विचारों में खोई रोहिणी के विचारों को, अचानक ही जैसे 'ब्रेक' लग गया ,जैसे ही कल्पित की गाड़ी को ब्रेक लगा,वो भी अपने विचारों की दुनिया से बाहर आ गयी।
लो ! भई तुम्हारा ' मेघा मार्ट' आ गया,कल्पित ने कहा।
रोहिणी अपने बच्चे को साथ ले ,गाड़ी से उतरी ,तब कल्पित बोला -तुम माँ -बेटा अंदर प्रवेश करो ! मैं गाड़ी खड़ी करके अभी पहुंचता हूं।
रोहिणी की प्रसन्नता छुपाये नहीं छुप रही थी ,उसके चेहरे पर अजब ही चमक थी।
रोहिणी अपने बेटे को लेकर'' मेघा मार्ट'' की तरफ बढ़ जाती है। आज बहुत दिनों के पश्चात, उसने इस तरह भीड़भाड़ वाली भी , खुली आलीशान जगह देखी थी। महीनों से उस कोठी में बंद थी ,वो तो बच्चे के कारण बग़ीचे में आ जाती थी।
आरम्भ में तो ,कल्याणी जी ने वहां भी, उस पर नजर रखवाई थी, किन्तु जब कुछ संदिग्ध नहीं लगा तब उससे ध्यान हटाया।
आज उसकी प्रसन्नता देखते ही बन रही थी ,जैसे वह खुलकर सांस ले रही थी किंतु अभी भी अंदर ही अंदर उसे यह डर था, मेरे यहां आने की बात कल्याणी जी को पता ना चल जाए। वह चारों तरफ नजरें दौड़ा कर देख रही थी। जब कल्पित आ गया ,तब वो' विद्युत् द्वारा चालित' सीढ़ियों से होते हुए ऊपर गए। वहां पर महिलाओं और पुरुषों के अच्छे परिधान मिलते हैं किन्तु वहां का हाल देखकर ,रोहिणी ने एक गहरी स्वांस ली और कल्पित से पूछा -हम यहाँ क्या लेने आये हैं ? चलो ! वापस चलते हैं।
क्यों ?अभी तो आये हैं ,ख़रीददारी करने आये हैं ,तो खरीददारी करके ही जायेंगे। आस -पास की दुकानें देखकर बोला -अरे !! मैं तो भूल ही गया ,आज'' वेलेंटाइन डे ''भी तो है इसीलिए यहाँ इतनी रौनक हो रही है। लाल ग़ुलाब , लाल दिल लिए टेेडी ,लाल दिल !
बस भी करो !बोले जा रहे हो ,जो हम यहाँ लेने आये हैं ,लेकर चलो !अब रोहिणी को ऐसा लग रहा था ,जैसे वो यहाँ आकर फंस गयी है ,उसने यहाँ आकर बहुत बड़ी गलती कर दी है ,वो नजरें चुराते हुए ,आगे बढ़ रही थी।
कल्पित ने पूछा -क्या तुम कुछ खरीदना चाहोगी?
नहीं, मैं कुछ नहीं खरीदूंगी, मेरे लिए तो यही बहुत है कि मैं तुम्हारे साथ ,यहां घूमने आ गई। तब रोहिणी ने कल्पित से पूछा -तुम्हारे बॉस ने अपनी पत्नी की ,क्या पसंद बतलाई ?अब वहीं चलते हैं ?
मुझे क्या मालूम ? लापरवाही से कल्पित ने कहा।
अरे यह क्या बात हुई ? तुम ही तो कह रहे थे-' कि मैंने उनसे फोन करके पूछा है ,'कि उन्हें क्या रंग पसंद है ?'
ओह ,हाँ यह तो मैं भूल ही गया था ? उन्हें तो' लाल रंग' पसंद है। रोहिणी ने कल्पित की तरफ देखा ,उसे लगा कहीं ये मुझे जानबूझकर तो यहाँ नहीं लाया है किन्तु तब तक कल्पित अपनी बात कहकर वहीं दुकान में आगे बढ़ा और उनसे कहा - 'मुझे कुछ लाल रंग की साड़ियां या सूट दिखाइए।'
दुकानदार लाल रंग की साड़ियां और सूट दिखा रहा था, किंतु रोहिणी उनसे नजरें चुरा रही थी ,उसको वे सब चीजें देखकर जैसे बेचैनी सी हो रही थी और कल्पित उससे बार-बार पूछ रहा था -तुम्हें यह साड़ी कैसी लगी ?
तुम ही देखो ! तुम्हारे बॉस की पत्नी की पसंद कैसी होगी ? मैंने उन्हें देखा भी नहीं है, मैं कैसे यह बात बताऊंगी ?
तब कल्पित बोला -मैं तुम्हें इसीलिए तो यहां लेकर आया हूं ,एक औरत ही औरत की बात समझ सकती है। कहते हुए, एक साड़ी ली और बोला -हाँ ,यह साड़ी बहुत अच्छी लग रही है ,कहते हुए साड़ी की तह को खोला और रोहिणी के सिर पर डालते हुए बोला -देखो !कैसी लग रही है ?
