Khoobsurat [part 135]

रोहिणी की बदली हुई ,हालत देखकर कल्पित, उसे घर न लेजाकर ,डॉक्टर के पास ले गया। तब तक कल्पित ने इंस्पेक्टर कुणाल को भी बुला  लिया था। तब वे डॉक्टर से ,रोहिणी की हालत का कारण जानना चाहते हैं। जब डॉक्टर उनसे कहती है -मुझे लगता है ,इसके मन में किसी बात का डर या बोझ बना हुआ है। 

तब इंस्पेक्टर उसे बताते हैं - हम एक केस की छानबीन कर रहे हैं, और हमें शक है, इस महिला ने अपने पति का ही खून नहीं किया है बल्कि इसने अपनी सहेली के पति का भी खून किया है। हो सकता है ,उससे इसके अवैध संबंध रहे हों , कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन यह वर्षों से छुपी हुई थी। यह हमारा एक'सीक्रेट ऑपरेशन'' है ,हत्यारे  को उसके बिल से बाहर लाने का....  अब आप अपना कार्य कीजिए !


ठीक है, मैं प्रयास करती हूं, इस तरह तो यह नहीं बताएगी,इतने दिनों से ख़ामोश है , इसको सम्मोहन प्रक्रिया के द्वारा ही , इससे वह बात उबलवाई जा सकती है क्योंकि इसमें वह कार्य किया तो है, लेकिन अपने अंदर इस तरह दफन कर लिया है कि यह उन हालातों  को देखते हुए, यह डर तो जाती है लेकिन स्वीकार नहीं कर पाती है । 

डॉक्टर !आपको जैसा उचित लगे, इसका उपचार कीजिए,आप इससे कुछ  निकलवा सकें तो ठीक है  वरना हमारी सबइंस्पेक्टर है ही.... वो सब उगलवा लेंगी।  बहुत दिनों के पश्चात यह हाथ लगी है ,कुछ तो पता लगाइये !

मैं. इंस्पेक्टर चांदनी को भी बुलवा लेता हूँ ,यह कहते हुए ,दोनों क्लिनिक के बाहर कुर्सी पर बैठ गए। 

कल्पित इसके साथ तो इसका बच्चा भी था ,न... वो कहाँ गया ?

सर ! उसे डॉक्टर की नर्स ने ही, दूध पिलाकर डॉक्टर के घर में सुला दिया है। जब तक  वह शायद सोकर उठे हमारा काम हो जाये। वैसे एक बात कहूं ,सर ! क्या हम सही जा रहे हैं ?

मैं, यह तो नहीं कह सकता कि हम सही जा रहे हैं या नहीं  किंतु कुछ तो मिलेगा, विश्वास के साथ इंस्पेक्टर ने कल्पित  से कहा -'वेल्ड्न 'आज तुमने बहुत अच्छा कार्य किया।  

कुछ देर के पश्चात पुलिस की एक टीम दमयंती की कोठी के सामने खड़ी थी ,उन सभी को इस तरह देखकर ,गार्ड को थोड़ा आश्चर्य हुआ और तुरंत ही उसने अंदर सूचना भेजी। 

कल्याणी जी ,पहले तो घबरा गयीं ,अचानक आज इतने लोग कैसे आये ?अब तक तो एक या दो ही आते रहे हैं। तब उन्होंने रोहिणी को ढूंढा ,तब उनके अनुचर ने उन्हें बतलाया -मेमसाहब !तो बच्चे को घुमाने के लिए बग़ीचे में गयीं हैं। 

ठीक है ,यदि वो आ भी जाये तो उसे, बाहर ही रोककर रखना,अपने अनुचर को आदेश देकर ,वो मानसिक रूप से तैयार होकर बैठ गयीं। उन्हें देखकर  लग रहा था ,जैसे वे पहले से ही तैयार बैठी थीं। इंस्पेक्टर को  देखते ही पूछा -क्या हुआ? इंस्पेक्टर साहब ! क्या मेरी बेटी मिल गई ?

इंस्पेक्टर तेवतिया मुस्कुराए और बोले -आपकी बेटी भी मिल गई है और उसका कातिल भी मिल गया है।

 बताइए ! मेरी बेटी कहां है ?

आपकी बेटी पुलिस स्टेशन में है, इंस्पेक्टर ने कहा।

 और मेरे दामाद का हत्यारा  ! 

वह भी आपको वहीं  मिल जाएगा, अभी आपको, हमारे साथ चलना होगा। दमयंती को विश्वास नहीं हो रहा था इन लोगों ने मेरी बेटी को ढूंढ लिया है, तब वो  बोलीं - यदि मेरी बेटी को आपने ढूंढ ही लिया था तो उसे अपने साथ लेकर क्यों नहीं आए ?

