रूही हवेली के पिछले द्वार पर खड़े किसी बुजुर्ग़ को देखती है और उनसे बात भी करना चाहती है ,किन्तु उस बुजुर्ग़ व्यक्ति ने, न ही उसे अपना परिचय दिया ,बल्कि ऐसा लग रहा था ,जैसे वो रूही के आने का उद्देश्य समझ गए हैं। वो बुजुर्ग, रूही के लिए एक पहेली बनकर चले गए थे , वह समझ गई थी कि ये अवश्य ही इस हवेली के विषय में कुछ तो जानते हैं। ये कौन हो सकते हैं ?
पिछले रास्ते से ही हवेली के लोगों से नजरें बचाते हुए ,रूही फिर से हवेली में प्रवेश कर गई , लेकिन वह बुजुर्ग उसके दिमाग में साये की तरह घूमते रहे , जब भी गर्वित उसके कमरे में आता, वह उदास होकर इस तरह बैठ जाती, जैसे उसे भी गौरव के जाने का बहुत दुख है। धीरे-धीरे घर के लोगों ने यह स्वीकार कर ही लिया कि गौरव अब इस दुनिया में नहीं रहा। उसकी मौत के पश्चात से ही घर कितना सूना हो गया ? कब तक लोग उसकी मौत का मातम मनाते ?'मानव प्रवृति यही है ,सब कुछ भुला आगे बढ़ जाना है।'
समय फिर से अपने ढ़र्रे पर चलने लगा। अब तो रूही ने वैसे ही गर्वित को समझा दिया था , भाई की मौत पर हम कैसे' सुहागरात' मना सकते हैं ? यह देखकर उसकी आत्मा को भी कष्ट होगा।
एक दिन गर्वित, रूही से बोला -मैं कुछ दिनों के लिए बाहर घूम आता हूं अब इस हवेली में मेरा मन नहीं लगता, बार-बार मुझे गौरव की याद आती है।मैं यही सोचकर परेशां हूँ आख़िर मेरी उससे लड़ाई हुई ही क्यों थी ?
इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है ,उसने हालात ही ऐसे पैदा कर दिए थे, उसने तुम्हारी पत्नी का अपमान किया ,साथ ही तुम्हें भी नामर्द बताया,मैं तो देवर होने के नाते उससे बातें करने लगी थी किन्तु उसने तो मुझे कुछ और ही समझ लिया किन्तु तुरंत ही बात को संभालते हुए बोली - किन्तु फिर भी वो तुम्हारा भाई था ,घर -परिवार में इस तरह के झगड़े तो हो ही जाते हैं ,हमें क्या मालूम था ?वो हमसे रूठकर इतनी दूर चला जायेगा, रूही के इस तरह कहने पर गर्वित रोने लगा। रूही ने उससे कहा- हाँ , तुम्हें कुछ दिनों के लिए बाहर घूमने जाना चाहिए, तुम्हारा मन भी बदल जाएगा।
तुम सही कह रही हो ,तुम भी मेरे साथ चलो !अपने साथ के लिए रूही से बोला।
ये आप कैसी बातें कर रहे हैं ?यदि मैं भी आपके साथ गयी तो घरवालों को लगेगा ,हम लोग मस्ती करने 'हनीमून 'मनाने जा रहे हैं। हमें, तुम्हारे भाई के जाने का दुःख नहीं है ,मम्मी जी की तो सोचिये !उनको कितना बुरा लगेगा ? अभी उनका जवान बेटा गया है और हम मौज -मस्ती करने चले जायें ,नहीं मुझसे यह सब नहीं होगा और पीछे लोगों के ताने सुनने को मिलेंगे सो अलग...
