Zeenat [part 2]

वो पगली सी दिखने वाली लड़की ,कई दिनों से भूखी थी। तब भूमि उसे भोजन देती है ,जब उसके पेट की भूख शांत हुई, तब वो मुस्कुराई और बोली - बाजी ! मैं तुम्हारे घर में कोई भी काम हो ,कर दूंगी। 

नहीं ,अब तुम यहाँ से जाओ ! मेरी सास आती ही होंगी। 

वे मुझसे नफ़रत करती हैं ,उसने मेरे चेहरे की तरफ देखते हुए पूछा। 

नहीं ,वो तुमसे नफ़रत क्यों करेंगी ? मैंने उसका मन बहलाते हुए उससे कहा किन्तु मैं जानती थी ,यहां किसी की भी राय उसके विषय में सही नहीं है।  


बाजी ! मैं सब जानती हूँ ,सभी लोग मुझे देखकर नाक -मुँह सिकोड़ते हैं,तुम्हारी सास भी ऐसी ही है ,तुम्हें जब भी मुझसे कोई काम करवाना हो तो करवा लेना। 

हाँ ठीक है ,अब तुम जाओ ! अब उसके चेहरे पर मुस्कान थी ,उसकी क्षुब्धा जो शांत हो चुकी थी ,यह देखकर मुझे भी अच्छा लगा, वो चुपचाप वहां से चली गयी।

उसकी  वेशभूषा देखकर, कोई भी उसे देखकर यही कहता - यह पागल है, गंदी रहती है। तब मेरे मन में प्रश्न उठता, यदि वह इतनी ही गंदी है और जब रात्रि में ,जिन लोगों के साथ यह होती है तो क्या उन्हें, इससे नफरत नहीं होती ? उनका इसे छूने को, मन कैसे कर जाता है ? भूमि उन लोगों के लिए सोचती -कैसे लोग हैं ? एक पागल लड़की को भी नहीं छोड़ते।

 वो अब मुझे देख मुस्कुराती और जब भी मौका मिलता ,पूछती -कोई काम हो तो बताना। 

भूमि को भी जब भी मौका मिलता ,उसे खाने को हल्का -फुल्का दे देती थी। खैर कुछ दिनों पश्चात, उसने उस घर का काम छोड़ दिया, कारण क्या रहा ? न ही मुझे किसी ने बताया और न ही मैंने  किसी से पूछा। 

इस बात को बरसों हो गये, भूमि भी अब उस परिवार में रहकर ,उन लोगों में घुलमिल चुकी थी और उसके  बच्चे भी हो गए। अपनी घर -गृहस्थी में फंसकर भूमि भी उसके विषय में भूल गयी थी। उसे याद भी क्यों करना था ?उसमें कोई विश्ष्टि बात तो नहीं थी।

अब भूमि का परिवार बढ़ रहा था ,घर भी बनाया गया था। अब भूमि अपने बच्चों के साथ ऊपर रहने लगी थी ,सास -ससुर नीचे ही रहते थे किन्तु भूमि नीचे  रहना नहीं चाहती थी क्योंकि कभी -कभी उस कालोनी की सड़कें इतनी सुनसान हो जातीं ,कोई दिखलाई नहीं देता। तब भूमि को जैसे घबराहट सी होती। सभी अपने -अपने घरों में जैसे कैद होकर रह गए थे। तब भूमि को लगा ,कम से कम छत से कोई आता -जाता दिख तो जाता है और बच्चों के पढ़ने के लिए भी उसने कमरा ऊपर ही बनवा लिया था। 

सर्दियों के दिन थे , मौसम बहुत ही ठंडा था ,कोहरे की चादर में लिपटी सुबह ,जब लोग अपने घरों में बैठे चाय -नाश्ते का आनंद ले रहे होंगे। तब बाहर एक महिला के तेज चिल्लाने का स्वर सुनाई देता है। भूमि रसोईघर में थी ,वो भी अपने परिवार के लिए नाश्ता बना थी।

 बाहर से आवाज आ रही थी -'' है कोई, जो इस गरीब को कुछ दे दे ! इस भूखे को कुछ खाने को दे दे। ''भूमि बाहर जाना चाहती थी किन्तु पति का स्वर सुनकर,उसके कदम वहीं ठिठक गये - चाय बन गयी। 

अभी लाई, कहकर भूमि वापस रसोईघर में जाकर अपने कार्य में व्यस्त हो गयी। अगले दिन फिर से उसी महिला के चिल्लाने का स्वर उसके कानो में पड़ा ,आज वह बाहर आई और उसने देखा ,एक महिला एक लकड़ी की गाड़ी को खींच रही है ,जिसमें शायद उसका पति बैठा था। उसके पास एक थैला था, न जाने उसमें क्या था ? वो भूमि को देखकर जोर -जोर से बोलने लगी -है ,कोई जो इस ठंड में ओढ़ने या पहनने को कोई कपड़ा दे दे ! 

भूमि ने अपने घर के छज्ज़े से पूछा -कुछ खाओगी !

इस ठंड में कोई कपड़ा मिल जाता तो.... कोई कंबल !

