दमयंती बाहर से अपने को मजबूत दिखा रही थी किन्तु अब अंदर ही अंदर उसे अपने बेटे का गम खाये जा रहा था।गर्वित भी अब जा चुका था ,दमयंती जी की भी अब इतनी टोका -टाकी नहीं होती थी। हवेली में टहलते हुए, रूही ने एक दिन ,एक कमरा देखा,यह कमरा बंद क्यों है ? यह कमरा किसका हो सकता है ?उसने उस कमरे की खिड़की से झाँककर देखा ,उस कमरे में एक बड़ी सी तस्वीर लगी थी किन्तु बाहर से कुछ भी स्पष्ट दिखलाई नहीं दे रहा था। उसने उस कमरे को खोलने का प्रयास किया किन्तु कमरा बंद था। तब वह इधर -उधर देखती है ,उसे हवेली में एक नौकर दिखलाई दिया। उसे देखकर रूही ने पूछा -तुम्हारा नाम क्या है ?यहां कब से काम कर रहे हो ?
जी,मेरा नाम 'कन्हैया' है , मुझे तो यहां आये हुए अभी तीन बरस ही हुए हैं, उसने जबाब दिया।
क्या तुम इस कमरे को खोल सकते हो ?इसकी चाबियाँ किसके पास हैं ? रूही ने पूछा।
जी ,इस कमरे की चाबी तो' बड़े साहब' के पास हैं और यह कमरा तो सालभर में या छह महीने में एक बार ही साफ -सफाई के लिए खुलता है।
क्या तुम जानते हो ?यह कमरा किसका है ? हाँ ,'बड़े साहब' का !
कौन से 'बड़े साहब !क्या वो यहाँ नहीं रहते ?
पता नहीं ,कहाँ रहते हैं ?कहते हुए ,उसकी आवाज धीमी हो गयी ,फुसफुसाते हुए बोला -यहां कोई भी उनके विषय में बात नहीं करता।
क्यों, ऐसा क्या हो गया ? जिज्ञासा से रूही ने पूछा। रूही की जिज्ञासा और बढ़ गई, वह जानना चाहती थी कि यह' बड़े साहब 'कौन है ? तब उसने कन्हैया से पूछा -क्या तुम जानते हो, इस कमरे की चाबियाँ कहाँ रखी रहती हैं ?
अभी तो बताया ,बड़े साहब के पास रहती हैं।
किन्तु वो, उन्हें कहीं तो रखते होंगे ,उस जगह को तो जानते हो ,हाँ उनके कमरे की अलमारी में...
रूही यह भी नहीं समझ पा रही थी ,यह 'बड़े साहब' किसे कह रहा है ?शायद 'जगत सिंह जी 'को कह रहा है किन्तु ये जो दूसरे बड़े साहब हैं ,ये कौन हो सकते हैं ? तब उसने कन्हैया से कहा -जाओ !चाबी लेकर आओ !
बहु जी ! आप ये क्या कह रहीं हैं ?आप इस कमरे में क्यों जाना चाहती हैं ?रूही की बात से कन्हैया हड़बड़ा गया और बोला -मालिक को पता चल गया तो मुझे नौकरी से निकाल देंगे।
कुछ नहीं होगा ,जाओ !जाकर चाबी ले आओ ! रूही ने आदेश दिया।
साहब ! ने मना कर दिया तो...
उन्हें बताएगा कौन ? रूही ने पूछा।
यानि आप मुझे साहब के कमरे से चाबी चोरी करके लाने के लिए कह रही हैं।
इसमें चोरी कैसी ?मैंने तुमसे कहा है और तुम्हारे साहब से न ही मैं, उन्हें बताउंगी और न ही तुम, उन्हें कुछ बताना। जब तक उन्हें पता चलेगा ,उससे पहले ही हम चाबी को उसी स्थान पर रख देंगे कहते हुए उसकी हथेली पर पांच सौ का नोट रख दिया।
कन्हैया को क्या परेशानी होती ? यदि साहब को पता चल भी गया तो क्या होगा ?वो तो कह देगा ,बहु जी का आदेश था। नहीं, पता चला ,तो पांच सौ रुपयों से अपनी जेब तो गर्म हो ही गयी है। नोट हाथ में आते ही वह चुपचाप चाबी लेकर आ गया।
रूही उस कमरे को खोलकर उसके अंदर गई, उस कमरे के अंदर जाकर उसने देखा,काफी बड़ा कमरा था। हर सुख -सुविधा के सामान से सुसज्जित ! पलंग के पीछे ही , सामने दीवार पर एक बड़ी तस्वीर लगी हुई थी उस तस्वीर को देखकर वह बुरी तरह चौंक गई। यह तस्वीर तो उस बुजुर्ग की है, जिसको मैंने हवेली के पिछले द्वार पर देखा था। मेरा शक सही था, उनका संबंध अवश्य ही इसी हवेली से है आखिर ऐसा क्या हुआ था कि वह हवेली के अंदर नहीं आते हैं। इस हवेली से उनका क्या संबंध है ? अनेक प्रश्न उसकी मन में उमड़ रहे थे।
तब उसने हवेली के नौकर को बुलाकर पूछा -यह किसकी तस्वीर है ?
