भूमि अपनी पड़ोसन से पूछती है ,कोई कामवाली हो तो बताना !मेरी कामवाली रिश्तेदारी में चली गयी है।
जी, ऐसा ही होता है , जब घर में काम बढ़ जाता है, ये तभी छुट्टियां करती हैं ,सहानुभूति से पड़ोसन ने जबाब दिया।
अब मैं क्या बताऊँ ? मेरी वाली ही कभी -कभी आती है।
भूमि जो इस कहानी की सूत्रधार है ,वो समझ गयी थी ,ये नहीं चाहती कि इसकी कामवाली, मेरे यहाँ आकर काम करे ! कामवाली ढूंढते -ढूंढते, धीरे-धीरे एक दिन भूमि को पता चला, यहां आस-पास की लगभग सभी कोठियों में वो 'पगली 'ही काम करती है, किन्तु मैंने बहुत दिनों से उसे देखा नहीं था। समय भी बहुत हो गया था ,मैं तो उसे भूल ही चुकी थी। 'डूबते को जैसे, तिनके का सहारा ''मुझे एक उम्मीद की किरण नजर आई और मन में प्रसन्नता भी हुई ,चलो !उसे तो मैं जानती हूँ ,कई कोठियों में वही काम करती है किन्तु मुझे पता कैसे नहीं चला ?भूमि स्वयं ही आश्चर्यचकित थी।
मैं तो कई बार किट्टी में भी गयी हूँ ,तब भी उसे कभी नहीं देखा। ख़ैर ! वो कोई इतनी बड़ी हस्ती तो नहीं है ,जो लोग उसके विषय में चर्चा करें अथवा उसके लिए सोचें।
मेरी भी मजबूरी थी, त्यौहार नजदीक आ रहे हैं ,दीपावली पर साफ -सफाई ज्यादा हो जाती है और मुझे किसी के सहारे की आवश्यकता थी किन्तु अब घरवालों से भी ड़र लग रहा था। कहेंगे -'तुझे एक कामवाली तक नहीं मिली ,जो इसे बुला लिया। ''उसे कैसे बुलाऊँ ?यह भी एक प्रश्न था। किसी से कहती हूँ ,तो शायद उसे न भेजें। अभी यही जद्दोजहद चल रही थी ,तब एक दिन मैंने, उसे ही देख लिया ,वो सीधे कहीं जा रही थी ,तब मैंने उसे आवाज लगाई - ए ....इधर आओ ! उसने नहीं सुना ,तब मैंने दुबारा कहा -ए ,सुनो !कहते हुए हाथ के इशारे उसको बुलाया ,उसका नाम मालूम नहीं था ,'पगली 'उसे कह नहीं सकती थी ,अबकि बार उसने इधर -उधर देखा ,तब हाथ के इशारे से मैंने उसे नज़दीक आने का इशारा किया।
घर के नजदीक आकर उसने पूछा - क्या बात है ?
क्या तुम मेरे यहां काम करोगी ?भूमि ने उससे पूछा।
भूमि के इतना पूछते ही,वो बड़ी प्रसन्न हुई और बोली -तुमने मुझे कभी बुलाया ही नहीं, तुमने शब्द भी उसके मुंह से लग रहा था, तूने ! खैर मुझे क्या ? मुझे तो अपने काम से मतलब है ,दीपावली आ रही है, घर को साफ- सफाई की आवश्यकता है।तब मैंने हाथ के इशारे से उसे ऊपर बुलाया ,कुछ देर पश्चात वो ऊपर आ गयी।
आकर बोली -बाजी ! नमस्ते !
आओ ! क्या मेरे घर में काम करोगी ?
हाँ ,हाँ क्यों नहीं ?उसकी प्रसन्नता कुछ अधिक दिख रही थी।शायद एक नए घर में काम मिलने की प्रसन्नता थी। बाजी तूने [तुमने ]मुझे बुलाया ही नहीं ,मैंने तो तब भी कहा था, कोई काम करवा लो !
क्या तुम्हें याद है ? तुम मुझे पहचानती हो ,मैंने आश्चर्य से पूछा क्योंकि उस बात को कई बरस बीत चुके थे,तब मेरा नया -नया विवाह हुआ था ,मुझे लगता था ,इसे वो बातें कहाँ याद होंगी ?
हाँ ,मुझे सब याद है ,बताओ !कबसे काम पर आऊं ?
क्या, कल से आ सकती हो ?
हाँ ,मैं कल आ जाउंगी कहकर वो चली गयी।
देखने से वो अभी भी गंदी लग रही थी किन्तु मैंने सोचा, इतने घरों में साफ -सफाई का काम करती है ,गंदा होना तो स्वाभाविक है।मैंने घर में अभी किसी को कुछ नहीं बताया था ,डर भी था फिर सोचा ,जो होगा देखा जायेगा।
अगले दिन वो प्रातःकाल ही घर का दरवाजा खटखटा देती है ,इस समय कौन आ गया ?सोचते हुए ,सुदीप ने दरवाज़ा खोला ,सुदीप के दरवाजा खोलते ही वो मुस्कुराई और बोली -भइया ! नमस्ते !
