो।
जी गुरुजी ! रूही !के मन में विचारों का जो कारवां उमड़ रहा था ,वो थोड़ा अब शांत होने लगा था।
अब तुमने क्या निर्णय लिया? जो अब वर्तमान में चल रहा है, उसे ऐसे ही चलने देना है या फिर सब कुछ तहस-नहस कर देना चाहती हो ?