रोहिणी के सामने शीशा था, उसने अपने आप को उस आईने में देखा और चीखने लगी - मुझे कुछ नहीं देखना है, मैंने कुछ भी नहीं किया है और यह कहते हुए वह बाहर की तरफ भागी। तुम यह सब जानबूझकर कर रहे हो ? मुझे मार डालना चाहते हो।
कल्पित उसे आवाज लगाते हुए , रोहिणी के पीछे जा रहा था और उससे पूछ रहा था - क्या हुआ ? किंतु रोहिणी ने उसकी एक भी बात का जबाब नहीं दिया । उसकी हालत ऐसी हो गई थी , वह अपने बच्चे को भी,भूल गयी, उसे दुकान पर ही छोड़ कर भाग गई थी।
कल्पित ने, दुकानदार से बच्चे का ध्यान रखने के लिए कहा और रोहिणी के पीछे गया। उसके हाथ में अभी भी लाल साड़ी थी। तुम्हें क्या हुआ है ?मुझे कुछ तो बताओ !..... तुमने क्या नहीं किया है ?
मैं कुछ नहीं जानती, कहते हुए वह गाड़ी में आकर बैठ गई,इस ऐसे समय लग रहा था ,वो अपने आपसे नियंत्रण खो चुकी है।
रोहिणी ! तुम यह क्या कर रही हो, क्या तुम भूल गई हो ?तुम्हारा बच्चा भी तुम्हारे साथ है। तुम क्यों परेशान हो रही हो? ऐसे समय में रोहिणी अपने को विवश पा रही थी।
कल्पित के हाथ में साड़ी देखकर बोली -तुम इसलिए मुझे यहां लेकर आए, तुम, मुझसे बदला चाहते हो ,उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं। मैं वापस नहीं जाऊंगी, मेरे बच्चे को लाकर दो !
मुझे बताओ !तो सही, तुम्हें क्या हुआ है ? कहते हुए उसने वो साड़ी वहीँ रख दी। इसे यहाँ से उठाकर ले जाओ !कहते हुए वो चीखी ,कल्पित ने फोन करके बच्चे को वहीं मंगवा लिया और बोला -तुम ज़्यादा परेशान मत हो ,हम वापस चलते हैं ,कहते हुए उसने गाड़ी बाहर निकाली। इस समय रोहिणी सहमी हुई बैठी थी। उसका जितना अपने पर बस चला ,उसने अपनी को नियंत्रित रखा। '
कल्पित की गाड़ी ,एक डॉक्टर के क्लिनिक पर जाकर रुकी। घबराई हुई ,रोहिणी बोली -तुम, मुझे यहाँ क्यों लेकर आये हो ?
तुम घबराओ ,नहीं !ये एक डॉक्टर हैं ,तुम्हें दवाई देंगी ,जब तुम्हें आराम मिलेगा ,तभी तो हम घर पहुंचेंगे वरना तुम्हारी मम्मी पूछेंगी -तुम, कहाँ गयी थीं ,क्या हुआ था ?तब क्या जबाब दोगी ?
यहाँ डॉक्टर को दिखाओ !और थोड़ा आराम करो ! तब चलते हैं।
मुझे बताइये !आपको क्या हुआ है ?महिला डॉक्टर ने रोहिणी से पूछा ,जो एक' मनोचिकित्सक' थी।
नहीं ,मुझे कुछ भी तो नहीं हुआ ,अब मैं चलती हूँ ,मेरा बच्चा कहाँ है ?मुझे घर वापस जाना है।
धैर्य से काम लेते हुए डॉक्टर बोली -आपको क्या हुआ था ?क्या आप किसी चीज को देखकर डर गयीं थीं ?
बताया न... मुझे कुछ नहीं हुआ था ,अभी भी उसके हाथ -पांव काँप रहे थे।बेचैनी से अपने हाथों को मसल रही थी।
लो ! ये दवाई खाओ !तुम्हें आराम मिलेगा।तब कल्पित से बोली - यह मानसिक रूप से बहुत परेशान है ,पहले इसके दिमाग़ को आराम की आवश्यकता है। तब मैं इसका उपचार करूंगी।
डॉक्टर साहिबा !आपको क्या लगता है ?इसे क्या हुआ है ?
अभी तो कहना मुश्किल है किन्तु मुझे लगता है ,इसके दिमाग पर किसी बात को लेकर बहुत बड़ा बोझ या डर बना हुआ है।
कल्पित के बुलाने पर तब तक इंस्पेक्टर कुणाल भी आ गया था, उसने डॉक्टर की बात सुनी और बोला -बोझ , क्यों नहीं होगा इसने दो-दो आदमियों का खून किया है।
इंस्पेक्टर साहब ! यह आप क्या कह रहे हैं ? घबराते हुए डॉक्टर ने पूछा।
