भूमि, एक पारिवारिक लड़की है , वैसे तो वह पढ़ी-लिखी है किंतु उसके परिवार में, लड़कियों को ज्यादा बाहर घूमने नहीं दिया जाता था। अपने परिवार के संस्कारों में पली बढ़ी, वह एक भावुक नारी है , जो विवाह करके ससुराल में आ गई है और ससुराल में भी, उसका किरदार वही एक 'आदर्श बहू' का बनकर रह गया है। शीघ्र ही लोगों पर विश्वास कर लेती है। वह कहते हैं न.... जब वो स्वयं अच्छी है, तो अन्य लोगों में भी,उसे अच्छाई ही नज़र आती है।
आजकल वह अपनी कामवाली 'ज़ीनत ' के लिए थोड़ा परेशान रहती है ,क्योंकि वह मानती है , यह कोई 'पागल' नहीं है , इस समाज ने या उसके वातावरण ने उसको पागल बनने पर मजबूर किया है उसकी सोच तो यही है ,अब हम तो उसकी सोच बदल नहीं सकते। हो सकता है, समय के साथ उसकी सोच बदल जाए, क्योकिं'' समय और अनुभव दोनों ही सबसे बड़े' शिक्षक'का कार्य करते हैं। '
इसलिए आगे बढ़ते हैं - तीन दिनों तक 'ज़ीनत 'काम पर नहीं आई थी। तब जब वह तीसरे दिन आई तो काम करने के पश्चात तीन -चार बजे के क़रीब दुबारा आ गयी। भूमि ने तो उसे बुलाया भी नहीं था ,आई है ,तो वहीं बैठ गयी और काम करते हुए भूमि को देखने लगी। तब भूमि ने उससे पूछा -तुमने डॉक्टर को दिखाया था, डॉक्टर ने क्या कहा ? तुम्हारी छाती और पेट में क्यों दर्द था ? उसने कुछ कारण बताया।
यह सुनकर,'ज़ीनत ' थोड़ा चुप हो गई और बोली -डॉक्टर ने कहा है -' कि तुमने गलत किया है।'
भूमि को कुछ भी समझ नहीं आया कि उसका इशारा किस ओर था, तब वह बोली -छाती में दर्द इसलिए है क्योंकि मेरी छाती को दबाते थे।
भूमि अपने कार्य में व्यस्त थी ,उसकी यह बात सुनकर वह अपना काम रोक कर उसकी तरफ देखने लगी और पूछा - कौन दबाते थे ? क्या डाक्टर ने किया ?क्योंकि उसके शब्द ही ऐसे थे, उसे समझ नहीं आये। हाँ ,इतना अवश्य समझ गयी कि किसी ने इसे छेड़ा है ,तब उसने पूछा -क्या तुम्हारे साथ किसी ने जबरदस्ती की है ?
नहीं,
तो फिर.... तुम क्या कह रही हो ? उसको कुछ समझ नहीं आया।
आंटी तुम समझती भी नहीं हो, मेरी छाती को दबाते थे ,उसने अपने सीने पर हाथ रखते हुए कहा।
कौन दबाते थे ? आश्चर्य से भूमि ने पूछा।
जिनके यहां मैं काम करती थी, शायद वह किसी का नाम लेने में हिचकिचा रही थी।
काम तो तुम कई घरों में करती हो, ऐसा कार्य किसने किया ?
आंटी ! तभी तो मुझे गुस्सा आता है , जब मैं काम करती हूं, पोछा लगाती हूं , तो उसका पति, उसका बेटा, मेरे पीछे घूमते रहते हैं, मुझ पर नजर रखते थे ।
इसमें तो कोई बुराई नहीं है, वह यह देखते होंगे, कि तुम काम ठीक से कर रही हो या नहीं।
नहीं, ऐसा नहीं है, उनकी गलत नजर थी।
यह कार्य, तुम्हारे साथ किसने किया ? भूमि की जिज्ञासा बढ़ गई कि यहां तो कोई ऐसा हो ही नहीं सकता उसके मन में ऐसा विश्वास था।
तब वह बोली - जिसने मेरे डंडे बजाए ,खन्ना ! वो तगड़ा पहलवान सा आदमी ही तो करता था।
क्या ??
यह तू क्या कह रही है ? उसकी बात सुनकर, भूमिका का दिल घबराने लगा , उसे लगा -'यह झूठ बोल रही है , उसने उस दिन 'ज़ीनत'को ध्यान से देखा , भला इसे कोई, कैसे छू सकता है ? कई बार तो नहा कर भी नहीं आती , देखने में भी इतनी अच्छी नहीं लगती है , फिर इसमें ऐसा क्या है ?जो खन्ना का दिल डोल गया। वह तो अच्छे परिवार से हैं , तीन पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं। उनकी तो एक खूबसूरत बीवी भी है , भूमि को तो जैसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ और वह जीनत से बोली - तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, उसकी तो इतनी सुंदर बीवी है, वह भला तुम्हें क्यों छेड़ेगा ?
