रूही, खिड़की के पास खड़ी होकर बाहर की तरफ देख रही थी। न ही उसके मन में कोई विचार आ रहा था और न ही जा रहा था। ऐसा लग रहा था, जैसे वह शून्य में खड़ी है ,सन्नाटा उसके इर्द -गिर्द छाया था। जबकि कमरे में गर्वित भी था। क्या ये 'मौत' के पश्चात की शांति है ? आज जबकि उसे प्रसन्न होना चाहिए ,वह अपनी मंज़िल के कितने करीब आ गयी है ? बस अब दो ही बाकि हैं ,इस हवेली को वीरान करने से कोई नहीं रोक सकता। ये बड़े -बूढ़े तो पहले ही' क़ब्र में पैर लटकाये बैठे हैं ',एक -दो तो जवान बच्चों की मोेत का सदमा सहन न कर पाने के कारण यूँ ही, इस दुनिया को अलविदा कह जायेंगे।
किन्तु रूही ने अपना बदला तो लिया है और किसी को भनक तक भी नहीं लगी। यदि किसी को एहसास भी होगा तो उसके विरुद्ध किसी के पास ,कोई प्रमाण ही नहीं है ,यह सब रूही ने किया है ,किन्तु बदला लेकर भी रूही को किसी भी तरह की प्रसन्नता का एहसास नहीं हो रहा था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था , क्या सही है ,क्या गलत है ? जब मैंने अपने दोषियों से बदला लेना चाहा , तो मेरे अंदर एक' जुनून' था, 'क्रोध' था , 'बदले की भावना' थी किंतु आज न जाने वह सब कहां लुप्त हो गए हैं ?
क्या यह सब पार्वती के कहने का असर है ? यदि मेरे जीवन में भी इस तरह से परेशानियां न आतीं तो शायद मैं भी, शांत रहकर अपने जीवन के विषय में सोच रही होती,अपने बच्चों का भविष्य बुन रही होती। हवा का एक ठंडा झोंका खिड़की के मार्ग से आता है और उसके तन को छूकर आगे बढ़ जाता है। वह ठंडा स्पर्श उसके अशांत मन को भी ठंडक न दे सका, उसका प्रयास भी विफ़ल रहा।उस ठंडक को छू रूही अपने अशांत मन को शांत करना चाहती थी ,वह खिड़की के और करीब गयी।
इससे पहले तो पार्वती ने, मुझे स्वयं ही, बदला लेने के लिए प्रोत्साहित किया था,वरना इन लोगों से बदला लेने की मेरी क्षमता कहाँ थी ? मैं तो अपनी ज़िंदगी को क़िस्मत के हवाले कर जी रही होती , किंतु अब पार्वती स्वयं ही इस हवेली और धन के लालच में, इस हवेली में प्रवेश करना चाहती है। उसने तो मेरी कहानी सुनी है। उसे लग रहा था कि पार्वती ने उसे, इस हवेली में, अपने आने का सोपान बनाया है और सुमित के माध्यम से इस हवेली के अंदर प्रवेश करना चाहती है और अब मुझे दो हत्याओं के अपराध में, धमकी भी दे रही है। क्या यह उचित है ? सब कुछ स्पष्ट है किन्तु मन में अभी भी जैसे हाहाकार मचा हुआ है।
तब वह गर्वित की तरफ देखती है, जो बिस्तर पर लेटा हुआ, शायद अपने परिवार के विषय में सोच रहा है।उनकी असमय मौत को लेकर आहत है। मेरे घर वाले मुझसे दूर जा चुके हैं ,उनसे मिल भी नहीं सकती। सही तो है ,इन लोगों को भी तो एहसास होना चाहिए ,जब अपने दूर होते हैं ,तो कैसा महसूस होता है ?
