Mysterious nights [part 163]

दमयंती को अभी भी किसी पर विश्वास नहीं था इसीलिए अपने कमरे में बैठी हुई ,कैमरे में से देख रही थी,उन्होंने देखा, अभी कुछ देर पहले ही रूही, हवेली के पश्चिमी हिस्से की तरफ से आ रही थी। उधर की तरफ कैमरा नहीं लगा था ,उधर कम ही लोग जाते थे किन्तु उस तरफ के रास्ते पर कैमरा अवश्य था। दमयंती थोड़ी मानसिक रूप से परेशान तो थी,हो भी क्यों न... जिसका जवान बेटा, उसकी नजरों के सामने हँसते -खेलते चला गया,उस मां का क्या हाल होगा ?यह तो एक माँ ही समझ सकती है। इसी  कारण दमयंती का शरीर भी थोड़ा कमजोर पड़ गया था किंतु अभी भी, उसकी नज़रें ,हवेली पर नजर रखती थीं। 


 उसके कमरे में, कैमरा जो लगा हुआ था। उसके कारण वो हर आते -जाते पर नजर रख रही थीं ।वैसे यह कैमरा उन्होंने नौकरों पर नजर रखने के लिए लगवाया था। तभी रूही को भी यह बात स्मरण हो आई, उसने सोचा, इससे पहले कि दमयंती को मुझ पर शक हो, वह स्वयं ही, दमयंती के पास गई  और बोली - मम्मी जी ! आपको कोई परेशानी तो नहीं है। किसी चीज की इच्छा हो तो मुझे बताइएगा ! अब गर्वित तो चले गए हैं। मैं यहां पर अकेली हूं, वैसे मैं अपने को काम में व्यस्त रखने का प्रयास करती हूँ ,किन्तु कई बार मन नहीं लगता। हवेली उदास सी महसूस होती है ,इसीलिए मैंने सोचा ,यहाँ आये हुए कई दिन हो गए,क्यों न हवेली ही देख ली जाये।

अच्छा किया ,तुम्हें देखना भी चाहिए ,अब हवेली की मालकिन तुम ही बनोगी ,इसके विषय में तुम्हें पता होना चाहिए ,उन्होंने इस तरीके से कहा ,रूही समझ नहीं पा रही थी, वो नाराज़गी में कह रही हैं ,या फिर ऐसे ही...  

तभी तो... मैं  हवेली को देखने के लिए, इधर-उधर टहल रही थी। तब मैंने वहां पर एक कमरा देखा , किंतु वह कमरा बंद था। मम्मी जी ! वह कमरा किसका है ?क्या उस कमरे में कोई नहीं रहता, शब्दों में शहद घोलते हुए बोली -यदि वह कमरा खाली है, आप कहें तो मैं, उस कमरे में अपना सामान रख लूं। 

क्यों ? क्या इतनी बड़ी हवेली में तुम्हें ,वही कमरा दिखलाई दिया,अभी तक वे उसकी बातें आँखें मूंदकर सुन रहीं थीं किन्तु रूही के इतना कहते ही उन्होंने आँखें खोलकर उससे पूछा।  

नहीं ,कमरे तो और भी हैं, किंतु वह काफी अच्छा लग रहा था, अंदर से तो मैं, उसे नहीं देख पाई ,बाहर से ही देखा, वहां का वातावरण भी काफी शांतिपूर्ण लग रहा था। रूही चाहती थी, दमयंती स्वयं ही कहे ! कि वह कमरा तुम्हारे दादाजी का है, इसी उम्मीद से वह दमयंती की तरफ देख रही थी। 

तुम ठीक समझीं , दमयंती जी ने बराबर में रखें पानी को गिलास में किया और पानी पीते हुए बोलीं  -वह कमरा गर्वित के दादाजी का है,उनके बोलने से लग रहा था जैसे उन को ये बात, बताते हुए जोर पड़ रहा है।  

अब दादाजी कहां है ? मैंने तो उन्हें अभी तक कहीं भी नहीं देखा। 

वो यहां पर नहीं हैं ,तीर्थ के लिए गए हुए हैं ,उन्होंने सहजता से जबाब दिया ,जैसे उन्होंने पहले ही सोचकर रखा हुआ था कि यदि ये बात सामने आती है तो क्या जबाब देना है ? 