भूमि ने देखा ,वो महिला स्वयं एक पुरानी फटी सी साड़ी में थी और उसके ठेले पर जो बैठा था ,उसने एक फटा सा कंबल ओढ़ा हुआ था। भूमि ने जो स्वेटर पहना हुआ था ,उसे उतारकर उस महिला को दे दिया और उससे कहा -कल आ जाना ,और कपड़े दे दूंगी, वो उसे दुआएं देती हुई चली गयी किन्तु उसने वो स्वेटर नहीं पहना। भूमि ने ,सोचा कोई बात नहीं, आगे जाकर पहन लेगी। 

अगले दिन जब भूमि ने देखा ,कि उसी हालत में वो महिला ,अभी भी उसी तरह चिल्ला रही थी, उसने वो स्वेटर नहीं पहना था। यह देखकर भूमि को उस पर क्रोध आया और उसने पूछा -तुम्हें कल जो स्वेटर दिया था ,वो क्यों नहीं पहना ?तब वो चुप होकर आगे बढ़ गयी। उसके व्यवहार से लग रहा था, जैसे कह रही हो ,कुछ देना हो तो दो ! वरना भाषण मत दो ! 

ऐसे समय में ,भूमि को दुःख हुआ और उसे लगा ,मैंने इसकी सहायता करके गलती कर दी है। यह सब उसके पति ने भी देखा और बोले -तुम ,इतनी ज्यादा परेशान क्यों हो रही हो ?

मैं इसीलिए परेशान हूँ ,ठंड में मैंने इनकी सहायता करनी चाही किन्तु ये तो अभी भी ऐसे ही घूम रहे हैं। 

ये इन लोगों का धंधा है ,ये इस तरह कपड़े पहन लेंगे तो, इन पर किसी को दया कैसे आएगी ?तुम क्या समझती हो ? न जाने कितनी दूर से ये लोग घूमते हुए आये हैं ? क्या किसी ने भी इनकी सहायता नहीं की होगी ? ये सामान इकट्ठा करते हैं और उसे बेच देते हैं। इन्हें  इस तरह रहने की आदत हो गयी है। ऐसे लोगों के कारण ही तो लोग, अब जो सही में जरूरतमंद हैं ,उनकी सहायता भी नहीं कर पाते हैं।तब वो  एक किस्सा सुनाने लगे -''यहाँ एक गरीब परिवार रहता है ,तीन बहन -भाई हैं। क्या लोग उनकी सहायता नहीं करते हैं ?कुछ लोग इस ओर ध्यान नहीं देते हैं किन्तु उससे ज्यादा हाथ उनकी सहायता के लिए आगे बढ़ते हैं ,वो फिर भी ऐसे ही रहते हैं। 

ऐसा क्यों ? भूमि ने पूछा। 

क्योंकि वे उस पैसे की कीमत नहीं समझते ,न ही, उन्हें पैसे से कोई मतलब है ,कोई खाने को देता है ,खा लेते हैं। पहनने को कोई पुराना वस्त्र देता है ,पहन लेते हैं ,जब तक वो फट न जाये। 

किन्तु यदि किसी ने उन्हें पैसे दिए तो.... उनका क्या करते हैं ?उनसे भी तो सामान इत्यादि ला सकते हैं। 

कुछ नहीं करते ,उस पैसे को दीवार की झिरकियों में ,कहीं आले  में ,कहीं भी खोंसकर रख देते हैं। उन्हें उस पैसे कोई मतलब नहीं ,पैसा होगा, किन्तु सामान नहीं लाएंगे। इन्हें ऐसे ही रहने की आदत जो बन चुकी है। मन ही मन भूमि सोच रही थी। इनसे अच्छी तो वो' पगली' ही थी ,जो रोटी के बदले काम करना चाहती थी। न जाने बेचारी अब कहाँ होगी ? 

उस दिन के पश्चात वो महिला उधर भीख मांगने नहीं आई ,अब मौसम भी ठीक सा होने लगा था ,तब एक दिन भूमि को वही महिला दिखलाई दी ,उसने कंधे पर एक थैला टाँग रखा था। वो शायद भूल गयी थी या सोचा हो ,मैं भूल गयी होंगी ,वो मेरे घर के दरवाजे पर खड़ी होकर बोली - कुछ गेहूं ,खाने -पीने का सामान हो तो दे दो !

भूमि को उसे देखते ही ताव आ गया और उससे बोली - काम करोगी। 

भूमि के इतना कहते ही,पहले तो वो खिसिया गयी फिर पूछा -कैसा काम ?

क्या कर सकती हो ?भूमि के पूछने पर भी उसने कोई जबाब नहीं दिया ,उसे जैसे गुस्सा आया और बोली -कुछ दे दो !

दे तो रही हूँ, काम ! हट्टी -कट्टी हो ,काम तो कर ही सकती हो ,झाड़ू -पोंछा करोगी ,इतना सुनते ही वो मुख्य द्वार से उतरकर चली गयी किन्तु काम नहीं माँगा। 

पास में खड़ी ये सब पड़ोसन देख रही थी ,भूमि से बोली -तुम भी क्या बात करती हो ?किसी को भी अपने घर में घुसा लोगी। ये चोर भी हो सकती है। 

मैं जानती हूँ ,वो काम ही नहीं करती ,उसे भीख जो मांगनी है। 

यदि वो कह देती ,लाइए करती हूँ ,तब तुम क्या करतीं ?

तब उससे बगीचे की सफाई ,घर की छत ,गैलरी बाहर का ही काम करवा लेती किन्तु मुझे पता था ,ये कार्य नहीं करती विश्वास से भूमि ने जबाब दिया। वैसे आपकी नज़र में कोई कामवाली हो तो बताना ,मेरी कामवाली चली गयी है ,उसके यहाँ रिश्तेदारी में  किसी का विवाह है। वैसे उसका ये सब बहाना है ,जब त्यौहार या फिर कोई मेहमान आते हैं, ये ऐसे ही, गायब हो जाती है। 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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