हम, उसे अपने साथ लेकर कैसे आ सकते हैं ? वह तो शायद जैसे अपने परिवार को भूल ही गई है ,मुझे लगता है ,उसे कुछ भी याद नहीं है। आपको ही तो बताना होगा कि वो आपकी बेटी है भी या नहीं .... हो सकता है ,वो कोई बहरूपिया हो और अपने को, आपकी बेटी बता रही हो।कुछ कागज़ी कार्यवाही भी तो होंगी।  उन अपहरणकर्ताओं ,उसकी इतनी बुरी हालत की है। आप हमारे साथ चलिए ! शायद वह आपको पहचान ले !

मैं, अभी आप लोगों के साथ चलती हूँ , वैसे अभी तक रोहिणी नहीं आई ,अपने बच्चे के साथ घूमने गयी थी , वह उसे घुमाने के लिए बगीचे में लेकर गई थी। 

वह भी आ जाएगी आप तो चलिए ! इंस्पेक्टर तेवतिया ने कल्याणी पर दबाव बनाया। कल्याणी को न चाहते हुए भी उनके साथ जाना पड़ा। 

मन ही मन सोच रही थी -इन्हें ,कहीं कुछ पता तो नहीं चल गया है ,रोहिणी भी न जाने कहाँ चली गयी ?अच्छा है ,इनके हाथ न लगे। 

थाने में पहुंचकर उन्होंने पूछा -मेरी बेटी कहाँ है ?

आराम से अपनी कुर्सी पर बैठकर ,इंस्पेक्टर तेवतिया बोले -ये  हमारी बहुत ही क़ाबिल इंस्पेक्टर हैं ,' सब इंस्पेक्टर चांदनी'ये अब आपको आपकी बेटी से मिलवाएंगी। तब चांदनी से  कहते हैं - कि इन्हें इनकी बेटी से मिलवाओ !

तब 'सब इंस्पेक्टर चांदनी' कल्याणी जी से कहती है -चलिए !मैं ,आपको आपकी बेटी के पास लेकर चलती हूं। तब वह उन्हें ' पूछताछ कक्ष' में लेकर जाती है ,वहां पर कोई नहीं था। 

 वहां आसपास की जगह देखकर, कल्याणी जी से कहती है -इंस्पेक्टर साहिबा ! यह आप मुझे यहां पर क्यों लेकर आई हैं ? मेरी बेटी तो मुझे, कहीं भी दिखलाई नहीं दे रही है। 

अभी आ जाएगी ,थोड़ी सी आपसे पूछताछ करनी है, आप यहां बैठिये !! तब इंस्पेक्टर चांदनी उनसे पूछती है -अब आप मुझे विस्तार से संपूर्ण बातें  बतलाइए। 

मुझे क्या बताना है ?कुछ भी न समझते हुए ,कल्याणी जी ने पूछा, मैं इंस्पेक्टर साहब को सब कुछ  बोल चुकी हूं,जो कुछ भी मैं जानती थी।  

आपने इंस्पेक्टर साहब, से क्या बोला - वह तो मैं नहीं जानती किंतु अब आप मुझे यह बतलाइए ! आपकी बेटी का क्या नाम है ?

आप कैसे इस केस की छानबीन कर रहीं हैं ?जब आपको मेरी बेटी का नाम ही मालूम नहीं है ,कल्याणी जी ने चांदनी की तरफ उपेक्षा से देखा। 

ये हमारा काम है ,हमें कैसे करना है ,कैसे नहीं ?हम जानते हैं क्योंकि उसका एक नाम हो तो पता भी चले ,शिल्पा या तमन्ना ! पहले मुझे ये बताइये ! आपकी बेटी और आपके दामाद के बीच क्या चल रहा था ?

यह आप मुझसे क्यों पूछ रही हैं ? मेरी बेटी मिल गयी है ,उसी से पूछ लीजिये !

यह मैं ,आपसे इसलिए पूछ रही हूं क्योंकि वह आपकी बेटी थी और आप ही के घर में रहती थी।माँ से बेहतर बेटी को भला कौन समझ सकता है ? 

इंस्पेक्टर साहिबा ! मुझे लगता है ,आप भूल गई हैं, मेरी बेटी , मेरे साथ नहीं, कोठी नंबर 308 में रहती थी। 

वह तो मैं जानती हूं, किंतु मुझे यह बात समझ में नहीं आई कि वह आपका घर छोड़कर, इतने सारे नौकर -चाकर छोड़कर आपका साथ क्यों गई थी ?जबकि आपका दामाद  पहले से ही किराये के घर में अलग रह रहा था,तब वो उसे, ज़बरन आपकी कोठी में लेकर आई।  क्या आपसे, उनकी पट नहीं रही थी?

नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, दामाद से भला मेरा क्या वास्ता ?वो मेरी बेटी को खुश रखे ,माता -पिता के लिए यही बहुत है।  दरअसल मैंने  ही सोचा था- कि इन दोनों को रहने के लिए, अलग स्थान पर भेज देते हैं। अकेले रहेंगे ,तो एक -दूसरे को समझेंगे और एक दूसरे के विचारों को जानेंगे ,इसलिए मैंने ही कहा था -कि मुझसे  ज्यादा दूर नहीं होंगे , मेरी सहेली का घर है, तुम वहां पर जाकर रह सकते हो। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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