कब तक आ जायेगें ? तुरंत ही रूही ने प्रश्न किया। 

जब आएं ,उनसे तभी मिल लेना,शायद वे उसके और प्रश्नों का जबाब देना नहीं चाहती थीं।  

क्या दादीजी भी उनके साथ गयीं हैं ? बातों को ज्यादा न घुमाते हुए उसने सीधे -सीधे प्रश्न किया। 

तुम दादा -दादी में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखला रही हो ? उन्होंने रूही के चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए उससे पूछा।उनके चेहरे से लग रहा था ,वो इस बात को यहीं समाप्त कर देना चाहती थीं।  

दरअसल बात यह है ,मेरे दादा -दादी तो बचपन में ही चल बसे थे ,मेरे पास उनकी कोई यादें नहीं हैं इसीलिए जब पता चला कि गर्वित के दादा जी ,जिन्दा हैं, तो मन में ख़ुशी हुई। हो सकता है, हमारे जीवन में इसीलिए परेशानियां आ रही हैं। हमें उनका आशीर्वाद जो नहीं मिला है। जब हमें उनका आशीर्वाद मिल जाएगा तो हमारी परेशानियां भी शायद समाप्त हो जाएंगी  और यदि तीर्थ भ्रमण के लिए गए हैं फिर तो उनके आशीर्वाद में और भी शक्ति होगी,'भक्ति की शक्ति' कहकर वो मुस्कुराई किन्तु दमयंती जी का चेहरा कठोर हो गया।  

दमयंती ने रूही की बात ध्यान से सुना और बोली - दादी ! तो अब जिंदा नहीं रही हैं  किंतु दादाजी न जाने कहां हैं ? उनसे हमारा कोई संपर्क भी नहीं हो पाता है क्योंकि उन्होंने अपना जीवन पूजा- पाठ में व्यतीत करने का निर्णय लिया है इसीलिए हमें नहीं पता, कि वो कब आएंगे ?

दमयंती की बात सुनकर, रूही ने उदास होने का अभिनय किया और बोली -अपने बड़ों का आशीर्वाद   बना रहता है तो घर में तरक्की ही होती है, हमारे घर में इसीलिए समस्याएं आई हुई हैं। 

दमयंती जी ,गुस्से में कह देना चाहती थीं - कि जब घर के बड़े ही स्वार्थी हो जाते हैं ,तब भी घर की उन्नति नहीं होती, यह सारा किया- धरा तो मेरी सास का ही है लेकिन जो बातें मन को कष्ट दें , उन बातों को न करके उसने रूही से पूछा -क्या तुम हमारे घर की रस्में जानती हो ?

कौन सी रस्में ? अनजान बनते हुए रूही ने पूछा। 

वही, जो संबंध मेरा तुम्हारे चारों पापा से रहा है। 

मैं ऐसी कोई रस्म नहीं जानती , रूही ने स्पष्ट जवाब दिया। 

किंतु गर्वित तो कह रहा था- कि तुम सब कुछ जानती हो ?

 मैं भला यह सब कैसे जानूंगी ,मुझे यहां आए हुए अभी कितने दिन हुए हैं। 3 दिन के बाद इनके भाई अचानक ही चले बसे, मुझे किसी ने कुछ नहीं बताया। 

अब तो इतने दिनों से यहां रह रही हो, अब तो तुम समझ ही गई होगीं। 

नहीं, मैं अभी भी कुछ नहीं समझी,न ही मैं समझना चाहती हूँ ,रूही ने ढृढ़ स्वर में कहा ,वैसे आपकी इस रस्म के लिए, मुझे क्या करना होगा ?

क्या गर्वित ने वाकई में, तुम्हें कुछ भी नहीं बताया था, हमारे यहां किस तरह की रस्म होती है ?

ऐसी कोई रस्म नहीं है जो हमने नहीं की है, फिर यह और कौन सी रस्म रह गयी है ?

यदि गर्वित यहां नहीं है, तो तुम पुनीत और सुमित में से किसी को भी,अपने पति के रूप में  चुनकर उसके संग रह सकती हो। 

यह क्या बात हुई, मेरा विवाह तो गर्वित से हुआ है, थोड़ा भड़कने का अभिनय करते हुए रूही ने जवाब दिया।

 हमारे यहां की यही विशिष्ट रस्म है , तुम्हारा विवाह एक से होता है किंतु तुम पत्नी, सभी की बनती हो। 

यह कौन सी रस्म है,ये किसने बनाई  है ?इसीलिए गौरव मुझसे इसी तरह की जलील हरक़तें कर रहा था,रूही ने क्रोधित होते हुए कहा। 

ए....  लड़की ! जरा ज़बान संभालकर बात करो ! अब वो इस दुनिया में नहीं रहा ,इसीलिए उसके विषय में कोई भी अनुचित शब्द हम नहीं सुन पाएंगे। अभी तुम जिन दादा -दादी का नाम ले रही थीं , उनका आशीर्वाद चाह रही थी, यह उसी दादी की बनाई हुई रस्म है। 

क्या मतलब ?मैं कुछ समझी नहीं ,क्योंकि इस विषय में , वास्तव में, रूही जानना चाहती थी आखिर यह रस्म उनके परिवार में कैसे आई और किसने बनाई ?


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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