अपने मन को अपने विचारों को पार्वती भटकाना चाहती है किन्तु कुछ देर पश्चात पुनः लौटकर वहीं आ जाती है। पार्वती तो बहुत अधिक ही चालाक निकली, उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने उसे,उसी की आँखों के सामने ठग लिया हो और वो कुछ कर भी नहीं पा रही।
क्या सोच रही हो? खिड़की के पास खड़ी रूही को देखकर गर्वित ने पूछा।
कुछ नहीं, बस ठंडी हवा अपने अंदर भर लेना चाहती हूँ ताकि अपने को शांत रख सकूँ। सोच रही हूं यह जिंदगी भी कितनी अजीब है ? कभी लगता है, संपूर्ण आसमान मेरा है ,कभी लगता है, मैं एक भ्रम में जी रही थी, अपना तो कोई भी नहीं है।
तुम्हें ऐसा क्यों लगता है ? क्या किसी ने तुम्हारा दिल दुखाया है ? मैं तो बहुत दिनों से तुम्हारे पास ही नहीं था ,कहते हुए रूही के चेहरे की तरफ देखा, उसका चेहरा उदास और शांत था।
मन ही मन सोच रही थी, यह मुझ पर व्यंग कर रहा है या फिर मेरी उदासी का कारण खोज रहा है। अभी तक तो उसने गर्वित के साथ प्यार का नाटक ही किया था किन्तु आज कुछ भी महसूस नहीं हो रहा है। उसे अपनी यह लड़ाई बेमानी नजर आ रही है। मैं जानती हूं, मेरे साथ, इन लोगों ने बहुत अत्याचार किया है उस अत्याचार के बदले में मैंने दो लोगों जान भी ले ली, किंतु इससे मुझे क्या हासिल हुआ ? मैं अपनी ही नजरों में अपराधी बन गयी हूँ।
क्या मेरा उन्हें दंड देना गलत था ? नहीं ,उसके अंदर से आवाज आई। 'ये लोग, इंसानी पिशाच बन चुके थे मैं तो घर में ही ,इनके शोषण का शिकार हुई हूँ किन्तु इनके होटल में तो न जाने कितनी खून के आसूं रोई हैं ?कुछ ऐसी 'रहस्य्मयी रातें'जिनका इस घर के लोगों के सिवा ,शायद उन लड़कियों के माता -पिता को भी पता नहीं चला ,वे कहाँ गयीं ? जिन्दा हैं भी या नहीं।
ऐसे लोगों को दंड देकर मैंने कौन सा पाप कर्म कर दिया ?उनको दंड मिलना आवश्यक था। अपने मन को स्थिर करते हुए रूही ने गर्वित की तरफ देखा। जब वो गुनहगार थे तब ये क्यों नहीं ?ये दोनों भी तो उतने ही गुनहगार हैं। यदि इन्हें पता चल जाये ,ये सब मैंने ही किया है तब देखती हूँ ,ये कैसे सीधे रह जाते हैं ?शायद ये लोग मुझे छोड़े भी नहीं.....
इन लोगों ने मुझे रूही समझकर मुझ पर विश्वास किया है ,यदि इस घर में रहकर मैं ऐसा करती हूं तो उसका विश्वास भी तो तोड़ देती हूं। इसी तरह से इन लोगों ने भी तो मेरा विश्वास तोड़ा था और उस विश्वास के टूटने पर ही मैं और जिद्दी हो गई थी, 'बदले की भावना' से भर गई थी। यदि गर्वित का विश्वास टूटता है , इसका शांत मन भी अशांत हो जाएगा। हो सकता है ,यह बदले की भावना से मुझ पर प्रहार करें मुझे मारे और पीटे या फिर हवेली से निकाल दे ! और यदि मैं बिना बताए ,इसको मार देती हूं , तब मेरा जीवन कैसा होगा ? क्या इस अपराधबोध को मैं जीवन भर, वहन कर सकूंगी? एक विधवा का जीवन बिताती रहूंगी, अभी तो यह कानूनी और तरीके से मेरा पति है, क्या मैं इसकी हत्या का अपराध अपने सर पर ले सकती हूं ?जीवनभर जेल में चक्की पिसूँ ,तब इस हवेली के अन्य लोगों का क्या होगा ? जब तक ये लोग जियेंगे ,मुझे कोसते रहेंगे।
यही तो तू चाहती थी,ये लोग तड़पें ,जब तक जियें !अपने ग़ुनाहों की सजा भुगतते रहें। इन्हें एहसास हो किसी के साथ बुरा करने पर, बुरा ही मिलेगा। जैसा पेड़ बोया ,वैसा ही फ़ल तो मिलेगा। मैं इन्हें क्षमा कैसे कर सकती हूँ ?