बहु जी !क्या आप इन्हें नहीं जानती हैं, यही तो' बड़े मालिक' हैं , यह सुनकर रूही आश्चर्य चकित रह गई और पूछा -बड़े मालिक ! कौन ?
उस नौकर ने जवाब दिया -इस हवेली के असली वारिस तो वही हैं' ठाकुर अमर प्रताप सिंह जी !' वैसे मैंने उन्हें कभी हवेली में देखा नहीं किन्तु एक दिन सफाई करते हुए ,रामू ने मुझे बताया था -यही बड़े मालिक हैं।
नौकर के मुंह से यह शब्द सुनकर रूही आश्चर्य चकित रह गई। इनको मैंने पहले भी हवेली से बाहर ही देखा था लेकिन उसने यह बात नौकर से नहीं कही कि मैंने उन्हें कहां देखा है ?तब उसने कन्हैया से पूछा -अब वे कहां हैं ?
कन्हैया ने अपने आसपास देखा।जैसे देखना चाहता है ,हमारी बातें कोई सुन तो नहीं रहा है। तब वह बोला - बहु जी ! यह बात किसी से मत कहिएगा , और यदि यह बात सामने आ भी जाती है तो मेरा नाम मत लीजिएगा।
हां, मैं तुमसे वादा करती हूं मैं तुम्हारा नाम नहीं लूंगी , तब उस नौकर ने इधर-उधर देखते हुए रहस्य्मयी तरीक़े से बताया -ठाकुर साहब !अचानक गायब हो गए।
अचानक गायब हो गए ,कहां चले गए ? जिज्ञासावश रूही ने पूछा।
जो आपकी ददिया सास थीं ,न.... वो अच्छी -खासी तंदुरुस्त थीं , ठीक-ठाक थीं। अचानक ही न जाने कहाँ चली गयीं ?
कहाँ चली गईं ? किसी से कह कर नहीं गईं फिर क्या वो वापस नहीं आईं ?
नहीं, आप गलत समझ रही हैं, कन्हैया ने कहा -वो तो इसी हवेली में कहीं गायब हो गई थीं, कोई नहीं जानता, कहां चली गई ? उनको ढूंढने के लिए, बड़े साहब ने सभी नौकरों से , हवेली का चप्पा -चप्पा छान मारा किंतु'' सुनैना देवी जी'' कहीं नहीं मिली।
कोई कहता है -हवेली उन्हें निगल गई। कोई कहता है -जिस तांत्रिक के पास जाती थी , उसने कुछ जादू टोना कर दिया। बड़े साहब बड़े परेशान रहने लगे थे। रात - दिन सोचते रहते थे, उनकी पत्नी अचानक कहां चली गई ? एक दिन अचानक उन्हें ऐसा कुछ पता चला , जिसके कारण वो भी एकदम से गायब हो गए।
अच्छा ! उन्हें ऐसा क्या पता चला ?आश्चर्य से रूही ने पूछा।
साह,ब ने किसी को कुछ नहीं बताया , और चुपचाप हवेली छोड़ कर चले गए , अब उनके विषय में भी कोई नहीं जानता, वे कहां है ? हैं भी या नहीं। उन्हें हवेली छोड़े हुए वर्षों हो गए ,।
क्या परिवार के लोगों ने उन्हें ढूंढने का प्रयास नहीं किया ? किया या नहीं यह तो मैं नहीं जानता किंतु तब से बड़े साहब हवेली में नहीं आए हैं।
उनकी पत्नी का कुछ पता चला या नहीं, मेरे कहने का मतलब है -मेरी सास की सास का कुछ पता चला या नहीं।
अब यह बात तो हवेली वाले ही जाने जितनी जानकारी मुझे थी मैंने आपको दे दी ! कन्हैया ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा।
ठीक है, तुम कमरा बंद करके चाबी उसी स्थान पर रख देना , कह कर रूही वहां से निकल गई।