नहीं, आंटी मैं सच बोल रही हूं , तुम्हारे यहां से उन्हीं के घर जाती थी,तभी वो 9:00 बजे नहाने जाता था , और उससे पहले मेरे साथ होता था।मैंने तुमसे कई बार बताया था ,वो मेरे जाने पर ही नहाता था ,तुम समझी नहीं .....
उसकी बातें सुनकर भूमि का जैसे दम घुटने लगा, उसने एक गहरी लंबी सांस ली, और उससे कहा -तू अभी चुपचाप बैठ जा !!!
किंतु वह चुपचाप नहीं बैठी और बोली -इसलिए तो मुझे गुस्सा आता था, वह मुझे छेड़ता था, मुझे परेशानी होती थी, जिसके कारण मुझे दर्द बढ़ गया, और कमर में भी दर्द होने लगा, डॉक्टर ने यही बताया। मुझे लगता है, अब उसकी पत्नी बुढ़िया हो गई है , उससे इजाजत लेकर ही तो मेरे साथ हरक़त बाजी करता था।
उस परिवार की, तस्वीर मेरी नजरों के सामने घूमने लगी, ऐसा कैसे हो सकता है ? कोई इसे, कैसे छू सकता है ? पतिदेव ने बताया तो था कि 'ज़ीनत 'सही नहीं है किन्तु जिस व्यक्ति का यह नाम ले रही है , यह तो एक सभ्य परिवार से है। ये लोग मान -सम्मान के साथ रहते हैं ,यदि इनमें से कोई भी ऐसा होता तो क्या मोहल्ले में किसी को पता नहीं होता और पता चलने पर ऐसे लोगों का बहिष्कार कर दिया जाता है।कहीं ऐसा तो नहीं ,उसके पीटने का कारण भी यही रहा हो ,जब इसे दर्द हुआ होगा और गुस्सा आया होगा ,और ये चिल्लाई होगी। तब उसने, इसे पीटा होगा ताकि ये किसी के सामने अपनी ज़बान न खोल दे !
कोई इनके विषय में ऐसा सोच भी कैसे सकता है ? मुझे विश्वास नहीं हो रहा है। क्या मुझे किसी से पूछना चाहिए ? मन बेचैन होने लगा , क्या करूं ? पति से कहा या पूछा -तो वो मुझे ही डांट देंगे ,तुम इसके साथ इस तरह की बातें करती हो। तुमसे, मैंने पहले ही मना किया था ,इसे काम पर मत रखो ! अच्छा है ,आज वे, यहां नहीं है। वो तो इसे भगा ही देंगे। मेरे पापा भी होते तो.... ऐसा ही करते किन्तु इसकी भी बात कोई सुनेगा या नहीं। ये औरत है ,या फिर ये ग़रीब है ',पागल' की पदवी तो इसे पहले से ही मिली हुई है। किसी को इसकी बात भी तो सुननी चाहिए।
दामाद -ससुर दोनों ही एक जैसे हैं ,पापा को पता चला ,कोई ऐसी लड़की मेरे घर काम पर आती है ,तो मुझे पक्का -पक्का उनके क्रोध का भाजन बनना पड़ेगा।
किन्तु इसमें इसकी क्या गलती है ?गलत तो वो इंसान है, जिसने, इसे ऐसी हालत में भी छेड़ा होगा। छेड़ा तो अवश्य होगा वरना इसको इतनी परेशानी नहीं होती ,बेचारी !को दवाइयां खानी पड़ रहीं हैं फिर मुझे क्या करना चाहिए तभी मिसेज गुप्ता का स्मरण हो आया।
वह जानती है, मिसेज गुप्ता जैसे सभी के घरों पर, रिश्तों पर नजर रखती हैं। उसी प्रकार' स्पष्ट वक्ता' भी हैं ,वो अवश्य ही ,मेरे प्रश्नों का जवाब देंगी, किंतु यह तो मोहल्ले की बात है। क्या मुझे यह बात उनसे पूछनी चाहिए ?
कहीं यह [ज़ीनत ] उन पर इल्जाम तो नहीं लगा रही, क्योंकि उन्होंने ही इसे पीटा था। वह लोग तो हमसे पहले, यहां रहते आए हैं। हम लोग तो बाद में आए हैं। यह अवश्य ही उनके विषय में कुछ ना कुछ तो जानती ही होगीं किंतु यह मामला और इल्जाम साधारण नहीं है।
ये मैं कहाँ फंस गयी ?क्या सही है ,क्या गलत ?कुछ समझ नहीं आ रहा था। मेरा नाम भी तो आ सकता है। हो सकता है ,यही झूठ बोल रही हो क्योंकि ये उस दिन अपने कपड़े धोने के लिए सर्फ लाई थी और इसने मुझसे बताया था -बहुत दूर से सर्फ़ लाई हूँ, किसी ने दिया है ,किंतु जब बात मेरी सास के सामने आई तो उन्होंने बताया-' यह तो मुझसे ही मांगकर ले गयी थी । '
और जब मैंने इससे पूछा था -इसमें झूठ बोलने की क्या आवश्यकता थी ?कह देती -आपकी सास से लाई हूँ ,मैं क्या मना कर देती ?''
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