उसको इस तरह घर के सामने खड़े देखकर वो चौंक गए और बोले -तुम.... यहाँ कैसे ?
आंटी !ने बुलाया है ,कहते हुए ,बिना किसी जबाब की प्रतीक्षा किये बग़ैर वो अंदर आ गयी ,सुदीप उसे खड़े देख रहे थे।
भूमि भी बाहर आई ,और उसने देखा ,वही लड़की काम के लिए आई है ,इतनी सुबह तो भूमि को भी उसके आने की उम्मीद नहीं थी ,उसने घड़ी में समय देखा ,अभी छह ही बजे हैं,तब भूमि ने उससे पूछा -तुम्हें मैंने इतनी सुबह तो नहीं बुलाया था। घड़ी में समय देखा है।
वो आंटी ! हिन्दुओं में तो सुबह ही साफ -सफाई होती है ,पूजा करते हैं ,आठ बजे दूसरे घर जाना है ,नौ बजे दूसरे कहते हुए ,पूछा -झाड़ू कहाँ है ?
मैंने उसे इशारा किया और कमरे में अंदर आई ,शायद इस परिस्थिति के लिए मैंने अपने को पहले से ही तैयार कर लिया था , उसे घर में देखकर, सुदीप का पारा चढ़ गया था,मुझे देखते ही बोले - क्या तुम्हें यही कामवाली मिली थी, तुम्हें और कोई काम वाली नहीं मिली ?
नहीं मिली , तभी तो उसे बुलाया है।
अब तुम ही भुगतना, वो झल्लाते हुए बोले और चुपचाप नहाने चले गए।
मैंने उससे कहा था - पहले मैं तुम्हारा काम देखूँगी ,तब तुम्हें काम पर लगाउंगी , मैं सोच रही थी, वह काम अच्छा नहीं करेगी तो मेरी बात भी रह जाएगी और पति की बात का मान भी रह जाएगा। मैंने उसे काम समझाया और अपने अन्य कार्य समेटने में व्यस्त हो गयी। उसने बहुत अच्छे से, और सफाई से कार्य किया। मैं खुश हो गई।
अब मेरी पहली कामवाली से उसके काम की तुलना करना स्वाभाविक था। मेरी पहले काम वाली जो थी , नजर बचते ही, जगह छोड़कर आगे बढ़ जाती थी। जब देखती थी, मैं काम में लगी हुई हूं तो कुछ जगह छोड़कर, अन्य जगह लग जाती थी और जब मैं पूछती थी -'यहां पर हो गया तो झूठ ही कह देती थी-' हां हो गया।'ये समस्या तो लगभग सभी के साथ रही होगी। उसकी सबसे बड़ी कमी तो यही थी , मेरे घर में कौन सा सामान कहां रखा है ? उसे सब पता होता था, और कोई भी सामान उसे मेरे घर में ज्यादा लगता ,या बचा हुआ दिखता ,तब कहती - मुझे दे दो !कई बार मना भी नहीं होता और कई बार इंकार करना पड़ता तब उसका चेहरा.... देखने लायक होता ,ऐसा लगता ,ये मुझे अभी भस्म कर देगी या काम की औपचारिकता पूरी करके किसी भी बहाने से शीघ्र निकल जाती।
उसे पता होना चाहिए मेरे घर में क्या है ,क्या नहीं ? ऐसा लगता था ,उसकी नजरें मेरे घर को स्कैन कर रहीं हों ,किंतु उसे रखना, मेरी मजबूरी भी थी किंतु मैंने उस लड़की की तरफ देखा, उसे काम पर तो लगा दिया किंतु मुझे डर था, कहीं यह चोरी न कर ले। पहले दिन उस पर चुपचाप नजर रखी, किंतु मैंने देखा ! उसे अपने काम से मतलब था किसी के घर में कहां क्या रखा है ?उसे इस बात से कोई मतलब नहीं था, इस मामले में वह मुझे , ईमानदार लगी। मैंने उसे चाय के साथ, बिस्किट देना उचित न समझ कर रोटी देना उचित समझा ताकि उसके पेट की भूख शांत हो।
जब वह काम करके चली गई, तब मैंने सुदीप से कहा -आपने देखा, उसने कितनी सफाई से काम किया है ?
शुरू में ही ऐसा कर रही है, सुदीप का जवाब था , एक दिन में ही खुश हो गईं , दो-चार दिन उसे आने तो दो ! तब तुम्हें पता चलेगा, वह कैसी है ? मैंने भी, जैसे ठान लिया था, अगर वह सही है तो मैं ,अपनी पहली वाली कामवाली को भी हटा दूंगी।