तुम सही कह रही हो ,मैं अकेला ही चला जाता हूँ ,तुम अपना ख्याल रखना।
रखना ही होगा ,अपने साथ -साथ इस परिवार के लोगों का भी ध्यान रखना होगा ,देखो !सभी की हालत कैसी हो गयी है ?यदि मुझे तुम्हारी याद आई तो तुम्हें फोन करूंगी ,हमारा विवाह भी न जाने किस घड़ी में हुआ है ?एक बार भी हम सुकून से नहीं रह पाए।
इसमें तुम्हारी भी क्या गलती है ?हालात ही ऐसे बनते चले गए ,अब आगे के लिए अच्छा सोचना चाहिए ,जो भी होगा अच्छा ही होगा।
दमयंती मन ही मन, अपने अंदर घुटी हुई सी बैठी थी, मन ही मन सोच रही थी-' यह मेरे बच्चों के साथ क्या हो रहा है ?जो भी लड़की आती है। मेरे एक बेटे की मौत साथ लेकर आती है। तेजस तो कोरोना का शिकार हुआ था ,वो भी उस शिखा के कारण उससे कितना मना किया था ? विवाह को टाल देते हैं किन्तु उसने मेरी एक नहीं मानी। अब अचानक दोनों भाइयों में झगड़ा होना और अगले ही दिन उसका कॉफी पीकर मर जाना ,क्या यह मौत सामान्य थी ? कुछ भी समझ नहीं आ रहा किंतु अंदर ही अंदर वह रूही पर नजर रखने लगी थी। उसे न जाने क्यों लग रहा था ? इस लड़की में भी कोई गड़बड़ है।
जबकि रूही, उसका पहले से अधिक ख्याल रखने लगी थी। समय पर उसके लिए भोजन देना। उसकी दवाई का ख्याल रखना। हालाँकि दमयंती उसके हाथ से दवाई नहीं लेती थी, किंतु नियत समय पर रूही उसे, दवाई के लिए कह देती थी, सभी को लग रहा था, इसने कितने अच्छे तरीके से इस परिवार को अपना लिया है ?चारों भाई-' जगत सिंह , हरिराम ,बलवंत सिंह और ज्वालासिंह सभी रूही के व्यवहार से प्रसन्न थे और दमयंती से कह रहे थे -अब तो इस हवेली की चाबियाँ अपनी बहु को दे दो !देखो उसने कितने अच्छे तरीके से इस घर को संभाल लिया है ?
अभी तो इसने ,मेरे बेटे को भी नहीं अपनाया और मैं इसे हवेली की चाबियाँ सौंप दूँ !यह मेरा कार्य है ,मैं अपने आप संभाल लूंगी ,किसको ,कब और क्या देना है ?यह मेरा निर्णय होगा।
गर्वित तैयार होकर अपनी मां के पास जाता है और माँ से कहता है -मैं कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा हूं।
अब तू कहां चल दिया ?परेशान होकर उन्होंने पूछा - एक तो गया है , उसके बिना घर कितना सूना- सूना लगता है ,तू चला गया तो....
तो क्या ?सुमित -पुनीत तो हैं ,दमयंती की बात बीच में ही काटकर गर्वित ने पूरी की और बोला -आप परेशान मत होइए ! मन थोड़ा परेशान है,कुछ दिनों के पश्चात वापस आ जाऊंगा। एक नहीं, मेरे दो भाई चले गए हैं , मेरा अब इस हवेली में मन नहीं लगता , कुछ दिनों के लिए बाहर घूम कर आता हूं, हो सकता है, मन बदल जाए।
क्या तू बहू को भी साथ लेकर जाएगा ?
नहीं, उसे अपने साथ लेकर नहीं जाऊंगा, मैं अकेला ही जा रहा हूं।
यह बात सुनकर दमयंती को अच्छा भी लगा किंतु फिर भी उसने पूछा -तू रूही को साथ लेकर क्यों नहीं जा रहा है, क्या उसे बुरा नहीं लगेगा ?
उसी ने तो कहा है, कि मैं यहां पर रहकर परिवार के लोगों का ख्याल रखूंगी, मुझे तो यह बात दिमाग में ही नहीं आई थी। गर्वित के इतना कहते ही दमयंती का माथा ठनका ,नई ब्याहता बहु है , उसे तो कहना चाहिए ,'मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी किन्तु ये तो अपने पति को स्वयं ही बाहर भेज रही है ,कहीं गर्वित को अपने से दूर भेजने की इसकी कोई चाल तो नहीं किन्तु बेटे से कुछ नहीं कहा और बोलीं -अपना ख्याल रखना समय -समय पर फोन करते रहना।
रूही के व्यवहार से उसके समय पर कार्य करने से, सब चीजें अच्छी तो थी लेकिन न जाने क्यों दमयंती रूही पर विश्वास नहीं कर पा रही थी। गर्वित के चले जाने के पश्चात, एक दिन रूही हवेली में टहलती है, वो शिखा बनकर भी इस हवेली को ठीक से नहीं देख पाई थी। अब जैसे सारे घर की बागडोर उसके हाथों में आ गई थी ? क्योंकि घर से गौरव के चले जाने के पश्चात, दमयंती अभी ठीक से उस घर की बागडोर ठीक से नहीं संभाल पा रही थीं या ये कहें बहु के आने पर निश्चिंत हो गयी थीं ।
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