मैं ! इक कहानी हूं .......
जीती -जागती, दर्द और ख़ुशियों की बानगी हूं।
उमंगों भरी , जीवन का कारवां, ले कर चली हूँ।
जहाँ संघर्षों की लहरें , भावनाओं का सैलाब है।
कहानी में ख़ुशियाँ और ख्वाहिशों की, 'ताल' है।
मैं जिंदा हूं, सोचती हूं, लड़ती हूं , अपने आपसे....
घबरा जाती हूं, इक पल ठहर ! उठ ! खड़ी होती हूं।
'मैं' हूँ ,सजीव ! दोस्तों की भी, दुश्मन बन जाती हूं।
जूझती समाज से, विचारती हूँ ,' विद्रोही' कहलाती हूं।
वो कहानी हूँ ,जो बढ़ती है ,उम्र सी बढ़ती ही जाती है।
क्षणभंगुर जीवन ने मुझे ,अपने आप से मिलवाया है।
तूफानी सागर के झोंकों ने सच से परिचय कराया है।
जीवन ने मेरी....मेरी कहानी को रोमांचक बनाया है।
कहना चाहती हूँ, चाहकर भी, समझा नहीं पाती हूँ।
तलबगार हूं ,अपनों संग ख़ामोश रह साथ चाहती हूं।
वो कहानी जो जमीं पर रह आस्मां की सैर कर आती हूं।
'स्नेह सागर' में गोते लगा ,स्वयं को भूल नहीं पाती हूं।
खो जाती हूं ,कभी ,कहीं , रिश्तों के गलियारों में...
धोखा, छल, कपट पाया सब अपनों की चाहतों में।
भूल जाती हूँ ,सब ! पाकर संग, अन्जानों के मेले में....
कभी निताँत हो ,कहाँ रिल गयी हूँ ?दुनिया के रेले में।
' जीवन सागर' में, खोजती हूं ,प्रीत का अमोल मोती !
ढूंढती रही ,तमाम उम्र ,सुकूं दे जो, वही दिव्य ज्योति !
भीतर अपने , इक प्रीत की ज्योति जगाई ,हरदम !
तूफानों के थपेड़ों से टिमटिमाई लौ बचाई ,हरदम।
उम्मीदों की उड़ान ले , पाँख बिन उड़ रही हूं मैं !
कभी न थकने वाली, ज़िद्दी उड़ान भर रही हूँ ,मैं !
उलझी कुछ सुलझी ,अनजानी राहों पर चल रही हूँ, मैं !
मंज़िल अभी दूर है ,उसे पाने की चाहत में बढ़ रही हूँ ,मैं !
कहानी जीवन की रची है ,इस इंद्रजाल [दुनिया ]ने,
जाने .... कितनी ज़िंदगानियों को कहानी बनाया है।
क़ुदरत ने सभी को, अपनी ही ,ताल पर नचाया है।
जीवन का ताना -बाना ,कहानी तक पहुंचाया है।
मौत ने जब भी ,अपना ताँडव दिखाया है।
अर्थ ,जीवन का तब जाकर समझ आया है।
टूटी स्वांसों में एक कहानी ने विश्राम पाया है।
'नवजीवन' में फिर एक नई कहानी ने जाल बिछाया है।
