कल्पित के स्वर रोहिणी के कानों में गूंज रहे थे -'' जो भी कोई खूबसूरत चीज मुझे दिखलाई देती है, मैं उसे अपने कैमरे में बंद कर लेता हूं।'' इंसान कितना खुदगर्ज है ? हर खूबसूरत चीज को कैद कर लेना चाहता है। जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है, मेरा जीवन एक कैदी की तरह बंद होकर रह गया है। किसी भी चीज की खूबसूरती कई बार उसी की दुश्मन बन जाती है और जो सुंदर नहीं होते, उसकी तरफ कोई देखना भी पसंद नहीं करता। वो ,अपने आप में ही कैद होकर रह जाता है। किसी भी चीज को स्वतंत्र छोड़ना नहीं चाहते, न जाने क्यों दूसरे की आजादी उसकी खुशियां छीन लेना चाहते हैं ?
रोहिणी कोठी के अंदर प्रवेश कर गई। कल्पित उसे जाते हुए देखता रहा , उसके इस तरह चले जाने पर कल्पित उसके पीछे नहीं गया।
अगले दिन जब रोहिणी बगीचे में अपने बेटे को लेकर पहुंची ,तब उसने, अपने सामने ही कल्पित को बैंच पर बैठे देखा ,शायद वो उससे, पहले आकर उसी की प्रतीक्षा कर रहा था। उसे देखते ही बोला -अरे !आप आ गयीं ,मैं तो सोच रहा था,कल की बातों से शायद आप नाराज़ हो गयी हैं। शायद आप नहीं आएँगी,शायद कल की मेरी बातों से आपको बुरा लगा हो।
क्यों ?हमारे बीच कोई ऐसी बात भी नहीं हुई थी ,जो मेरा बग़ीचे में आना ही बंद करवा दे !
ये कुछ तस्वीरें हैं ,आपके लिए लाया हूँ ,कहते हुए उसने रोहिणी के सामने एक लिफ़ाफा कर दिया। रोहिणी ने उस लिफाफे को खोला और उसमें से कुछ तस्वीरें निकालकर देखीं जो बेहद खूबसूरत नज़र आ रहीं थीं ये तस्वीरें आपने ही खींची हैं ,खुश होते हुए ,रोहिणी ने प्रशंसनीय नजरों से कल्पित की तरफ देखा मुस्कुराकर कल्पित ने हाँ में गर्दन हिलाई। बहुत सुंदर ! आप एक अच्छे कैमरामैन हैं, कौन सी तस्वीर किस एंगल से लेनी है ,उसकी खूबसूरती कैसे निखरकर आएगी ?आप बख़ूबी जानते हैं।
धन्यवाद ! आपको ये तस्वीरें पसंद आईं ,कहते हुए उसने, रोहिणी के बेटे की तस्वीरें उसे वापस दे दीं ,और बोला - मैं तो घबरा रहा था ,आप जैसी बड़ी कलाकार के सामने मैं तुच्छ सा प्राणी !
क्या कहा ?आपने ? रोहिणी ने जैसे सुना नहीं, ऐसा अभिनय किया या फिर उसके शब्दों को पुनः सुनना चाहती थी।
आप जैसी कलाकार !
आपसे किसने कहा ? मैं एक कलाकार हूँ ,गंभीर होते हुए उसने पूछा।
मैं तो नहीं जानता था किन्तु शायद कोई मुझसे कह रहा था - कि इस कोठी में एक बड़ी कलाकार रहती है ,मैंने सोचा, शायद वो, आप ही होंगी।
नहीं ,मैं कोई कलाकर नहीं हूँ ,जो इस कोठी की मालकिन हैं वो उनकी बेटी थी ,वो बहुत अच्छी चित्रकारी करती थी ,उसने ,उसके लिए ही कहा होगा।
क्या अब वो यहां नहीं हैं ,कहाँ गयीं हैं ?
मुझे नहीं मालूम !आप कुछ ज़्यादा ही पूछताछ नहीं कर रहे हैं।
जी क्षमा चाहता हूँ ,दरअसल मैं भी एक कलाकार हूँ ,मैं कैमरे से सुंदरता को कैद कर लेता हूँ ,और वे रंगों से चित्रों को कैनवास पर उतारती होंगी। कितना अच्छा लगता होगा ? जब उनकी कल्पना उनके कैनवास पर उभरती होगी। खुला आसमान ,स्वच्छंद परिंदे !और वो रंगों से खेलती हुई ,परिस्तान की सैर कर आती होंगी। ख़ैर !ये सब छोड़िये !आप क्या करती हैं ? क्या आप हाउसवाइफ हैं या कुछ और भी करती हैं,
अभी फिलहाल में कुछ भी नहीं करती, हताश होते हुए, निराशा से रोहिणी ने जवाब दिया।
वैसे आपको देखकर लगता नहीं कि आप कुछ नहीं करती होंगी ,आपके अंदर भी कुछ तो छुपा है ,जो इस चेहरे की मासूमियत के पीछे छिपा करवटें बदलता रहता है।
रोहिणी को लगा, कहीं ये मेरे विषय में कुछ जानना तो नहीं चाहता ,या फिर कोई भेदिया तो नहीं,, जो इस तरह मीठा बोलकर मुझे लुभाना चाहता है। उसने कल्पित की तरफ देखा और पूछा -आपको पहले तो कभी नहीं देखा ,आप कहाँ से आते हैं ?
उसकी बात सुनकर ,कल्पित मुस्कुराया और बोला - मैं नज़दीक में ही एक किराये के घर में रहता हूँ ,यहाँ इस शहर में नौकरी के सिलसिले में यहाँ आया था। मुझे बताना चाहिए था ,वैसे आपने भी कभी पूछा नहीं कहते हुए मुस्कुराया।
अब तो उनकी काफी अच्छी दोस्ती हो गयी , बच्चे को टहलाते हुए अनेक बातें करते ,एक दिन कल्पित ने रोहिणी को एक कार्ड दिया।
ये क्या है ? खोलकर देखो ! कहते हुए मुस्कुराया।
रोहिणी ने जैसे ही कार्ड खोला ,उसके हाथ काँपने लगे ,अरे तुम्हें क्या हुआ ? बताइये !क्या हुआ ?तुम कुछ परेशान लग रही हो। रोहिणी अपने को बहुत संभालने का प्रयास कर रही थी।कुछ नहीं ,कहते हुए उसने वो कार्ड धीरे से बंद करके वहीँ बेंच पर रख दिया।
क्या ये आपको पसंद नहीं आया ?आज'' दोस्ती का दिन'' था ,मैंने सोचा ,आपको देना चाहिए ,क्या मैंने कुछ गलत किया ,मैंने सोचा था ,अब तो हम लोग ,एक -दूसरे को अच्छे से जान गए हैं। दोस्ती का यह कार्ड तो बनता है।
बहुत अच्छा है किन्तु मैं तो आपके लिए कुछ नहीं लाई।
ये विचार तब आते हैं ,जब मन में पहले भाव उठते हैं ,आपने, मुझे अपना दोस्त समझा ही नहीं होगा।
नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है ,बस मुझे आज का दिन ही स्मरण नहीं रहा।
मैं तो मज़ाक कर रहा था ,आपको तो इस छोटू की सेवा में ही बहुत समय लग जाता होगा, कहते हुए कल्पित ने उसे गोद में उठा लिया। अच्छा भई छोटू महाशय सारा दिन अपनी सेवा करवाते रहते हो ,तुमने तो हमारी दोस्ती को भी भुलवा दिया। बात तो कल्पित रोहिणी के बच्चे से कर रहा था किन्तु उसके मन में अनेक विचार आ जा रहे थे ,कार्ड में ऐसा क्या देखकर ,रोहिणी घबरा गयी थी ?
अब तो उन्हें आपस में मिलते काफी समय भी हो गया था ,दोनों इधर -उधर की बातें तो करते किन्तु कभी घर -परिवार संबंधी कोई बातें न करते।
इसीलिए उसने एक दिन पूछ ही लिया -मैंने सुना है, इस बच्चे के पिता यहां नहीं रहते, क्या कहीं गए हैं ?
इस बात से रोहिणी भड़क गई, तुम्हें इस बात से क्या मतलब ? इसके पिता कहां रहते हैं ,क्या करते हैं, कहां जाते हैं ? मैंने आपको यह अधिकार नहीं दिया।
आप मेरी बात का बुरा मान गयीं ,मैं तो इसीलिए पूछ रहा था -कल को यदि वो, आपको लेने आ गए ,तो हमारा साथ छूट जायेगा। अब तो आप लोगों के पास आ जाता हूँ ,मेरा समय कट जाता है ,यहाँ ठीक से किसी को जानता भी नहीं हूँ।
कल्पित के इस तरह कहने से रोहिणी थोड़ा शांत हो गयी और बोली - मुझे क्षमा कीजिये !मैंने आपको गलत समझा और आपसे कुछ का कुछ बोल गयी ,दरअसल अभी मेरा मन थोड़ा परेशान रहता है इसीलिए सारा क्रोध आप पर निकाल दिया।
कोई बात नहीं ,जब हम किसी को अपना समझते हैं ,तभी उस पर गुस्सा हो या प्रेम निकालते हैं।
